ऑनलाइन पोल में जीतने पर भी क्यों मोदी के 'टाइम पर्सन ऑफ द ईयर' चुने जाने पर है संशय
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अपनी छवि चमकाने में लगे प्रधानमंत्री मोदी के खाते में सोमवार को उस समय एक और उपलब्धि जुड़ गई जब टाइम मैगजीन के ऑनलाइन पोल में उन्हें पर्सन ऑफ द ईयर चुना गया। हालांकि इसका अंतिम परिणाम तो सात दिसंबर को आएगा जब टाइम का एडिटर्स पैनल विजेता के नाम की घोषणा करेगा।
बीते साल भी इस प्रतिष्ठित सम्मान की दौड़ में ऑनलाइन रीडर्स पोल जीतकर प्रधानमंत्री मोदी सबसे आगे थे लेकिन एडिटर्स पैनल ने उनकी जगह जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल को यह पुरस्कार दे दिया। इस साल भी मोदी इस रेस में सबसे आगे हैं, इतना आगे कि उन्हें मिले 18 फीसदी वोट के बाद अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और बराक ओबामा जैसे दिग्गज मात्र 7 फीसदी वोट के बाद उनसे काफी पीछे हैं।
हालांकि सवाल सिर्फ यही है कि क्या इस बार वह टाइम पर्सन ऑफ द ईयर बन पाएंगे। क्योंकि साल 2014 और 2015 में भी वह ऑनलाइन रीडर्स पोल में विजेता बनने के बाद भी टाइम पर्सन ऑफ द ईयर बनने से रह गए थे। तो आइए जानते हैं वो पेंच जिसकी वजह से अटक सकती है मोदी की राह।
एडिटर्स पैनल करता है अंतिम चयन
अमेरिकी की प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन की शुरूआत साल 1927 में हुई थी। इसी दौरान पत्रिका ने मैन ऑफ द ईयर पुरस्कार शुरू करने की घोषणा की। जिसके पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है। 1927 में ही चार्ल्स लिंडनबर्ग ने अटलांटिक महासागर को बगैर रुके पार करके विश्व के पहले पायलट बनने की उपलब्धि हासिल की थी। लेकिन पत्रिका ने उनके ऊपर कोई स्टोरी नहीं, इसकी आलोचना शुरू हुई तो छवि बचाने के लिए मैगजीन ने उन्हें 'मैन ऑफ द ईयर' घोषित कर दिया।
यह पहल लोगों को अच्छी लगी जिसके बाद मैगजीन ने हर साल यह परंपरा शुरू कर दी। खास बात ये है कि भारत की ओर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को साल 1930 में 'मैन ऑफ द ईयर' के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साल 1999 में इसका नाम मैन ऑफ द ईयर से बदलकर पर्सन ऑफ द ईयर कर दिया गया।
कई साल पहले मैगजीन ने अंतिम चयन से पहले पाठकों की राय जानने के लिए ऑनलाइन रीडर्स पोल शुरू किया। जिसमें पाठकों से उनकी पसंद के विकल्प को चुनने के लिए कहा जाता है। ऑनलाइन पोल के बाद एडिटर्स का पैनल अंतरराष्ट्रीय ख्याति और सालभर किए गए खास कार्यों की समीक्षा के बाद अंतिम विजेता का चयन करता है।
हालांकि पहले भी एडिटर्स पैनल कई ऑनलाइन पोल के परिणामों को पलट चुका है। साल 2006 में वेनेजुएला के प्रजीडेंट ह्यूगो शावेज ऑनलाइन पोल में सबसे आगे थे लेकिन जब अंतिम परिणाम आए तो एडिटर्स ने उनकी जगह किसी और को पुरस्कार दे दिया। इससे पहले 1998 में WWE रेसलर मिक फॉली के जब जीतने की संभावना सबसे ज्यादा थी तब उन्हें पोल लिस्ट से ही हटा दिया गया।
उपलब्धियों के नाम पर तो मोदी के नाम से लंबी चौड़ी लिस्ट है लेकिन क्या वह टाइम के एडिटर्स को प्रभावित कर पाती है या नहीं यह देखना महत्वपूर्ण होगा?