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Marital Dispute: कौमार्य परीक्षण कराने को लेकर वैवाहिक विवाद पर लगनी चाहिए रोक, विशेषज्ञ ने दी यह राय
Fri, 04 Nov 2022 03:45 AM IST
वीरेंद्र शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: वीरेंद्र शर्मा
Updated Fri, 04 Nov 2022 03:45 AM IST
सार
2018 में फोरेंसिक मेडिसिन प्रोफेसर ने मेडिकल पाठ्यक्रम से वर्जिनिटी टेस्ट को हटाने की मांग करते हुए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को एक रिपोर्ट सौंपी थी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : amar ujala
विस्तार
महाराष्ट्र के फोरेंसिक मेडिसिन प्रोफेसर ने यौन उत्पीड़न मामले में कौमार्य परीक्षण (टू-फिंगर/वर्जिनिटी टेस्ट) की प्रथा पर रोक लगाने पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (एमजीआईएमएस) में कार्यरत डॉक्टर इंद्रजीत खांडेकर ने 2010 में कौमार्य परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि कौमार्य परीक्षण का यह कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। वैवाहिक विवादों के मामले में भी इसपर रोक लगनी चाहिए।
2018 में उन्होंने मेडिकल पाठ्यक्रम से वर्जिनिटी टेस्ट को हटाने की मांग करते हुए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को एक रिपोर्ट सौंपी थी। डॉ. खांडेकर ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यह मानव अधिकारों का उल्लंघन करता है और लिंग भेदभाव को बढ़ाता है। दरअसल, कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के मामले में कौमार्य परीक्षण की निंदा करते हुए कहा कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, ऐसा करने से यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को पीड़ित किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश जारी करते हुए कहा कि कौमार्य परीक्षण किया जाता है तो वह निर्देशों का उल्लंघन होगा।
यह अपमानजनक प्रथा
खांडेकर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि कौमार्य परीक्षण एक अवैज्ञानिक, अमानवीय, अपमानजनक और भेदभावपूर्ण प्रथा है जो एक महिला की गरिमा का उल्लंघन करती है।
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2018 में उन्होंने मेडिकल पाठ्यक्रम से वर्जिनिटी टेस्ट को हटाने की मांग करते हुए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को एक रिपोर्ट सौंपी थी। डॉ. खांडेकर ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यह मानव अधिकारों का उल्लंघन करता है और लिंग भेदभाव को बढ़ाता है। दरअसल, कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के मामले में कौमार्य परीक्षण की निंदा करते हुए कहा कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, ऐसा करने से यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को पीड़ित किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश जारी करते हुए कहा कि कौमार्य परीक्षण किया जाता है तो वह निर्देशों का उल्लंघन होगा।
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यह अपमानजनक प्रथा
खांडेकर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि कौमार्य परीक्षण एक अवैज्ञानिक, अमानवीय, अपमानजनक और भेदभावपूर्ण प्रथा है जो एक महिला की गरिमा का उल्लंघन करती है।
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