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UP Politics: मायावती ने यूं ही नहीं चला 'मजारों' वाला दांव! यूपी में ऐसे खेला जा रहा यह सियासी त्रिकोणीय खेल

Wed, 14 Jun 2023 02:25 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Wed, 14 Jun 2023 02:25 PM IST
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सार
UP Politics: सियासी जानकार मानते हैं कि बीते कुछ दिनों में सबसे ज्यादा सियासी तौर पर अगर किसी को नुकसान हुआ है, तो बसपा को हुआ है। यही वजह है कि बसपा अपनी कोर कसर पूरी करने के लिए सारे दांव पेंच आजमा रही है। मंगलवार को मायावती ने अपने इसी दांव पेच के सिलसिले में सपा के कोर वोट बैंक रहे मुसलमानों पर मजार के माध्यम से अपनी हमदर्दी जताई...
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UP Politics: Mayawati playing Mazar politics to woo samajwadi party muslim voters
Up Politics: Mayawati - फोटो : Amar Ujala/ Himanshu Bhatt

विस्तार

उत्तर प्रदेश में सियासत का जो ताना-बाना बुना जा रहा है वह 'ट्रायंगुलर वोट शिफ्टिंग' के आधार पर तैयार किया जा रहा है। सभी राजनीतिक दल इसी आधार पर अपनी सियासी पारी को आगे बढ़ाने की पूरी जुगत लगा चुके हैं। दरअसल यह 'ट्रायंगुलर वोट शिफ्टिंग' की अवधारणा कुछ और नहीं, बल्कि उन तीन पार्टियों के एक दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी की बड़ी तैयारी है, जिसमें भाजपा, बसपा के दलित वोट बैंक में सेंधमारी लगाने के लिए संघ की शाखाएं लगाने की अपनी तैयारी कर रही है। बसपा ने समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक मुस्लिमों में सेंधमारी के लिए मजारों वाला दांव चला है। जबकि समाजवादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के हिंदू और ब्राह्मण वोट बैंक में सेंधमारी के लिए नैमिषारण्य से लेकर अयोध्या, काशी, मथुरा तक की यात्रा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि अगर आने वाले लोकसभा चुनाव में 'ट्रायंगुलर वोट शिफ्टिंग' का ताना-बाना काम कर गया तो सियासी तस्वीर भी बदल सकती है।

यह भी पढ़ें: UP Politics: भाजपा के एजेंडे पर सपा ने भी ठोकी ताल, अब अयोध्या, काशी और मथुरा का भी रुख करेगी समाजवादी पार्टी

ऐसे तैयार हो रहा है सियासी खेल बदलने का ताना-बना...

बीते कुछ चुनावों के नतीजों ने उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान की तस्वीर बहुत हद तक स्पष्ट कर दी है कि कौन सी पार्टी किस वोट बैंक में सेंधमारी करके आगे बढ़ी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों में सभी राजनीतिक दलों ने इसका प्रयोग करके चुनावों में 'ट्रायंगुलर वोट शिफ्टिंग' के खेल को आजमाया भी था। वरिष्ठ पत्रकार जीडी शुक्ला मानते हैं कि भाजपा ने जिस तरह बसपा के दलित वोट बैंक में सेंधमारी की उससे बसपा का ग्राफ तेजी से नीचे गिरने लगा। उनका कहना है कि अब बहुजन समाज पार्टी के पास अपने वोट बैंक को रोकने के सिवाय दूसरा एक बड़ा चारा यह था कि वह किसी दूसरे दल के बड़े प्रमुख वोट बैंक में सेंधमारी करे। इसके लिए बहुजन समाज पार्टी ने मुस्लिम और दलित के 'कॉन्बिनेशन' को तैयार करना शुरू किया। विधानसभा चुनावों से लेकर निकाय चुनाव तक में बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरह मुस्लिमों पर दांव लगाकर टिकट दिया। उससे लोकसभा चुनावों में उनकी रणनीति का पता चलता है।

मायावती ने चला मजारों वाला दांव

सियासी जानकार मानते हैं कि बीते कुछ दिनों में सबसे ज्यादा सियासी तौर पर अगर किसी को नुकसान हुआ है, तो बहुजन समाज पार्टी को हुआ है। यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी अपनी कोर कसर पूरी करने के लिए सारे दांव पेंच आजमा रही है। मंगलवार को मायावती ने अपने इसी दांव पेच के सिलसिले में समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक रहे मुसलमानों पर मजार के माध्यम से अपनी हमदर्दी जताई। मायावती ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की मजारों को तोड़े जाने पर कड़ी आपत्ति दर्ज की। जानकारी के मुताबिक बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तोड़ी जाने वाली मजारों पर अपने कार्यकर्ताओं को मुस्लिम समुदाय के साथ रहने और ऐसी मजारों के आंकड़े इकट्ठा करने के निर्देश भी दिए हैं।

सामान्य से ज्यादा सियासी प्रेम है मजारों का

राजनीतिक विश्लेषक हरिहर पांडे कहते हैं कि मायावती का मजारों के प्रति उमड़ा प्रेम सामान्य से ज्यादा सियासी है। मायावती को इस बात का पूरा अंदाजा है कि उनके दलित वोट बैंक में जिस तरीके से भाजपा सेंधमारी कर रही है उसकी भरपाई वह समाजवादी पार्टी के मुसलमानों को अपनी ओर जोड़ के कर सकती है। यही वजह है कि उन्हें जब भी मौका मिलता है, मुसलमानों के प्रति अपनी संवेदनाएं जताकर इस संप्रदाय के नुमाइंदों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए मौका भी दे रही हैं। हरिहर पांडे कहते हैं कि हालांकि बीते कुछ चुनावों में मायावती को मुस्लिम और दलित गठजोड़ का कोई खास सियासी लाभ नहीं मिला है। रही बात ब्राह्मणों के वोट लेने की, तो बसपा के रणनीतिकारों को इस बात का भलीभांति अंदाजा है कि इस दिशा में बड़ा सियासी दांव खेलना उतना मुफीद नहीं है, जितना मुसलमानों के लिए हमदर्दी जताकर अपनी और जोड़ना।

सपा ने भाजपा के सवर्ण वोट बैंक में डाला हाथ

लोकसभा चुनावों से पहले बसपा ने समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश नहीं की है। बल्कि समाजवादी पार्टी ने भी अपनी रणनीति में इजाफा करते हुए भाजपा के वोट बैंक में हाथ डाल दिया है। राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं कि भाजपा के सवर्ण वोटों में समाजवादी पार्टी ने जिस तरीके से धार्मिक शहरों में जाकर बड़े आयोजन करने शुरू किए, उससे उसे कुछ सियासी फायदा जरूर दिख रहा होगा। समाजवादी पार्टी ने एक और भारतीय जनता पार्टी के सवर्ण वोटों में सेंधमारी की तैयारी की है, वहीं दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी के उस दलित वोट बैंक को भी साधने की पूरी कोशिश शुरू की है, जो बसपा से छिटक कर भाजपा की ओर जा रहा है। समाजवादी पार्टी से जुड़े वरिष्ठ नेता बताते हैं कि उनकी पार्टी में पहले से ही ब्राह्मणों का जनाधार बहुत ज्यादा रहा है। वह कहते हैं कि जितना भाजपा अयोध्या, मथुरा, काशी पर अपना दावा करती है उतना ही समाजवादी पार्टी भी इन धार्मिक नगरों को अपना मानती है। समाजवादी पार्टी की रणनीति भी बीते कुछ समय में इसी लाइन पर आगे बढ़ रही है।

दांव चला तो यह होगी सियासी तस्वीर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी जिस तरह से एक दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी कर रहे हैं, उससे आने वाले लोकसभा के चुनावों के नतीजो के बहुत रोचक होने की उम्मीद लग रही है। पॉलिटिकल डाटा ड्राफ्टिंग एंड एनालिटिकल सेंटर के निदेशक अनुराग मिश्रा कहते हैं कि बीते कुछ चुनावों में ट्रेंड यही रहा है कि भाजपा ने बसपा के वोट बैंक में सेंधमारी की। बसपा अपनी खिसकती हुई जमीन को बचाने के लिए समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंधमारी कर रही है। समाजवादी पार्टी अपने जनाधार को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा के सवर्ण वोटों में पैठ बनाने की तैयारी करके चल रही है। भाजपा के जनाधार को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दलितों के इलाके में शाखाओं को लगाने की तैयारी कर ली है। अनुराग कहते हैं कि लोकसभा चुनावों से पहले एक-दूसरे के वोट बैंक में बहुत सधी हुई रणनीति की तरह सेंधमारी की जा रही है, और अगर इसमें जरा भी सफलता की गुंजाइश दिखी तो आने वाले लोकसभा चुनावों के परिणाम में काफी कुछ बदला हुआ दिख सकता है।

यह भी पढ़ें: RSS: बसपा के कोर वोट बैंक वाले इलाकों में संघ लगाएगा शाखाएं, लोकसभा चुनावों से पहले ऐसे बिछी बिसात

2019 में फेल हो चुका है सपा-बसपा का फॉर्मूला

अनुराग मिश्रा का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एकजुट होकर चुनाव लड़ने के बाद भी सफलता का दीदार नहीं किया था। लेकिन बाद में समाजवादी पार्टी ने बसपा से अलग होकर विधानसभा के चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया। वह कहते हैं कि तमाम सियासी गुणा गणित के बीच भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा है। ऊपर से समाजवादी पार्टी की तमाम कोशिशों के बाद भी जनता पार्टी अपने कोर वोट बैंक को दूर जाने का कोई मौका दे ही नहीं रही है। अनुराग मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के पास अभी भी 2024 के लोकसभा चुनावों में राम मंदिर एक बहुत बड़ा मुद्दा बन कर सामने आने वाला है। जिसमें समाजवादी पार्टी की सवर्ण वोटों वाली चाहत कितनी सफल होगी, इसका आकलन सियासी गलियारों में अभी से किया जाने लगा है। समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की बसपा की लगातार कोशिश जारी है। अनुराग के मुताबिक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मजारों पर चलने वाले बुलडोजर की बात करके बसपा ने मुसलमानों को अपने पाले में करने का एक बार फिर से प्रयास किया है। वह कहते हैं कि एक दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी करने का 'ट्रायंगुलर वोट शिफ्टिंग' का प्रयास कितना सफल होता है यह लोकसभा चुनाव के नतीजे बताएंगे।

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