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Tamil Nadu Politics: क्या 50 साल बाद करुणानिधि की राह पर CM स्टालिन? पिता का सपना था- राज्यों को अधिक अधिकार

Sun, 20 Apr 2025 06:19 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई। Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 20 Apr 2025 06:19 PM IST
सार

Tamil Nadu Politics: पचास साल पहले एम करुणानिधि ने राज्यों को अधिक अधिकार देने की मांग करते हुए विधानसभा में प्रस्ताव रखा था, जो पारित भी हुआ था। अब उनके बेटे एम के स्टालिन उसी रास्ते पर चलकर राज्यों की स्वायत्तता के लिए पैनल बनाने की घोषणा की है। 

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When Karunanidhi fought for autonomy for states over 50 years ago invoking DMK icon Annadurai
एम. करुणानिधि, एम.के. स्टालिन - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन ने एक पैनल बनाने की घोषणा की। यह पैनल राज्यों को अधिक अधिकार देने के उपाय सुझाएगा। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज कुरियन जोसेफ करेंगे। लेकिन यह मांग नई नहीं है। यही मांग पचास साल पहले उनके पिता एम. करुणानिधि ने भी की थी। 

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करुणानिधि ने 16 अप्रैल 1974 को तमिलनाडु विधानसभा में एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें केंद्र से संविधान में बदलाव कर राज्यों को ज्यादा अधिकार देने की मांग की गई थी। ये प्रस्ताव पारित भी हुआ था। 
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करुणानिधि के इस रुख के पीछे द्रमुक के संस्थापक सी. एन. अन्नादुरै की सोच थी। अन्ना (अन्नादुरै) ने हमेशा राज्य की स्वायत्तता की बात की। करुणानिधि ने अपने भाषण में अन्ना का आखिरी लेख भी पढ़ा जो 1969 में ‘होम रूल’ नाम की अंग्रेजी पत्रिका में छपा था। उसमें अन्ना ने लिखा था – 'भाई, मुझे सत्ता का कोई मोह नहीं है। मैं उस संविधान के तहत मुख्यमंत्री बनने में भी खुश नहीं हूं, जो दिखने में संघीय है लेकिन असल में सारे अधिकार केंद्र अपने पास रखता है।'
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अप्रैल 1967 में दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस में अन्ना ने कहा था कि केंद्र के पास सिर्फ उतने अधिकार रहने चाहिए, जितने देश की एकता बनाए रखने के लिए जरूरी हों। बाकी अधिकार राज्यों को मिलने चाहिए। उन्होंने एक उच्च स्तरीय आयोग बनाने की सिफारिश की थी।

करुणानिधि ने 19 अगस्त 1969 को घोषणा की थी कि पी.वी. राजमण्णार की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय समिति बनाई जाएगी, जिसमें ए.एल. मुदलियार और पी. चंद्रा रेड्डी सदस्य होंगे। यह समिति केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यों को अधिक अधिकार देने के मुद्दे पर काम करेगी। 22 सितंबर 1969 को समिति का गठन हुआ। इसकी रिपोर्ट 27 मई 1971 को राज्य सरकार को मिली, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेजा गया। इंदिरा गांधी ने 22 जून को जवाब दिया कि इस विषय पर प्रशासनिक सुधार आयोग भी विचार कर रहा है।

जब करुणानिधि ने 1974 में विधानसभा में प्रस्ताव रखा, तो स्वतंत्र पार्टी के एच.वी. हांडे ने संशोधन लाकर कहा कि राज्य स्वायत्तता के नाम पर विघटनकारी शक्तियों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि सरकार को सतर्क रहना चाहिए कि कोई पाकिस्तान या बांग्लादेश का उदाहरण देकर देश को बांटने की कोशिश न करे।

मुस्लिम लीग के विधायक अब्दुल जब्बार ने कावेरी नदी विवाद का हवाला दिया और कहा, अगर केंद्र इतना शक्तिशाली है, तो पानी के बंटवारे का फैसला क्यों नहीं कर सका? क्या 10 साल बाद भी ये मसला नहीं सुलझेगा? उन्होंने यूक्रेन का उदाहरण भी दिया, जो कभी रूस का हिस्सा था लेकिन फिर संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना।


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फॉरवर्ड ब्लॉक के के. कंदासामी ने एक लेख का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टियां हों, तो कांग्रेस हाईकमान की शैली से काम नहीं चल सकता। द्रमुक के अलादी अरुणा ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल का हवाला देते हुए कहा कि अगर राज्यों को अधिकार नहीं मिले, तो एक दिन दिल्ली में हर राज्य का भवन एक ‘दूतावास’ जैसा बन जाएगा।

आखिर में करुणानिधि का प्रस्ताव (राजमण्णार समिति की सिफारिशों पर आधारित) 16 से 20 अप्रैल 1974 तक चली पांच दिन की बहस के बाद पारित हुआ। कुल 37 विधायकों ने चर्चा में हिस्सा लिया। अन्नाद्रमुक सदस्य सदन से वॉकआउट कर गए। बाकी संशोधन या तो वापस लिए गए या खारिज हो गए। अब एक बार फिर तमिलनाडु केंद्र से राज्यों को ज्यादा अधिकार देने की मांग की मांग उठा रहा है और स्टालिन उसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। 

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