{"_id":"675bf00b3616c3d6940d74e5","slug":"what-is-the-controversy-in-the-places-of-worship-act-supreme-court-decision-explained-in-hindi-2024-12-13","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Places of Worship Act: उपासना स्थल कानून में किस बात का विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने क्या और क्यों रोका? समझें","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Places of Worship Act: उपासना स्थल कानून में किस बात का विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने क्या और क्यों रोका? समझें
Sat, 14 Dec 2024 12:54 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Sat, 14 Dec 2024 12:54 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
उपासना स्थल कानून
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया। इसमें कोर्ट ने फिलहाल देश भर की सभी अदालतों को मौजूदा धार्मिक संरचनाओं के खिलाफ लंबित मुकदमों में सर्वे के आदेश सहित कोई भी प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित करने से रोक दिया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्र को हलफनामा दायर करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उपासना स्थल कानून फिर चर्चा में आ गया है। कई विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत किया है। वहीं याचिकाकर्ता और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने कहा है कि उपासना स्थल अधिनियम के तहत न्यायालय तक पहुंच अवरुद्ध कर दी गई है।
आइये जानते हैं कि उपासना स्थल कानून क्या है? इस पर विवाद कैसे हुआ और अदालत कैसे पहुंचा? इसमें याचिकाकर्ता कौन हैं और उनकी मांग क्या है? इसके विरोध में क्या तर्क दिए गए? 1991 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट का क्या फैसला आया है?
उपासना स्थल कानून क्या है?
देश की संसद ने 18 सितंबर 1991 को उपासना स्थल अधिनियम, 1991 (अधिनियम) पारित किया था। उपासना स्थल कानून में सात धाराएं हैं। शुरुआती खंड में कानून का उद्देश्य किसी भी उपासना स्थल के बदलाव पर रोक लगाना और किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त, 1947 के अनुसार बनाए रखना बताया गया है।
अधिनियम की धारा 3 में यह घोषित किया गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक संप्रदाय के उपासना स्थल को किसी अन्य धार्मिक संप्रदाय या समुदाय में नहीं बदला जाएगा। धारा 4(1) में प्रावधान है कि उपासना स्थल का धार्मिक चरित्र वैसा ही बना रहेगा जैसा 15 अगस्त, 1947 को था। धारा 4(2) में प्रावधान है कि 15 अगस्त, 1947 को मौजूद उपासना स्थल के चरित्र के बदलाव से जुड़े सभी लंबित मुकदमे, अपील या अन्य कार्यवाही अधिनियम के लागू होने पर समाप्त हो जाएंगी और कोई नई कार्यवाही दायर नहीं की जा सकेगी। धारा 4(2) में अपवाद भी है कि यदि 15 अगस्त 1947 के बाद स्थिति में बदलाव हुआ है तो किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र के बदलाव के संबंध में कानूनी कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
धारा 4 (3) (ए) किसी भी उपासना स्थल को अधिनियम के प्रभाव से छूट देती है जो एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या पुरातत्व स्थल है या प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत आता है। अधिनियम की धारा 5 विशेष रूप से राम जन्मभूमि को इसके आवेदन से छूट देती है।
देश की संसद ने 18 सितंबर 1991 को उपासना स्थल अधिनियम, 1991 (अधिनियम) पारित किया था। उपासना स्थल कानून में सात धाराएं हैं। शुरुआती खंड में कानून का उद्देश्य किसी भी उपासना स्थल के बदलाव पर रोक लगाना और किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त, 1947 के अनुसार बनाए रखना बताया गया है।
अधिनियम की धारा 3 में यह घोषित किया गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक संप्रदाय के उपासना स्थल को किसी अन्य धार्मिक संप्रदाय या समुदाय में नहीं बदला जाएगा। धारा 4(1) में प्रावधान है कि उपासना स्थल का धार्मिक चरित्र वैसा ही बना रहेगा जैसा 15 अगस्त, 1947 को था। धारा 4(2) में प्रावधान है कि 15 अगस्त, 1947 को मौजूद उपासना स्थल के चरित्र के बदलाव से जुड़े सभी लंबित मुकदमे, अपील या अन्य कार्यवाही अधिनियम के लागू होने पर समाप्त हो जाएंगी और कोई नई कार्यवाही दायर नहीं की जा सकेगी। धारा 4(2) में अपवाद भी है कि यदि 15 अगस्त 1947 के बाद स्थिति में बदलाव हुआ है तो किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र के बदलाव के संबंध में कानूनी कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
धारा 4 (3) (ए) किसी भी उपासना स्थल को अधिनियम के प्रभाव से छूट देती है जो एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या पुरातत्व स्थल है या प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत आता है। अधिनियम की धारा 5 विशेष रूप से राम जन्मभूमि को इसके आवेदन से छूट देती है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो :
पीटीआई
उपासना स्थल को चुनौती क्यों मिली?
यह अधिनियम उस समय चुनौती के दायरे में आया जब सर्वोच्च न्यायालय अयोध्या स्थित विवादित ढांचे के मसले का फैसला कर रहा था। 9 नवंबर 2019 को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से विवादित संपत्ति का मालिकाना हक श्री रामलला विराजमान को दिया। इस फैसले ने 450 साल पुराने विवाद की फाइलें बंद कर दीं। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की वैधता को बरकरार रखा।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें दावा किया गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 का उल्लंघन करता है। इन मामलों में याचिकाकर्ताओं में भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय, पूर्व राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी, धर्मगुरु स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती और देवकीनंदन ठाकुर, काशी नरेश विभूति नारायण सिंह की बेटी कुमारी कृष्णा प्रिया और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी अनिल कबोत्रा शामिल हैं।
मोटे तौर पर याचिकाओं में कानून को चुनौती देने के लिए कुछ आधारों को उठाया गया है। इस अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती देने का एक मुख्य आधार यह है कि यह उपासना स्थलों पर ऐतिहासिक रूप से जबरन कब्जे को वैध बनाता है। वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि यह अधिनियम पीड़ित हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों को कानूनी उपचार देने से रोकता है।
याचिकाओं में धारा 4(2) की संवैधानिकता पर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं की शिकायत यह है कि यह कानून पीड़ित व्यक्तियों या समुदायों को कानूनी उपायों का सहारा लेने से रोकता है।
तीसरा बड़ा मुद्दा मनमाना और तर्कहीन कट-ऑफ तिथि को बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर भी अधिनियम को चुनौती दी है कि 15 अगस्त 1947 की कट-ऑफ तिथि मनमानी और तर्कहीन है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि उनके धार्मिक स्थलों का विध्वंस या कब्जा सदियों में हुआ है, जिसका 15 अगस्त 1947 की कट-ऑफ से कोई संबंध नहीं है। चौथा बड़ा सवाल कानून में अपवादों को लेकर है।
यह अधिनियम उस समय चुनौती के दायरे में आया जब सर्वोच्च न्यायालय अयोध्या स्थित विवादित ढांचे के मसले का फैसला कर रहा था। 9 नवंबर 2019 को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से विवादित संपत्ति का मालिकाना हक श्री रामलला विराजमान को दिया। इस फैसले ने 450 साल पुराने विवाद की फाइलें बंद कर दीं। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की वैधता को बरकरार रखा।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें दावा किया गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 का उल्लंघन करता है। इन मामलों में याचिकाकर्ताओं में भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय, पूर्व राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी, धर्मगुरु स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती और देवकीनंदन ठाकुर, काशी नरेश विभूति नारायण सिंह की बेटी कुमारी कृष्णा प्रिया और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी अनिल कबोत्रा शामिल हैं।
मोटे तौर पर याचिकाओं में कानून को चुनौती देने के लिए कुछ आधारों को उठाया गया है। इस अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती देने का एक मुख्य आधार यह है कि यह उपासना स्थलों पर ऐतिहासिक रूप से जबरन कब्जे को वैध बनाता है। वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि यह अधिनियम पीड़ित हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों को कानूनी उपचार देने से रोकता है।
याचिकाओं में धारा 4(2) की संवैधानिकता पर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं की शिकायत यह है कि यह कानून पीड़ित व्यक्तियों या समुदायों को कानूनी उपायों का सहारा लेने से रोकता है।
तीसरा बड़ा मुद्दा मनमाना और तर्कहीन कट-ऑफ तिथि को बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर भी अधिनियम को चुनौती दी है कि 15 अगस्त 1947 की कट-ऑफ तिथि मनमानी और तर्कहीन है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि उनके धार्मिक स्थलों का विध्वंस या कब्जा सदियों में हुआ है, जिसका 15 अगस्त 1947 की कट-ऑफ से कोई संबंध नहीं है। चौथा बड़ा सवाल कानून में अपवादों को लेकर है।
भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय
- फोटो :
ANI
अदालत में क्या-क्या हुआ?
12 मार्च 2021 को तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अगुवाई वाली एक खंडपीठ ने भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर नोटिस जारी किया। जून 2022 में जमीयत उलमा-ए-हिंद ने याचिका में पक्षकार बनने की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि यह स्पष्ट है कि अश्विनी उपाध्याय ने अप्रत्यक्ष रूप से उन उपासना स्थलों को निशाना बनाने की कोशिश की है जो वर्तमान में इस्लामी चरित्र के हैं।
इसके बाद मई 2022 में वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे की अनुमति देने पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी उपासना स्थल के 'धार्मिक चरित्र' का पता लगाना कानून में वर्जित नहीं है। इसलिए किसी उपासना स्थल के 'धार्मिक चरित्र' को निर्धारित किया जा सकता है, लेकिन इसे बदला नहीं जा सकता है।
नवंबर 2024 में संभल में एक जिला अदालत द्वारा वहां स्थित शाही जामा मस्जिद के सर्वे का आदेश देने के बाद हिंसा भड़क उठी। इसके तुरंत बाद एक अन्य जिला अदालत ने अजमेर में सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के नीचे एक हिंदू मंदिर के अस्तित्व का दावा करने वाले एक दीवानी मुकदमे में नोटिस जारी किया। 6 दिसंबर 2024 को एक जिला अदालत द्वारा जौनपुर में अटाला मस्जिद के नीचे एक हिंदू मंदिर के अस्तित्व को विवादित करने वाले मुकदमे को पंजीकृत करने का निर्देश देने के बाद मस्जिद समिति ने इसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 7 दिसंबर 2024 को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने याचिका पर सुनवाई के लिए जस्टिस पीवी संजय कुमार और केवी विश्वनाथन की सदस्यता वाली एक विशेष पीठ का गठन किया। चुनौती को 12 दिसंबर 2024 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।
12 मार्च 2021 को तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अगुवाई वाली एक खंडपीठ ने भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर नोटिस जारी किया। जून 2022 में जमीयत उलमा-ए-हिंद ने याचिका में पक्षकार बनने की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि यह स्पष्ट है कि अश्विनी उपाध्याय ने अप्रत्यक्ष रूप से उन उपासना स्थलों को निशाना बनाने की कोशिश की है जो वर्तमान में इस्लामी चरित्र के हैं।
इसके बाद मई 2022 में वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे की अनुमति देने पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी उपासना स्थल के 'धार्मिक चरित्र' का पता लगाना कानून में वर्जित नहीं है। इसलिए किसी उपासना स्थल के 'धार्मिक चरित्र' को निर्धारित किया जा सकता है, लेकिन इसे बदला नहीं जा सकता है।
नवंबर 2024 में संभल में एक जिला अदालत द्वारा वहां स्थित शाही जामा मस्जिद के सर्वे का आदेश देने के बाद हिंसा भड़क उठी। इसके तुरंत बाद एक अन्य जिला अदालत ने अजमेर में सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के नीचे एक हिंदू मंदिर के अस्तित्व का दावा करने वाले एक दीवानी मुकदमे में नोटिस जारी किया। 6 दिसंबर 2024 को एक जिला अदालत द्वारा जौनपुर में अटाला मस्जिद के नीचे एक हिंदू मंदिर के अस्तित्व को विवादित करने वाले मुकदमे को पंजीकृत करने का निर्देश देने के बाद मस्जिद समिति ने इसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 7 दिसंबर 2024 को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने याचिका पर सुनवाई के लिए जस्टिस पीवी संजय कुमार और केवी विश्वनाथन की सदस्यता वाली एक विशेष पीठ का गठन किया। चुनौती को 12 दिसंबर 2024 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो :
एएनआई (फाइल)
अभी सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है?
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को निर्देश दिया कि देशभर के धर्मस्थलों या तीर्थस्थलों के संबंध में किसी अदालत में कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। अदालतों में जो मामले पहले से चल रहे हैं, उनमें भी सर्वेक्षण या अन्य कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा। यह रोक तब तक लागू रहेगी जब तक शीर्ष अदालत उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की वैधता निर्धारित करने के लिए दायर याचिकाओं पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाती।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार व जस्टिस केवी विश्वनाथन की विशेष पीठ ने गुरुवार को कहा कि हम 1991 के कानून की वैधता, उसके विस्तार और सीमाओं की समीक्षा करने जा रहे हैं। ऐसे में यह अनिवार्य है कि दूसरी अदालतों को इसमें हाथ डालने से रोका जाए। पीठ ने हालांकि मस्जिदों/दरगाहों जैसे उपासना स्थलों के खिलाफ वर्तमान में लंबित मुकदमों में कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
याचिकाओं की सुनवाई के लिए गठित नई पीठ ने कहा कि चूंकि मामला इस न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए हम यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि मुकदमे दायर किए जा सकते हैं, पर इस न्यायालय के अगले आदेश तक कोई मुकदमा पंजीकृत नहीं किया जाएगा और कार्यवाही नहीं की जाएगी। हम यह भी निर्देश देते हैं कि लंबित मुकदमों में कोई भी अदालत अगली सुनवाई की तारीख तक सर्वेक्षण के आदेश सहित कोई भी प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं करेगी। 1991 के कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को निर्देश दिया कि देशभर के धर्मस्थलों या तीर्थस्थलों के संबंध में किसी अदालत में कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। अदालतों में जो मामले पहले से चल रहे हैं, उनमें भी सर्वेक्षण या अन्य कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा। यह रोक तब तक लागू रहेगी जब तक शीर्ष अदालत उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की वैधता निर्धारित करने के लिए दायर याचिकाओं पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाती।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार व जस्टिस केवी विश्वनाथन की विशेष पीठ ने गुरुवार को कहा कि हम 1991 के कानून की वैधता, उसके विस्तार और सीमाओं की समीक्षा करने जा रहे हैं। ऐसे में यह अनिवार्य है कि दूसरी अदालतों को इसमें हाथ डालने से रोका जाए। पीठ ने हालांकि मस्जिदों/दरगाहों जैसे उपासना स्थलों के खिलाफ वर्तमान में लंबित मुकदमों में कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
याचिकाओं की सुनवाई के लिए गठित नई पीठ ने कहा कि चूंकि मामला इस न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए हम यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि मुकदमे दायर किए जा सकते हैं, पर इस न्यायालय के अगले आदेश तक कोई मुकदमा पंजीकृत नहीं किया जाएगा और कार्यवाही नहीं की जाएगी। हम यह भी निर्देश देते हैं कि लंबित मुकदमों में कोई भी अदालत अगली सुनवाई की तारीख तक सर्वेक्षण के आदेश सहित कोई भी प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं करेगी। 1991 के कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।