जब अविश्वास प्रस्ताव पर ताकती रह गई कांग्रेस
मोदी सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव तो मंजूर हो गया, लेकिन सरकार की सहमति और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इसे मंजूर किए जाने तक जमकर दांव-प्रतिदांव चले। सत्ता पक्ष (एनडीए और सहयोगी दल) ने पहली बाजी जीत ली और विपक्ष खासकर कांग्रेस टापती रह गई। उसे बड़ा झटका तब लगा जब संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने टीडीपी के प्रस्ताव पर सहमति जताते हुए सरकार के चर्चा में भाग लेने और मत विभाजन पर तैयार होने की सहमति जता दी। इसके बाद आगे की प्रक्रिया लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने पूरी कर दी। अब कांग्रेस की कोशिश अविश्वास प्रस्ताव के पार्ट-2 पर है।
क्यों टापती रह गई कांग्रेस
टीडीपी का अविश्वास प्रस्ताव आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न देने की मुख्य मांग के साथ जुड़ा है। अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस के लोकसभा में सदन में नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने कई बार नोटिस दे रखा है। विपक्षी दलों की बैठक में भी कांग्रेस समेत अन्य ने अविश्वास प्रस्ताव को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाई थी। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सर्व दलीय बैठक में सत्ता पक्ष विपक्ष के तेवर भांप गया था।
कांग्रेस को उम्मीद थी कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और फिर मत विभाजन उसके द्वारा दी गई नोटिस पर होगा। वैसे भी कांग्रेस भाजपा के बाद लोकसभा में संख्या बल में दूसरी पार्टी है। यह बात अलग है कि उसके पास संख्या बल कम होने के कारण कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा नहीं दिया गया है। ऐसे में उसे पहला झटका तब लगा जब टीडीपी की नोटिस पर अविश्वास प्रस्ताव मंजूर हो गया। इसके बाद मल्लिकार्जुन खडग़े खड़े हुए। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से कहा भी कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कई नोटिस दिया था, लेकिन नियमों का हवाला देकर लोकसभा अध्यक्ष ने आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी।
सरकार की रणनीति कामयाब
संसदीय कार्यमंत्री की पहली रणनीति काम रही। अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मंजूर होने के बाद अब लोकसभा में दल और उनके सदस्यों की संख्या के हिसाब से चर्चा के लिए समय का आवंटन होगा। लेकिन इसमें सबसे अहम है कि अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की शुरूआत टीडीपी करेगी। इसके बाद इसके समर्थन में या विरोध में अपना पक्ष रखने के लिए कांग्रेस समेत अन्य दलों का नंबर आएगा। जिस राजनीतिक दल का अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मंजूर होता है, वह चर्चा की शुरूआत ही नहीं करता, बल्कि चर्चा की शुरूआत करने वाले उसके नेता को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त समय दिया जाता है।
अगले साल लोकसभा के साथ आंध्र प्रदेश राज्य विधानसभा चुनाव होने हैं। आंध्र प्रदेश में जनता टीडीपी प्रमुख और राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से नाराज चल रही थी। इसी को ध्यान में रखकर मोदी सरकार की सहयोगी रही टीडीपी ने समर्थन वापस ले लिया था। ऐसे में जाहिर है टीडीपी अपने ऐजेंडे हिसाब से चर्चा की शुरूआत करने को प्राथमिकता देगी।
सरकार को पता थी कमजोर नस
सत्ता पक्ष (सरकार) को विपक्ष की कमजोर नस का अंदाजा था। विपक्ष के लिए अपने कुनबे में टीडीपी को शामिल करना मजबूरी है। टीडीपी तीन साल से अधिक समय तक सरकार के साथ थी और इसने अचानक केन्द्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।
वैसे भी एनडीए की पिछली सरकार के समय भी टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू इसके (एनडीए) के संयोजक थे। विपक्ष के पास वैसे भी लोकसभा में संख्या बल कम है। कम संख्या बल होने के साथ-साथ विपक्षी एकता को बनाए रखना कांग्रेस पार्टी की बसे बड़ी मजबूरी है। इसलिए कांग्रेस को इस पर साथ देनी ही है। सत्ता पक्ष को विपक्ष की इस स्थिति का भरपूर अंदाजा है। लिहाजा केन्द्र सरकार से धीरे से अपना तुरुप का पत्ता सरका दिया।
कांग्रेस का पार्ट-2
अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को मंजूर किए जाने के बाद अब इस पर चर्चा और मत विभाजन दोनों शुक्रवार 20 जुलाई को प्रस्तावित है। सात घंटे की प्रस्तावित चर्चा के जहां इससे भी अधिक समय तक चलने की पूरी संभावना है, वहीं सत्ता पक्ष और विपक्ष की तरफ से तंज, व्यंग भी खूब चलने की उम्मीद की जा रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक दूसरे के जहर बुझे तीरों से लहू-लुहान होने के लिए तैयार हैं।
वहीं कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव पार्ट-2 के लिए तैयारी कर रही है। पार्टी की कोशिश है कि वह अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्षी दलों में सबसे अधिक संख्याबल होने तथा राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण अपना दबदबा बनाए रखे। साल के अंत में मिजोरम, राजस्थान, म.प्र., छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। इसलिए पार्टी के नेता मोदी सरकार को घेरने की जोरदार तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए लोकसभा से लेकर संसद भवन परिसर और बाहर पार्टी मुख्यालय तक सत्ता पक्ष और विपक्ष ने मीडिया में प्रचार-प्रसार के लिए जोरदार तैयारी कर रखी है।