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WhatsApp group: निलंबित सैन्य खुफिया अधिकारी पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, पाक एजेंट के साथ संपर्क का आरोप
Fri, 29 Jul 2022 08:11 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Fri, 29 Jul 2022 08:11 PM IST
सार
अधिकारियों की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था जो उनकी इस दलील से असहमत था कि कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के लंबित रहने तक उन्हें निलंबित करने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social media
विस्तार
पाकिस्तानी एजेंट के साथ एक व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा होने के आरोप में निलंबित किए गए चार सैन्य खुफिया अधिकारियों ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका रद्द करने के फैसले की समीक्षा करने की मांग की है। अधिकारियों ने यह दावा करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था कि उनके खिलाफ कोर्ट ऑफ इंक्वायरी लंबित रहने तक निलंबित किए जाने से पहले उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया गया था। अधिकारियों की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था जो उनकी इस दलील से असहमत था कि कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के लंबित रहने तक उन्हें निलंबित करने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।
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अदालत ने कहा था- कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के लंबित रहने तक किया जा सकता है निलंबित
न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने 14 जुलाई को सुनवाई के दौरान कहा था कि नियम 349 के तहत भी इस तरह की प्रक्रिया का पालन करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। याचिकाकर्ताओं को कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के लंबित रहने तक निलंबित किया जा सकता है, जैसा कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है और इसका गठन पहले ही किया जा चुका है और जांच जारी है। निलंबित अधिकारियों ने अब एक समीक्षा याचिका दायर कर दावा किया है कि सैन्य कानून के अनुसार पूछताछ और जांच दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। उन्होंने कहा कि कोर्ट ऑफ इंक्वायरी एक तथ्य खोजने वाला उपकरण है जो अनुशासनात्मक कार्यवाही का एक पूर्व-चरण है।
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याचिका में कहा गया है कि कोर्ट ऑफ इंक्वायरी द्वारा प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर कमांडिंग अधिकारी अनुशासनात्मक कार्यवाही के साथ आगे बढ़ने और सेना नियम 22 के तहत जांच करने का निर्णय ले सकता है और ऐसा करते समय वह अपने अधिकार क्षेत्र के तहत सैनिकों को जांच के लंबित जांच के दौरान निलंबित करने का निर्णय ले सकता है, न कि कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के दौरान। इसमें कहा गया है कि पूछताछ और जांच के तहत दोनों प्रक्रियाएं सैन्य अधिनियम के अधीन व्यक्ति को सुनवाई के अधिकार के लिए वैधानिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। इस प्रकार इस माननीय न्यायालय ने अपने निर्णय में गलती की है कि याचिकाकर्ताओं का निलंबन सही जबकि कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की कार्यवाही लंबित है।
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