राहुल गांधी को अध्यक्ष न बनाएं तो कांग्रेस के पास नया विकल्प ही क्या है?
- कांग्रेस पार्टी के पास कोई दूसरा सर्वमान्य नेता है ही नहीं
- पार्टी को नेता से ज्यादा संकट मोचक मैनेजर की जरूरत
- सोनिया गांधी की 2004 जैसी टीम हो तो बने कोई बात
विस्तार
कांग्रेस पार्टी केंद्रीय नेतृत्व के नए झंझावात में फस गई है। पार्टी के 23 नेताओं द्वारा पत्र लिखने, बिहार चुनाव के बाद वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के सवाल उठाने और गुलाम नबी आजाद द्वारा इसका समर्थन कर देने के बाद कांग्रेस पार्टी का अंदरूनी कलह बढ़ रही है, लेकिन कांग्रेस पार्टी में अभी कोई जितेन्द्र प्रसाद जैसा चेहरा भी नहीं है जो सोनिया गांधी की तरह राहुल के खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ सके। फिलवक्त कांग्रेस के भीतर घमासान छिड़ा है। पार्टी अंदरूनी तौर पर दो फाड़ की स्थिति में है और इस बार निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने की संभावना कम है।
पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कांग्रेस के नेतृत्व के सवाल पर कहा है कि पार्टी में नेतृत्व का कोई संकट नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को सभी का समर्थन है। हालांकि, पूर्व केंद्रीय मंत्री के इस बयान पर पार्टी के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि कार्यकर्ताओं में पार्टी की मौजूदा स्थिति को लेकर असमंजस की स्थिति है और वह निराश भी हैं। यह सब सही है, लेकिन सोनिया गांधी या राहुल गांधी अथवा प्रियंका गांधी के सिवाय कोई कांग्रेस को एक सूत्र में नहीं बांध सकता। कांग्रेस टूट-फूट जाएगी?
कांग्रेस को संकट मोचक मैनेजर की जरूरत
कांग्रेस की रीति-नीति को समझने वाले कई नेता हैं। देश की सबसे पुराने पार्टी के एक नेता गुरुग्राम में हैं। दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में भी पार्टी के एक दिग्गज रहते हैं। लुटियन जोन में रहने वाले एक नेता ने बाहरी तौर पर खुद को सभी गतिविधियों से प्रत्यक्ष तौर पर काफी दूर कर लिया है। लेकिन परोक्ष रूप से वह लगातार सक्रिय बने हुए हैं। गंगा-जमुनी तहजीब वाले भी कुछ नेता हैं। पिछले एक सप्ताह के व्यापक मंथन के बाद यही निकलकर आया कि कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी विश्वसनीयता बनाने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
राहुल गांधी का राजनीति करने का तरीका सोनिया गांधी से बिल्कुल उलट और कांग्रेस की संस्कृति से बहुत कम इत्तेफाक रखने वाला है। दूसरी तरफ सोनिया गांधी का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा है। इसलिए कांग्रेस को पार्टी के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल की तरह एक संकट मोचक मैनेजर की जरूरत है। ऐसा मैनेजर जिसे पार्टी के नस-नस की जानकारी हो, सत्ता पक्ष को समझता हो और अंदरुनी मोर्चे कांग्रेस को अपने नेताओं से संभाल सके। इस बारे में कांग्रेस के एक राज्य के मुख्यमंत्री साफ कहते हैं कि हमारी किश्ती वहीं डूब रही है, जहां पानी बहुत कम है। कांग्रेस को बाहर की चुनौतियों से उतना बड़ा खतरा नहीं है। पिछले पांच साल से कांग्रेस अंतर्कलह से जूझ रही है।
कांग्रेस में अब कितने अमरिंदर सिंह हैं?
कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव हैं। पंजाब के प्रभारी रहे हैं। वह कहते हैं कि मुझे तो एक-दो अमरिंदर सिंह दिखाई देते हैं। वह कहते हैं कि पूरी कांग्रेस टटोलता हूं तो एकाध भूपेश बघेल नजर आते हैं। गिने-चुने ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं और इनको या इनके इगो को संभालकर नहीं रखिएगा तो वह पार्टी छोड़कर चले जाएंगे। सचिन पायलट भी एकाध ही हैं, जो कड़ी मेहनत करके राज्य में सरकार बनवाने की कोशिश करते हैं और बाद में फ्रस्टेशन का शिकार होने लगते हैं। लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत की कोई भी कमी नहीं है।
सूत्र का कहना है कि चाहे महाराष्ट्र देख लीजिए या फिर उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल, गुजरात, मध्यप्रदेश, कोलकाता, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत। ऐसा होता तो हमें गुजरात में हार्दिक पटेल या कर्नाटक में सिद्धारमैय्या की जरूरत ही क्या थी? हेमंत बिस्व सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में क्यों जाते? यहां तक कि पूरे उत्तर प्रदेश में अब कांग्रेस के पास नेता ही नहीं है? हां, कांग्रेस के पास राज्यसभा की कैटेगरी वाले नेता हैं, लेकिन राज्यसभा के रास्ते संसद में पहुंचने का अवसर ही सिमट गया है।
क्या नया अध्यक्ष संभाल लेगा कांग्रेस?
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय में उनकी खूब चलती थी। इंदिरा गांधी के जमाने वाले नेता के शरीर में रक्त का प्रवाह बहुत शिथिल हो चला है। आर्थिक उदारवाद, तकनीक और सामाजिक बदलाव ने भी काफी कुछ बदल दिया है। इसलिए राजीव गांधी के दौर से पीछे जाना ठीक नहीं है। 2000-2001 के बाद वाले अधिक नेता पांच सितारा संस्कृति की राजनीति के आदी हैं। बड़ी संख्या में मिलिंद देवड़ा सरीखे नेता हैं।
नए दौर की एक तेज तर्रार महिला नेता का कहना है कि नाम मत छापिए। बस नेहरू-गांधी परिवार से अलग एक नाम बताइए जो कांग्रेस को संभाल पाए? नए अध्यक्ष के सवाल पर सूत्र का कहना है कि कांग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसलिए नया अध्यक्ष चुनना पार्टी के सामने सबसे बड़ी मजबूरी है। सूत्र का कहना है कि जो भी नया अध्यक्ष आएगा, वह कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी और शायद 70 के दशक वाली इंदिरा गांधी जैसी चुनौती से उसे निपटना पड़ेगा।
क्या राहुल या प्रियंका के सिवाय नहीं दूसरा विकल्प?
बड़ी ही गूढ़ सवाल है। इसका जवाब आसान नहीं हैं। बंगलूरू में अब राज्य की राजनीति की तरफ लौट चुके एक पूर्व महासचिव यह कहकर चुप्पी साध लेते हैं कि कांग्रेस पार्टी को समझना इतना आसान नहीं है। इसलिए मेरी सलाह है कि इंतजार कीजिए। समय सब बताएगा। तमिलानाडु से एसवी रमणी कहते हैं कि पार्टी के भीतर बड़ी चुनौतियां। मुझे अफसोस है कि लोग चुनौतियों को गिना देते हैं, लेकिन समस्याओं के समाधान के लिए न तो पार्टी के फोरम पर आगे आते हैं और न ही क्षेत्र में जनता के बीच।
महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव राहुल गांधी को लेकर बहुत आशावादी हैं। वह कहती हैं कि राहुल गांधी के साथ पूरी कांग्रेस पार्टी खड़ी है। कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव कहते हैं कि यह बात ताम्र पत्र पर लिखवा लीजिए, राहुल गांधी या प्रियंका के सिवाय किसी अन्य ने कमान संभाली तो कांग्रेस पार्टी में टूट-फूट होकर कई राजनीतिक दल बन जाएंगे। वह कहते हैं कि इन दोनों में से किसी के भी अध्यक्ष बनने पर कुछ नेता नाराजगी बस घर बैठ सकते हैं या पार्टी छोड़ सकते हैं, लेकिन कांग्रेस बची रहेगी।
कैसा रहेगा अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी का दूसरा कार्यकाल?
इस सवाल पर एक पूर्व केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि वह कल्पना पर आधारित सवाल का उत्तर नहीं देते। बहुत कुरेदने पर केवल इतना कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह ने भारतीय राजनीति को नया आधार दे दिया है। इसलिए चुनौती बहुत कड़ी रहेगी। हरियाणा के एक युवा नेता का भी मानना है कि राहुल गांधी को बाहरी और आंतरिक चुनौतियों से जूझना पड़ेगा।
समाजवादी पृष्ठभूमि से कांग्रेसी बने एक नेता का कहना है कि राहुल गांधी जिस सोच और उद्देश्य को लेकर जैसे पार्टी पहले कार्यकाल के दौरान पार्टी में बदलाव कर रहे थे, उनक वह तरीका बदलना पड़ेगा। तभी वह सफल हो सकेंगे। सूत्र का कहना है कि साल 2003 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जिस कुशलता से टीम बनाई थी, उस मॉडल पर अमल करना पड़ेगा। वरना कांटे तो हैं ही।