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राम मंदिर की नींव: विजय कौशल महाराज का खुलासा, इंदिरा गांधी भी चाहती थीं अयोध्या में बने मंदिर

Thu, 30 Jul 2020 07:35 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 30 Jul 2020 07:35 PM IST
सार

  • राम जन्मभूमि आंदोलन के संस्थापकों में से एक विजय कौशल जी महाराज से अमर उजाला डॉट कॉम की विशेष बातचीत
  • 6 मार्च 1983 को मुजफ्फरनगर में हिन्दू जागरण मंच के तले रखी गई थी इस आंदोलन की नींव  

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Vijay Kaushal Ji Maharaj revealed, Late former PM Indira Gandhi also wanted Ram temple built in Ayodhya
इंदिरा गांधी - फोटो : File Photo

विस्तार

राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन के संस्थापकों में से एक विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं भी यही चाहती थीं कि अयोध्या में राम मंदिर बने। लेकिन इसके लिए वे स्वयं खुलकर सामने नहीं आना चाहती थीं, लेकिन पीछे से इस आंदोलन को उनका भी पूर्ण समर्थन प्राप्त था। यहां तक कि जब 6 मार्च 1983 को मुजफ्फरनगर में हिन्दू जागरण मंच के तले इस आंदोलन की नींव रखी गई थी, तब उनके ही कहने पर दिग्गज कांग्रेसी नेता दाऊ दयाल खन्ना इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

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कौशल जी महाराज बताते हैं कि स्वयं दाऊ दयाल खन्ना ने उन्हें यह बात बताई थी कि इंदिरा गांधी भी अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने को लेकर सहमत हैं। लेकिन एक सेक्युलर दल होने के कारण वे खुलकर सामने आकर इस आंदोलन को अपना समर्थन नहीं दे सकती थीं। उन्होंने कहा कि यह केवल इंदिरा गांधी की ही बात नहीं थी, उस समय कांग्रेस में ऐसे हजारों नेता थे जो अयोध्या में राम मंदिर बनने का समर्थन करते थे, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते वे सामने नहीं आए।

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विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि राजीव गांधी, चंद्रशेखर और पीवी नरसिंहा राव सबके समय में हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्षों को एक मंच पर लाकर इस मुद्दे पर सहमति बनाने की कोशिश हुई थी, लेकिन कांग्रेस के कुछ नेता इसका श्रेय भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद् के पक्ष में नहीं जाने देना चाहते थे, जिसके कारण वार्ता पूर्ण नहीं हो पाई अन्यथा यह कार्य 25-30 साल पहले ही हो गया होता।

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वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें

विजय कौशल जी महाराज ने बताया कि राम जन्मभूमि आंदोलन की नींव 6 मार्च 1983 को मुजफ्फरनगर में रखी गई थी। उस समय हिन्दू जागरण मंच के संयोजक दिनेश त्यागी हुआ करते थे और उन्हीं के नेतृत्व में राम मंदिर आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए पांच हजार लोगों की भीड़ एकत्र करने का लक्ष्य लेकर कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी। 

लेकिन आयोजन के दिन कम से कम एक लाख लोगों की भीड़ सभा स्थल पर पहुंच गई थी। इस कार्यक्रम में आरएसएस के शीर्ष पदाधिकारी राजेंद्र सिंह रज्जू भैया और पूर्व प्रधान मंत्री गुलजारीलाल नंदा भी शामिल हुए थे।  

उन्होंने बताया कि उस समय अशोक सिंघल आरएसएस के दिल्ली प्रांत प्रचारक हुआ करते थे। आरएसएस ने उन्हें विहिप में भेजकर राम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी। कौशल जी महाराज ने बताया कि उन्होंने ही ईंट यज्ञ की संकल्पना रखी थी, जिसके तहत भारत के पांच लाख गांवों से शिलापूजन कर ईंट लाई गईं।

तथ्य यह भी है कि जब राम जन्मभूमि पर शिलान्यास का कार्यक्रम हुआ, और 1986 में मंदिर का ताला खोला गया, तब कांग्रेसी नेता राजीव गांधी ही देश के प्रधानमंत्री थे। उस समय उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेसी सरकार थी और वीर बहादुर सिंह इसके मुख्यमंत्री थे। लोग मानते हैं कि राम मंदिर आंदोलन की राह की इस सफलता में भी कांग्रेस का सहयोग था क्योंकि अगर प्रशासन न चाहता तो शिलान्यास कार्यक्रम कभी न हो पाता।

भाजपा तो इस आंदोलन में 1988 में शामिल हुई, जब उसने पालमपुर अधिवेशन में इसे एक प्रस्ताव के रूप में स्वीकार किया। हालांकि, यह एक सच्चाई है कि उसके इस आंदोलन में आने से इसे एक राजनीतिक तेजी प्राप्त हुई, जिसने इस आंदोलन को आगे बढ़ने में योगदान दिया।



तथ्यात्मक जानकारी यह है कि जब 1949 में अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति रखी गई थी, तब पंडित जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रधानमंत्री थे। जब 1983 में राम मंदिर आंदोलन शुरू हुआ, तब स्वयं इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। अयोध्या के मंदिर पर लगे ताले को खुलवाने के लिए राजीव गांधी की भूमिका सभी जानते हैं।

कोरोना काल बाद होता कार्यक्रम तो अच्छा होता

उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में बेहद सीमित लोगों को शामिल होने की अनुमति दी गई है। इसलिए अगर यह कार्यक्रम कोरोना के बाद किया गया होता तो बेहतर होता। उन्होंने उम्मीद जाहिर की है कि जब यह मंदिर पूर्ण होगा, तब इसके उद्घाटन समारोह में सभी शंकराचार्यों को बुलाया जाएगा। उनका कहना है कि यह राष्ट्रीय महत्त्व का कार्य है, इसलिए इसमें सभी राजनीतिक दलों की भूमिका भी होनी चाहिए। इससे इस कार्यक्रम की गरिमा बढ़ेगी।

 

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