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CAPF: अर्धसैनिक बलों के कार्मिकों में क्यों पैदा हो रहा 'तनाव'? पूर्व अफसरों ने गिनाईं ये वजह
सार
CAPF: बीएसएफ के पूर्व आईजी बीएन शर्मा कहते हैं, इन बलों में हर स्तर के अधिकारियों को मानव प्रबंधन के प्रत्येक पक्ष को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा। ऐसा माहौल रहे, जहां पर कोई भी जवान बिना किसी भय एवं हिचक से अपनी समस्या रख सके।
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सुरक्षा बल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मणिपुर में गुरुवार को इंफाल पश्चिम जिले के लाम्फेल में स्थित सीआरपीएफ के शिविर में को हवलदार संजय कुमार ने अपने साथियों पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दी थी। इस घटना में एक उप-निरीक्षक और एक सिपाही की मौत हो गई। बाद में हवलदार संजय ने खुद को भी गोली मार ली थी। कुछ देर बाद उसने भी दम तोड़ दिया। फायरिंग की घटना में आठ अन्य जवान घायल हुए हैं। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में तीन दशक से अधिक समय तक सेवा देने वाले रिटायर्ड अफसरों का कहना है कि ऐसी कई बातें हैं जो कार्मिकों को तनाव की तरफ ले जाती हैं।
हालांकि इस तरह के तनाव को कम किया जा सकता है। बीएसएफ के पूर्व आईजी बीएन शर्मा कहते हैं, इन बलों में हर स्तर के अधिकारियों को मानव प्रबंधन के प्रत्येक पक्ष को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा। ऐसा माहौल रहे, जहां पर कोई भी जवान बिना किसी भय एवं हिचक से अपनी समस्या रख सके। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं कि कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर कर देती है। सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी डीसी डे कहते हैं, ये फोर्स है, यहां पर सभी तरह की पोस्टिंग मिलती है। अफसर और जवान के बीच अनुशासन की भावना के साथ एक अपनापन और सामंजस्य बना रहे तो टेंशन खत्म हो सकती है।
बीएसएफ के पूर्व आईजी बीएन शर्मा के मुताबिक, केंद्रीय सुरक्षा बलों में किसी जवान द्वारा अपने ही साथियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाने के पीछे पारिवारिक या नौकरी से जुड़ा तनाव एक बहुत बड़ा कारण हो सकता है। इसका निवारण बहुत जरुरी है। इसके निवारण के लिए हर स्तर के अधिकारियों को मानव प्रबंधन के हर पक्ष को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा। सुरक्षा बलों में सॉफ्ट या पीस पोस्टिंग जैसी कोई व्यवस्था नहीं, वाहिनियों के लिए हर टैन्योर कुछ न कुछ चुनौती लिए होता है। जवान के लिए स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब उसे ड्यूटी और परिवारिक का तनाव लगातार एक साथ झेलना पड़ जाए।
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बतौर शर्मा, ऐसे में जवान के साथ साथ उसके परिजनों से भी समय समय पर संपर्क में रहना, तनाव को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। छुट्टी से लौटे किसी जवान के परिवार से किसी अधिकारी द्वारा फोन पर बातचीत कर उनका हाल-चाल या समस्या के बारे में पूछना इत्यादि, यह एक अच्छा जरिया बन सकता है। ऐसे ही सैनिक सम्मेलन में रैन्डम्ली कुछ जवानों के परिवार के साथ वीडियो कॉल पर खुद व जवान से बात कराने से भी एक जुड़ाव पैदा हो सकता है। ऐसे कुछ और भी तरीके सोचे जा सकते हैं, जिससे जवान खुलकर अपनी समस्या अधिकारियों के साथ साझा कर अपना तनाव कम कर सकते हैं।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद कहते हैं, कई जगहों पर वर्कलोड ज्यादा है। जवान ठीक से सो नहीं पाते हैं। वे अपनी समस्या किसी के सामने रखते हैं, तो वहां ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती। ये बातें जवानों को तनाव की ओर ले जाती हैं। कुछ स्थानों पर बैरक एवं दूसरी सुविधाओं की कमी नजर आती है। कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या तक ले जाती है। समय पर प्रमोशन या रैंक न मिलना भी जवानों को तनाव देता है। केंद्र सरकार ने इन बलों में पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू करने की तरफ ध्यान नहीं दिया। इन बलों में 2004 से पुरानी पेंशन खत्म कर दी गई है। रिक्तियों को तय समय पर नहीं भरा जाता। ऐसे में जवानों पर काम का भारी दबाव रहता है। हालांकि इन सबके बावजूद जवानों को अगर यह भरोसा रहता है कि उनकी बात सौहार्द पूर्ण तरीके से सुनी जाएगी तो वे घातक कदम उठाने से बच सकते हैं।
'अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन' के चेयरमैन एवं पूर्व एडीजी एचआर सिंह और महासचिव रणबीर सिंह कई बार कह चुके हैं कि जवानों की सभी समस्याओं का हल नहीं हो पाता। जब आरटीआई एक्ट के तहत यह सूचना मांगी जाती है कि सीएपीएफ में कितने जवानों को एक साल में 100 दिन की छुट्टी मिली है, तो जवाब देने से मना कर दिया जाता है। 'संघर्ष और तनाव' की ये कहानी केवल 'सीआरपीएफ' नहीं, बल्कि 'सीएपीएफ' की है। जवान, बहुत दबाव में ड्यूटी करते हैं। सीआरपीएफ में जवानों द्वारा आत्महत्या करना या अपने साथियों पर गोली चला देना, इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पिछले एक दशक में कई दावे किए गए हैं। जवानों को मानसिक तनाव से दूर रखने के लिए बल ने निजी कन्सलटेंट की सेवाएं भी ली हैं। बाकायदा एक लंबा चौड़ा कार्यक्रम बनाया गया। जवानों के लिए खेल एवं योगा क्लास भी शुरु की गई। केंद्रीय बलों में सैनिक सम्मेलन आयोजित करने की संख्या बढ़ाई गई।
जवानों के मानसिक स्वास्थ्य के मद्देनजर 'चौपाल' कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। इसका मकसद जवानों के साथ, अधिकारी उसी लहजे में बात करें, जैसे गांव में चौपाल पर बातचीत होती है। ऐसा माहौल रहे, जहां पर कोई भी जवान बिना किसी भय एवं हिचक से अपनी समस्या रख सके। अगर जवान की बात समय पर सुन कर उसकी समस्या का निवारण कर दिया जाए तो आत्महत्या या साथियों पर गोली चलाने जैसी खतरनाक स्थिति को रोकने में मदद मिल सकती है। एसोसिएशन का कहना है कि जवानों की टेंशन, मुद्दे हल करने से खत्म होगी। जवानों के साथ अच्छे व्यवहार का सलीका, ऐसे आदेश समय-समय पर आते रहते हैं, लेकिन वे केवल फाइलों में ही होते हैं। जवानों को लेकर अफसरों के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं दिखता। समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय संसद में बताते हैं, इन बलों में आत्महत्याओं और भ्रातृहत्याओं को रोकने के लिए जोखिम के प्रासंगिक घटकों एवं प्रासंगिक जोखिम समूहों की पहचान करने तथा उपचारात्मक उपायों से संबंधित सुझाव देने के लिए एक कार्यबल का गठन किया गया है। कार्यबल की रिपोर्ट तैयार हो रही है। सीएपीएफ में तबादले और छुट्टी को लेकर पारदर्शी नीतियां बनाई जा रही हैं। कठिन क्षेत्रों में सेवा करने के पश्चात यथासंभव उसकी पसंदीदा तैनाती पर विचार किया जाता है। जवानों की शिकायतों का पता लगाने के लिए और उनका निराकरण करने के मकसद से अधिकारियों के साथ नियमित संवाद होता है।
बेहतर चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। उनकी व्यक्तिगत एवं मनोवैज्ञानिक चिंता के निवारण के लिए विशेषज्ञों के साथ बातचीत का आयोजन होता है। बेहतर पहचान तथा समाज में सम्मान देने के लिए सेवानिवृत्त सीएपीएफ कार्मिकों को पूर्व सीएपीएफ कार्मिक का नाम दिया जाता है। अगर कोई ड्यूटी पर घायल होता है तो अस्पताल में बितायी गई अवधि, ड्यूटी की अवधि मानी जाती है। रहन सहन, मनोरंजन व खेल की सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। जवानों के बच्चों को छात्रवृत्ति सहित विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गई हैं। जब कभी रिक्तियां उत्पन्न होती हैं तो पात्र कर्मियों को नियमित रूप से पदोन्नति दी जाती है। 10, 20 व 30 साल की सेवा पूरी होने के बाद एमएसपी के तहत वित्तीय लाभ प्रदान किए जाते हैं।
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हालांकि इस तरह के तनाव को कम किया जा सकता है। बीएसएफ के पूर्व आईजी बीएन शर्मा कहते हैं, इन बलों में हर स्तर के अधिकारियों को मानव प्रबंधन के प्रत्येक पक्ष को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा। ऐसा माहौल रहे, जहां पर कोई भी जवान बिना किसी भय एवं हिचक से अपनी समस्या रख सके। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं कि कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर कर देती है। सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी डीसी डे कहते हैं, ये फोर्स है, यहां पर सभी तरह की पोस्टिंग मिलती है। अफसर और जवान के बीच अनुशासन की भावना के साथ एक अपनापन और सामंजस्य बना रहे तो टेंशन खत्म हो सकती है।
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बीएसएफ के पूर्व आईजी बीएन शर्मा के मुताबिक, केंद्रीय सुरक्षा बलों में किसी जवान द्वारा अपने ही साथियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाने के पीछे पारिवारिक या नौकरी से जुड़ा तनाव एक बहुत बड़ा कारण हो सकता है। इसका निवारण बहुत जरुरी है। इसके निवारण के लिए हर स्तर के अधिकारियों को मानव प्रबंधन के हर पक्ष को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा। सुरक्षा बलों में सॉफ्ट या पीस पोस्टिंग जैसी कोई व्यवस्था नहीं, वाहिनियों के लिए हर टैन्योर कुछ न कुछ चुनौती लिए होता है। जवान के लिए स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब उसे ड्यूटी और परिवारिक का तनाव लगातार एक साथ झेलना पड़ जाए।
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बतौर शर्मा, ऐसे में जवान के साथ साथ उसके परिजनों से भी समय समय पर संपर्क में रहना, तनाव को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। छुट्टी से लौटे किसी जवान के परिवार से किसी अधिकारी द्वारा फोन पर बातचीत कर उनका हाल-चाल या समस्या के बारे में पूछना इत्यादि, यह एक अच्छा जरिया बन सकता है। ऐसे ही सैनिक सम्मेलन में रैन्डम्ली कुछ जवानों के परिवार के साथ वीडियो कॉल पर खुद व जवान से बात कराने से भी एक जुड़ाव पैदा हो सकता है। ऐसे कुछ और भी तरीके सोचे जा सकते हैं, जिससे जवान खुलकर अपनी समस्या अधिकारियों के साथ साझा कर अपना तनाव कम कर सकते हैं।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद कहते हैं, कई जगहों पर वर्कलोड ज्यादा है। जवान ठीक से सो नहीं पाते हैं। वे अपनी समस्या किसी के सामने रखते हैं, तो वहां ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती। ये बातें जवानों को तनाव की ओर ले जाती हैं। कुछ स्थानों पर बैरक एवं दूसरी सुविधाओं की कमी नजर आती है। कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या तक ले जाती है। समय पर प्रमोशन या रैंक न मिलना भी जवानों को तनाव देता है। केंद्र सरकार ने इन बलों में पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू करने की तरफ ध्यान नहीं दिया। इन बलों में 2004 से पुरानी पेंशन खत्म कर दी गई है। रिक्तियों को तय समय पर नहीं भरा जाता। ऐसे में जवानों पर काम का भारी दबाव रहता है। हालांकि इन सबके बावजूद जवानों को अगर यह भरोसा रहता है कि उनकी बात सौहार्द पूर्ण तरीके से सुनी जाएगी तो वे घातक कदम उठाने से बच सकते हैं।
'अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन' के चेयरमैन एवं पूर्व एडीजी एचआर सिंह और महासचिव रणबीर सिंह कई बार कह चुके हैं कि जवानों की सभी समस्याओं का हल नहीं हो पाता। जब आरटीआई एक्ट के तहत यह सूचना मांगी जाती है कि सीएपीएफ में कितने जवानों को एक साल में 100 दिन की छुट्टी मिली है, तो जवाब देने से मना कर दिया जाता है। 'संघर्ष और तनाव' की ये कहानी केवल 'सीआरपीएफ' नहीं, बल्कि 'सीएपीएफ' की है। जवान, बहुत दबाव में ड्यूटी करते हैं। सीआरपीएफ में जवानों द्वारा आत्महत्या करना या अपने साथियों पर गोली चला देना, इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पिछले एक दशक में कई दावे किए गए हैं। जवानों को मानसिक तनाव से दूर रखने के लिए बल ने निजी कन्सलटेंट की सेवाएं भी ली हैं। बाकायदा एक लंबा चौड़ा कार्यक्रम बनाया गया। जवानों के लिए खेल एवं योगा क्लास भी शुरु की गई। केंद्रीय बलों में सैनिक सम्मेलन आयोजित करने की संख्या बढ़ाई गई।
जवानों के मानसिक स्वास्थ्य के मद्देनजर 'चौपाल' कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। इसका मकसद जवानों के साथ, अधिकारी उसी लहजे में बात करें, जैसे गांव में चौपाल पर बातचीत होती है। ऐसा माहौल रहे, जहां पर कोई भी जवान बिना किसी भय एवं हिचक से अपनी समस्या रख सके। अगर जवान की बात समय पर सुन कर उसकी समस्या का निवारण कर दिया जाए तो आत्महत्या या साथियों पर गोली चलाने जैसी खतरनाक स्थिति को रोकने में मदद मिल सकती है। एसोसिएशन का कहना है कि जवानों की टेंशन, मुद्दे हल करने से खत्म होगी। जवानों के साथ अच्छे व्यवहार का सलीका, ऐसे आदेश समय-समय पर आते रहते हैं, लेकिन वे केवल फाइलों में ही होते हैं। जवानों को लेकर अफसरों के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं दिखता। समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय संसद में बताते हैं, इन बलों में आत्महत्याओं और भ्रातृहत्याओं को रोकने के लिए जोखिम के प्रासंगिक घटकों एवं प्रासंगिक जोखिम समूहों की पहचान करने तथा उपचारात्मक उपायों से संबंधित सुझाव देने के लिए एक कार्यबल का गठन किया गया है। कार्यबल की रिपोर्ट तैयार हो रही है। सीएपीएफ में तबादले और छुट्टी को लेकर पारदर्शी नीतियां बनाई जा रही हैं। कठिन क्षेत्रों में सेवा करने के पश्चात यथासंभव उसकी पसंदीदा तैनाती पर विचार किया जाता है। जवानों की शिकायतों का पता लगाने के लिए और उनका निराकरण करने के मकसद से अधिकारियों के साथ नियमित संवाद होता है।
बेहतर चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। उनकी व्यक्तिगत एवं मनोवैज्ञानिक चिंता के निवारण के लिए विशेषज्ञों के साथ बातचीत का आयोजन होता है। बेहतर पहचान तथा समाज में सम्मान देने के लिए सेवानिवृत्त सीएपीएफ कार्मिकों को पूर्व सीएपीएफ कार्मिक का नाम दिया जाता है। अगर कोई ड्यूटी पर घायल होता है तो अस्पताल में बितायी गई अवधि, ड्यूटी की अवधि मानी जाती है। रहन सहन, मनोरंजन व खेल की सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। जवानों के बच्चों को छात्रवृत्ति सहित विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गई हैं। जब कभी रिक्तियां उत्पन्न होती हैं तो पात्र कर्मियों को नियमित रूप से पदोन्नति दी जाती है। 10, 20 व 30 साल की सेवा पूरी होने के बाद एमएसपी के तहत वित्तीय लाभ प्रदान किए जाते हैं।