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Karwar Naval Base : क्या है कारवार नेवल बेस, जिससे चीन-पाकिस्तान खौफजदा, दोनों देशों पर इससे क्या असर?

Sun, 29 May 2022 11:28 PM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Sun, 29 May 2022 11:28 PM IST
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सार
रक्षा मंत्री के इस दौरे के बाद कारवार नेवल बेस अचानक चर्चा में आ गया है। यह चर्चा यूं ही नहीं हो रही है। इसके पीछे दो बड़े कारण भी हैं।
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What is Karwar Naval Base Why China and Pakistan Scared of Karwar Naval Base Know More Latest News in Hindi
कारवार नेवल बेस - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

24 मई 2022 को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कर्नाटक स्थित देश के दो बड़े नेवल बेस का दौरा किया। इसमें एक कारवार और दूसरा कोच्चि नेवल बेस है। रक्षा मंत्री ने कहा, 'कारवार नेवल बेस को भारत ही नहीं, एशिया का सबसे बड़ा नौसैन्य अड्डा बनाना है। अगर इसके लिए बजट बढ़ाने की जरूरत होगी तो मैं इसकी पूरी कोशिश करूंगा। इस प्रोजेक्ट (सीबर्ड) के तहत देश की पहली सीलिफ्ट फैसिलिटी तैयार हो चुकी है।'


रक्षा मंत्री के इस दौरे के बाद कारवार नेवल बेस अचानक चर्चा में आ गया है। यह चर्चा यूं ही नहीं हो रही है। इसके पीछे दो बड़े कारण भी हैं। पहला यह कि इस नेवल बेस की मदद से चीन और पाकिस्तान दोनों आसानी से काउंटर किया जा सकता है। वहीं, दूसरा यह कि हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी पर नजर रखी जा सकती है। 


आइए जानते हैं कारवार नेवल बेस के बारे में सबकुछ। आखिर क्यों इस बेस को पाकिस्तान और चीन का काउंटर माना जा रहा है? इस बेस का असर पड़ोसी देशों पर कैसे पड़ेगा? भारत के लिए कैसे फायदेमंद साबित होगा ये बेस? 
 

पहले कारवार नेवल बेस के बारे में जान लीजिए

कारवार नेवल बेस
कारवार नेवल बेस - फोटो : अमर उजाला
कर्नाटक स्थित कारवार नेवल बेस अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच में है। इसे एशिया का सबसे बड़ा बेस बनाने पर काम चल रहा है। इस पर करीब तीन अरब डॉलर यानी 23 हजार करोड़ का खर्च आएगा। 11 हजार एकड़ में फैले नेवल बेस के लिए 'प्रोजेक्ट सीबर्ड' को 1999 में मंजूरी मिली थी। इसका काम दो चरणों में होना है। 

पहला चरण : इसका काम 2005 में पूरा हुआ था। इसमें जो बेस बनाया गया है, उसका नाम INS कदम्ब रखा गया है। यह अभी देश में तीसरा सबसे बड़ा नेवल बेस है। पहले चरण के तहत गहरे समुद्र में बंदरगाह, ब्रेकवॉटर ड्रेजिंग, एक टाउनशिप, एक नौसेना अस्पताल, एक डॉकयार्ड अपलिफ्ट सेंटर और एक शिप लिफ्ट का निर्माण किया गया है।

अब दूसरे चरण का काम 2025 तक पूरा होगा। काम पूरा होते ही यह एशिया का सबसे बड़ा नेवल बेस हो जाएगा। इस चरण में अतिरिक्त युद्धपोतों के लिए जगह बनाने की सुविधा के विस्तार के साथ ही एक नए नेवल एयर स्टेशन का निर्माण किया जाना है। कारवार नेवल बेस को युद्धपोतों के बेड़ों को सपोर्ट और उनके रखरखाव की सुविधा देने के लिए बनाया जा रहा है।
 

क्या हैं इस बेस की खूबियां? 

कारवार नेवल बेस में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह।
कारवार नेवल बेस में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह। - फोटो : अमर उजाला
  • कारवार नेवल बेस बनने के बाद यहां 30 से ज्यादा युद्धपोत और सबमरीन तैनात हो सकेंगे। 
  • यहां एक नेवल एयर स्टेशन भी होगा, जिसके लिए तीन हजार फीट लंबा रनवे बनाया जाएगा। 
  • इस नेवल एयर स्टेशन से फाइटर प्लेन भी उड़ान भर सकेंगे।
  • इस नेवल बेस में देश की पहली सीलिफ्ट फैसिलिटी भी मौजूद है। ये जहाजों और सबमरीन के ट्रांसफर सिस्टम और डॉकिंग और अनडॉकिंग के लिए एक विशेष शिपलिफ्ट फैसिलिटी है।

चीन कैसे समुद्री ताकत बढ़ा रहा, भारत कैसे करेगा इसे काउंटर? 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग - फोटो : अमर उजाला
अभी हाल ही में क्वाड सम्मेलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान पहुंचे थे। इस सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री भी शामिल हुए थे। इस बैठक में चारों देशों ने हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में खुद को मजबूत बनाने की सहमति दी। दरअसल हर किसी की चिंता है कि चीन समुद्रों में अपनी ताकत बढ़ा रहा है, जो बाकी देशों के लिए खतरा है। 

पिछले कुछ साल में चीन ने भारत के आसपास मौजूद समुद्री इलाकों में ज्यादा ही दखल देना शुरू कर दिया है। चीन की सबसे ज्यादा मौजूदगी हिंद महासागर में है। हिंद महासागर भारत-चीन समेत प्रमुख ताकतों के लिए रणनीतिक तौर पर अहम है। ये इलाका न केवल खनिज, मछली जैसे संसाधनों से भरपूर है, बल्कि दुनिया भर के कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है।

चीन ने सबसे पहले 2008 में अदन की खाड़ी के पास समुद्री लुटेरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए हिंद महासागर में अपने युद्धपोत उतारे थे। इसके बाद से चीन के युद्धपोत हिंद महासागर से कभी हटे ही नहीं। 2017 में उसने पूर्वी अफ्रीकी देश जिबूती में अपना एक नेवल बेस भी स्थापित कर लिया। चीन पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल की नेवी के लिए भी बंदरगाह बनाने पर काम कर रहा है। हिंद महासागर और भारत के आसपास अपनी ताकत बढ़ाने के लिए चीन लंबे समय से पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार के पोर्ट में निवेश करता रहा है। इन तीनों देशों के लिए वह हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक भी रहा है।

चीन ने अरब सागर में मौजूद पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का भी अधिग्रहण कर लिया है। ग्वादर पोर्ट को रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ग्वादर पोर्ट के जरिए भारत के पश्चिमी तट चीनी नेवी के जद में होंगे, साथ ही इससे वह व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण फारस की खाड़ी और अदन की खाड़ी पर भी दबदबा बना पाएगा।

साथ ही, हिंद महासागर स्थित भारत के सीमावर्ती देश श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट को 99 साल की लीज पर ले चुका है। मालदीव के मराओ पोर्ट और बांग्लादेश में चटगांव पोर्ट को भी अपने कंट्रोल में करने की योजना पर काम कर रहा है।

म्यांमार में भी चीन सबमरीन अड्डा बना रहा है। इसके जरिए वह बंगाल की खाड़ी में अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। चीन सिंगापुर के साथ व्यापार बंगाल की खाड़ी के रास्ते करना चाहता है। इसके लिए म्यांमार में हाईवे बना रहा है। इसके जरिए वह मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित मलक्का जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता घटाना चाहता है, क्योंकि यहां भारत मजबूत स्थिति में है। इसी रास्ते से चीन की कुल जरूरतों का 80 फीसदी व्यापार होता है, इसीलिए वह इसे खत्म करना चाहता है।

चीन की आक्रामकता से निपटने के लिए भारत ने हिंद महासागर में पांच महत्वपूर्ण चोक पॉइंट्स पर अपने युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। इन पांच समुद्री चोक पॉइंट्स में पश्चिम स्थित अदन की खाड़ी से लेकर पूर्व में स्थित मलक्का जलडमरूमध्य शामिल हैं, जिनसे होकर दुनिया के कुल तेल का करीब 40 फीसदी उत्पादन करने वाले खाड़ी देशों से चीन, भारत समेत बड़े एशियाई देशों को निर्यात होता है। 

चीन और पाकिस्तान को समुद्री खेल में मात देने के लिए भारत ने पिछले साल अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया की नेवी के साथ मिलकर 50 संयुक्त युद्धाभ्यास करते हुए रिकॉर्ड बनाया था। यही कारण है कि चीन में भी हलचल तेज हो गई है। भारत को समुद्री इलाकों में मजबूत बनाने के लिए अमेरिका भी मदद कर रहा है। 
 

भारत को कारवार बेस से क्या फायदा? 

कारवार नेवल बेस में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह।
कारवार नेवल बेस में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह। - फोटो : अमर उजाला
द नेवल फोर्स ऑफ वर्ल्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कारवार नेवल बेस की भौगोलिक स्थिति उसे सैन्य से लेकर व्यापार तक हर मामले में खास बनाती है। कारवार पश्चिमी घाट की उबड़-खाबड़ पहाड़ियों और अरब सागर के बीच स्थित नौसैनिक अड्डा है। ये मुंबई, गोवा और नॉर्थ कोच्चि के साउथ में स्थित है।

इसकी वजह से कारवार नेवल बेस चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के ज्यादातर फाइटर प्लेन की रेंज से दूर होगा। साथ ही ये दुनिया के सबसे व्यस्त जहाजों के रूट फारस की खाड़ी और पूर्वी एशिया के बहुत करीब स्थित है।

कारवार से भारत अरब सागर और हिंद महासागर दोनों इलाकों की निगरानी कर सकता है। यहां चीन और पाकिस्तान सी बढ़ती गतिविधियों को काउंटर कर सकता है। कारवार से भारतीय नौसेना के लिए अरब सागर और हिंद महासागर दोनों जगह पहुंचना आसान होगा।
 

हिंद महासागर क्यों है जरूरी है? 

हिंद महासागर
हिंद महासागर - फोटो : अमर उजाला
विस्तारवादी नीतियों को बढ़ाते हुए चीन दुनिया के कई देशों को कर्ज के जाल में फंसा चुका है। पाकिस्तान, नेपाल, मालदीव और श्रीलंका की सरहद पर चीन की बुरी निगाह पहले से रही है। फिलहाल ग्वादर (पाकिस्तान), ओमान, जिबूती (अदन की खाड़ी), मराओ अटॉल (मालदीव), हंबनटोटा (श्रीलंका), कुआंटन (मलेशिया), सोनाडिया (बांग्लादेश) पर नियंत्रण चीन के पास है। हिंद महासागर का इलाका तेल, खनिज, मछली जैसे संसाधनों से भरपूर है। दुनिया भर के कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। वहीं, भारत का युद्धपोत मुंबई, कारवार, कोच्चि, पोर्ट ब्लेयर, विशाखापट्टनम में तैनात है।
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