फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Uttar Pradesh: "Mission D" is being prepared in UP for the Lok Sabha, will Dalits get out of Mayawati's hands?

Uttar Pradesh: लोकसभा के लिहाज से यूपी में तैयार हो रहा "मिशन डी", क्या मायावती के हाथ से निकल जाएंगे दलित

Fri, 06 Oct 2023 05:18 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Fri, 06 Oct 2023 05:18 PM IST
सार

Uttar Pradesh: राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में दलित वोट को जोड़ने की सियासत चल रही है। लेकिन इन सबसे इतर उत्तर प्रदेश में जिस तरीके से दलित वोट को अपने साथ जोड़ने की राजनीतिक दलों ने सियासी जंग शुरू की है वह बहुत रोचक हो चली है।

विज्ञापन
Uttar Pradesh: "Mission D" is being prepared in UP for the Lok Sabha, will Dalits get out of Mayawati's hands?
मिशन डी - फोटो : amarujala.com

विस्तार

सियासी रोड मैप तो आने वाले विधानसभा के चुनावों को लेकर चार प्रमुख चुनावी राज्यों में तैयार किया जा रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासत में लोकसभा का जो सियासी रोड मैप और तस्वीर तैयार की जा रही है वह सबसे अलग है। सियासत की इस तस्वीर में सभी राजनीतिक दल बसपा के कोर वोट बैंक के माध्यम से अपनी-अपनी सियासी इबारत लिखने की न सिर्फ तैयारी कर रहे हैं बल्कि दलितों के लिए बड़ा मंच भी तैयार कर रहे हैं। सियासी गलियारों में चर्चाएं इस बात की सबसे ज्यादा हो रही है कि अखिलेश के पीडीए और कांग्रेस के पासी, जाटव वोट पर निशाना लगाने के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरीके से दलित सम्मेलन की तैयारी की है उससे कहीं ऐसा ना हो कि मायावती के कर वोट बैंक में जमकर सेंधमारी हो जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी की सियासत में तैयार किए जा रहे "मिशन डी" यानी मिशन दलित का बड़ा व्यापक असर आने वाले लोकसभा के चुनाव में देखने को मिल सकता है। 

विज्ञापन


राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में दलित वोट को जोड़ने की सियासत चल रही है। लेकिन इन सबसे इतर उत्तर प्रदेश में जिस तरीके से दलित वोट को अपने साथ जोड़ने की राजनीतिक दलों ने सियासी जंग शुरू की है वह बहुत रोचक हो चली है। राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र शुक्ला कहते हैं कि राज्य में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपने पीडीए मॉडल से दलितों को साधने की पूरी सियासी बिसात बिछा चुके हैं। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने हाल में हुए उपचुनाव में अपनी जीत का पूरा श्रेय इसी पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक को ही दिया था। समाजवादी पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी की ओर से जारी दिशा निर्देशों के मुताबिक सभी कार्यकर्ता और पदाधिकारी पीडीए के मुताबिक ही अपने गठबंधन को न सिर्फ मजबूत कर रहे हैं बल्कि आगे की सियासी राह को भी बढ़ा रहे हैं। पार्टी इसी योजना के मुताबिक आने वाले दिनों में होने वाले सम्मेलनों में दलित पिछड़ा और अल्पसंख्यकों को न सिर्फ मजबूती के साथ आगे रखा जाएगा बल्कि उनके क्षेत्र और इलाकों में पार्टी के बड़े-बड़े जिम्मेदार नेताओं और पदाधिकारी को भी बृहद स्तर पर भेजने की योजना है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि अखिलेश यादव ने जिस पीडीए की बात की है दरअसल समाज में इस तबके के लोगों लोगों के साथ मिलकर देश और प्रदेश के बेहतर निर्माण में आगे बढ़ा जा सकता है।
विज्ञापन


समाजवादी पार्टी जिस तरीके से उत्तर प्रदेश में पिछड़े दलित और अल्पसंख्यकों के माध्यम से अपनी सियासी राह बना रही है ठीक उसी तर्ज पर कांग्रेस ने भी दलितों को अपने पाले में रखने का एक बड़ा दांव खेला है। हालांकि यह दांव शुरुआती दौर में तो दलितों की एक बिरादरी पासी समुदाय पर फोकस करते हुए किया है लेकिन पार्टी सिर्फ पासी ही नहीं बल्कि जाटव समेत अन्य दलित को अपने साथ जोड़ने का मेगा अभियान चलाने जा रही है। कांग्रेस पार्टी की ओर से जारी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारी को निर्देश के मुताबिक व अपने-अपने क्षेत्र और इलाकों में दलित समुदाय के साथ भोज करें और उनको संगठनात्मक स्तर पर जोड़ें। इसके साथ-साथ आगे की रणनीतियों के लिए वरिष्ठ पदाधिकारी के संग बैठकों का आयोजन करने का निर्देश तो मिला ही है बल्कि आने वाले दिनों में दलितों के बीच में पार्टी के बड़े नेताओं के आयोजन करने की रणनीति बनी है। सियासी जानकार और वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल कयूम कहते हैं कि जिस तरीके से कांग्रेस ने अपने बड़े दलित नेताओं के चेहरे को आगे करके इस समाज को अपने साथ जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की है उससे पार्टी के नेताओं को उम्मीद है कि आने वाले चुनाव में वह अपने खोए हुए इस महत्वपूर्ण वोट बैंक को अपने साथ जोड़ पाएंगे। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं कि उनकी पार्टी जातिगत आधार पर कोई भेदभाव नहीं करती है। कांग्रेस पार्टी हमेशा से सभी धर्म और जातियों के लोगों को आगे बढ़ाने की बात करती आई है। क्योंकि समाज के आखिरी पायदान पर खड़े हर व्यक्ति को आगे लाना है। इसलिए उन सभी लोगों के साथ कांग्रेस कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


उत्तर प्रदेश में दलितों की सियासत को अपने साथ जोड़ने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी ने भी बड़ी सियासी रणनीति बनाई है। योजना के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में दलित महासम्मेलन कर समुदाय के लोगों से सीधे तौर पर मुखातिब हो रही है। भारतीय जनता पार्टी की योजना के मुताबिक 15 अक्टूबर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और 27 अक्टूबर को पूर्वांचल के साथ-साथ बनारस में बड़ा सम्मेलन तय किया गया है। इसके अलावा तय योजना के मुताबिक अवध क्षेत्र में भी दलित महासम्मेलन करने की तैयारी है। भारतीय जनता पार्टी के मुताबिक दो नवंबर को इस क्षेत्र में दलित महासम्मेलन कराया जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के अलग-अलग राज्यों में दलितों को केंद्र सरकार की योजनाओं से अवगत कराने के लिए तैयार की गई रणनीतिकारों की टीम के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं की उत्तर प्रदेश में आयोजित किए जाने वाले दलित महासम्मेलन में न सिर्फ राज्य की बल्कि केंद्र के बड़े नेता शिरकत करने की तैयारी में है। इसमें गृहमंत्री और रक्षा मंत्री समेत कुछ बड़ी जगह पर बड़े आयोजनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंच सकते हैं।


राजनीतिक जानकारों का कहना है जिस तरीके से सभी सियासी दल दलितों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बना रहे हैं उससे बहुजन समाज पार्टी को निश्चित तौर पर एक काउंटर और बड़ी रणनीति तो बनानी ही होगी। क्योंकि बहुजन समाज पार्टी का सबसे बड़ा वोट बैंक दलित समुदाय ही रहा है। सीएसजेएम विश्वविद्यालय में राजनीतिक शास्त्र के पूर्व प्रवक्ता और उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलितों की भूमिका पर शोध करने वाले डॉक्टर जगतराम कहते हैं कि अगर मायावती की सियासत को ढंग से देखा जाए तो पता चलता है कि बीते चुनाव में कम हुई सीटों के बाद भी उनके वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी नहीं हो सकी है। भले ही मायावती की पार्टी को एक लोकसभा के चुनाव में शून्य पर ही क्यों ना सिमटना पड़ा हो। प्रोफेसर जगत राम का मानना है कि लेकिन जिस तरीके से सभी राजनीतिक दल खासतौर से सत्ता पक्ष अपनी योजनाओं के माध्यम से जब दलित समाज को अपनी और जोड़ने की तैयारी करता है तो उसका व्यापक असर भी किसी भी जाति विशेष समुदाय पर पड़ता ही है। ऐसे में यह कहना कि भारतीय जनता पार्टी का दलितों को अपनी और जोड़ने का अभियान चलाना कारगर नहीं होगा ऐसा सियासत में नहीं सोचना चाहिए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में अगर बहुजन समाज पार्टी बहुत सक्रियता के साथ दलित समाज को अपने साथ नहीं जोड़ती तो संभव है उसका खामियाजा भी दलितों के बटे हुए वोट बैंक के तौर पर उनको देखना पड़े। और इसका सीधा-सीधा असर बहुजन समाज पार्टी यानी मायावती के वोट बैंक पर पड़ सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed