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राजनीति: बुद्धदेब भट्टाचार्य ने ना की होतीं ये 5 गलतियां तो बंगाल की सत्ता में कभी नहीं आतीं ममता

Tue, 16 Mar 2021 03:45 PM IST
कुमार संभव कुमार सम्भव जैन, अमर उजाला, कोलकाता
कुमार सम्भव जैन, अमर उजाला, कोलकाता Published by: कुमार संभव Updated Tue, 16 Mar 2021 03:45 PM IST
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west bengal assembly election 2021 buddhadeb bhattacharya five big mistakes which cleared political path of mamata banerjee
बुद्धदेब भट्टाचार्य (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook

यूं तो पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के मुकाबले पर पूरे देश की नजरें बनी हुई हैं। दरअसल, भाजपा की सीधी टक्कर 10 साल से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से है। वहीं, कांग्रेस ने उस लेफ्ट के साथ गठबंधन किया है, जिसने बंगाल पर लगातार 34 साल तक राज किया। अब सवाल यह उठता है कि 34 साल बंगाल की सत्ता संभालने वाली कम्युनिस्ट पार्टी अब गठबंधन की स्थिति में कैसे पहुंच गई? और 2011 में जब लेफ्ट का किला ढहने वाला था, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कौन-सी पांच गलतियां कीं, जिन्होंने ममता को सत्ता का सिरमौर बना दिया? 

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नंदीग्राम आंदोलन ना रोक पाना

तारीख 14 मार्च, लेकिन साल 2007...दरअसल, इस दिन नंदीग्राम में खूनी हिंसा हुई और पुलिस की गोली से 14 लोगों की मौत हो गई। इस हिंसा ने बंगाल की राजनीति पूरी तरह बदल दी और 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका। दरअसल, इस आंदोलन की शुरुआत भूमि अधिग्रहण से हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य वामपंथियों की उद्योग विरोधी छवि को बदलना चाहते थे। इसके तहत नंदीग्राम में पेट्रोकेमिकल हब बनाने की योजना तैयार की गई, जो किसानों को मंजूर नहीं थी। तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया। कहा जाता है कि बुद्धदेब भट्टाचार्य लोगों की मंशा समझने में नाकाम रहे, जिसके चलते नंदीग्राम की जमीन लहू से लाल हो गई। ऐसे में 2011 के विधानसभा चुनाव में माकपा के खिलाफ तगड़ी एंटी इनकमबैंसी बन गई और लोगों ने 'लाल सलाम' को 'आखिरी सलाम' बोल दिया।

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सिंगूर में औद्योगीकरण की जमीन

नंदीग्राम जैसी समस्या सिंगूर में भी सामने आई। तत्कालीन लेफ्ट सरकार ने सिंगूर में टाटा मोटर्स को कार बनाने का प्लांट लगाने की मंजूरी दे दी। इसके बाद जमीन अधिग्रहण शुरू हुआ तो किसानों में उबाल आ गया। दरअसल, उस दौर में लोग भूखे मरने को तैयार थे, लेकिन अपनी जमीन का सौदा किसी भी कीमत पर नहीं करना चाहते थे। नंदीग्राम की तरह सिंगूर में भी आंदोलन हुआ, जिसने ममता बनर्जी को सत्ता की सीढ़ी थमा दी। दरअसल, इन दोनों आंदोलनों ने ही सियासी पथ पर ममता का रास्ता साफ कर दिया।

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माओवादियों का बढ़ता असर

पश्चिम बंगाल में 34 साल तक कम्युनिस्ट पार्टी का शासन रहा, लेकिन उस दौरान ही राज्य में माओवादियों का दबदबा भी बढ़ता चला गया। सरकार से इतर अपनी पंचायत और अपना कानून जैसे कदम कम्युनिस्ट पार्टी के लिए घातक साबित हुए। आखिर में लालगढ़ पर माओवादियों के कब्जे ने लोगों में उनके प्रति सहानभूति को पूरी तरह खत्म कर दिया और इसका नुकसान तत्कालीन बुद्धदेब भट्टाचार्य सरकार को उठाना पड़ा। दरअसल, इस घटना में माओवादियों ने लालगढ़ के 50 से ज्यादा गांवों पर कब्जा कर लिया था, जिनमें करीब 40 हजार लोग रहते थे। आंदोलनकारियों ने पुलिस को खदेड़ दिया था। साथ ही, कई सरकारी दफ्तरों, पुलिस थानों और सीपीएम के कार्यालयों में आग लगा दी।

जंगल महल वाले जिलों में पुलिस का कमजोर रवैया

पश्चिम बंगाल के चार जिलों लालगढ़, पश्चिमी मिदिनापुर, बांकुड़ा और पुरुलिया का इलाका जंगल महल कहलाता है। दरअसल, कभी माओवादियों के आतंक से कुख्यात हो चुके इस इलाके ने भी सीपीएम के ढहते किले पर करारी चोट की। बता दें कि साल 2008 के अंत तक जंगल महल में माओवादियों की गतिविधियां काफी ज्यादा बढ़ गईं। यहां माओवादियों के खौफ के चलते पुलिस का रवैया बेहद कमजोर रहा, जिससे लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती गई।

माकपा में दूसरी पंक्ति के नेताओं की कमी

माकपा ने बंगाल पर 34 साल राज किया। पहले सत्ता ज्योति बसु ने संभाली और साल 2000 में उन्होंने अपनी गद्दी बुद्धदेब भट्टाचार्य को सौंप दी। बुद्धदेब भट्टाचार्य ने अपने शासनकाल में सिंगूर-नंदीग्राम जैसी बड़ी गलतियां कीं। साथ ही, उन पर माओवादियों पर लगाम नहीं लगा पाने के आरोप भी लगे। इसके अलावा माकपा ने एक बेहद अहम बात भी नजरअंदाज कर दी, जिसका नुकसान उसे 2011 के विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ा। दरअसल, माकपा ने मुख्यमंत्री फेस बुद्धदेब भट्टाचार्य को बनाए रखा, लेकिन पार्टी ने दूसरी पंक्ति के नेता तैयार नहीं किए। ऐसे में बुद्धदेब की असफलता के बाद लोगों को विकल्प के तौर पर ममता बनर्जी ज्यादा बेहतर नजर आईं। 

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