UP Election 2022: पूरे देश की नजरें लगी हैं इस विधानसभा क्षेत्र पर, यहां का परिणाम बताएगा किसान आंदोलन की धार कितनी थी?
खापों के गढ़ और टिकैत की सिसौली वाले बुढ़ाना में चलेगा यह फैक्टर! इस दल ने तो प्रत्याशी भी नहीं बदला। किसान आंदोलन का सबसे बड़ा गढ़ और टिकट परिवार का घर सिसौली भी बुढ़ाना विधानसभा में ही आता है। इसलिए बहुत रोचक हो गया है बुढ़ाना का चुनाव।
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उत्तर प्रदेश में शुरू होने वाले विधानसभा के चुनावों में वैसे तो पूरे देश भर की नजरें लगी हुई है, लेकिन प्रदेश के कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे भी है जिसमें लोगों की दिलचस्पी कुछ ज्यादा ही है। मुजफ्फरनगर की बुढ़ाना विधानसभा भी एक ऐसी विधानसभा है जिस पर पूरे प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर की नजरें लगी हुई है। दरअसल बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र वह इलाका है जो न सिर्फ खापों का गढ़ है बल्कि पूरे देश में किसान आंदोलन की अगुवाई करने वाले राकेश टिकैत का घर परिवार भी इसी विधानसभा क्षेत्र के सिसौली में ही आता है। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो इस विधानसभा क्षेत्र का परिणाम बताएगा कि किसानों के आंदोलन की हवा कितनी मुखर थी।
दो दिन बाद मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना विधानसभा सीट पर भी मतदान होगा। इस इलाके में 2012 में समाजवादी पार्टी के नवाजिश आलम खान ने सपा का झंडा लहराया था, तो 2017 में भाजपा की आंधी में उमेश मलिक ने इस सीट पर कब्जा जमा लिया। लेकिन 2017 के बाद अब होने वाले विधानसभा में क्षेत्र में पूरी तस्वीर बदली हुई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले डीएस मलिक कहते हैं कि इस बार मामला बुढ़ाना में बदला हुआ है। वह कहते हैं कि किसान आंदोलन तो दिल्ली में हुआ लेकिन उसकी रणनीति बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र में ही बनती थी। मलिक कहते हैं कि राकेश टिकैत के दिल्ली में बहे आंसू से मुजफ्फरनगर में सैलाब आ गया था और कमजोर होता हुआ आंदोलन एक विराट आंदोलन के तौर पर उभर आया। वो कहते हैं कि यही वजह है कि बुढ़ाना के नतीजे पर पूरे देश के राजनीतिक विशेषज्ञ और राजनीतिक दलों की नजरें लगी हुई हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीति को समझने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर अतुल चौधरी बताते हैं कि बुढ़ाना एक ऐसी विधानसभा है जिसमें आप खापों की चौधराहट को इग्नोर नहीं कर सकते हैं। वह कहते हैं कि चाहे विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा का चुनाव। खापों के बहुत से फैसले विधानसभा के चुनावों की दशा और दिशा तय कर देते हैं। इस बार तो खैर किसानों का बहुत बड़ा आंदोलन इसी जमीन से मॉनिटर किया जाता रहा। वो कहते हैं कि राकेश टिकैत जिस बालियान खाप से आते हैं उसका भी घर सिसौली में है और बड़ा वर्चस्व है। इसके अलावा सभी जाति समुदाय के लोगों ने जिस तरीके से टिकैत को आंदोलन के मामले में समर्थन दिया है उससे चुनावी परिणाम कुछ भी हो सकते हैं।
चौधरी बताते हैं कि प्रदेश में मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र को खापों का गढ़ कहा जाता है। जाटों की बालियान खाप, देशवाल, सहरावत, राठी, डबास खाप यहीं हैं। सिर्फ यही नहीं मुस्लिम राजपूत समाज की चौधराहट भी इसी इलाके में देखने को मिलती है। कहते हैं कि इस इलाके में बालियान खाप के बड़े नेता और केंद्र में मंत्री संजीव बालियान भी इस इलाके से हैं तो मुस्लिम राजपूत बिरादरी की 50 से ज्यादा खाप के चौधरी गुलाम मोहम्मद जौला भी इसी क्षेत्र के रहने वाले हैं। इसलिए इस विधानसभा में खापों की चौधराहट न चले, ऐसा दिख तो नहीं रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि किसान आंदोलन के दौरान खापों में पड़ी दरार का फायदा भारतीय जनता पार्टी उठा सकती है। यही वजह है कि इस बार के चुनाव में जहां सभी बड़े राजनीतिक दलों ने अपने प्रत्याशी बदल दिए वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपने वर्तमान विधायक उमेश मलिक पर भरोसा जताते हुए दोबारा मैदान में उतारा है। इस बार समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के गठबंधन में राजपाल बालियान को टिकट मिला है। जबकि कांग्रेस से देवेंद्र कश्यप और बहुजन समाज पार्टी से हाजी अनीस चुनावी मैदान में है।
प्रोफेसर चौधरी कहते हैं कि किसान आंदोलन के दौरान गठवाल खाप और बालियान खाप में मनमुटाव हो गया था। बालियान खाप के मुखिया नरेश टिकैत जहां किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे थे वही गठवाला खाप के राजेंद्र सिंह सरकार के पक्ष में महापंचायत कर रहे थे। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के संयुक्त प्रत्याशी राजपाल बालियान टिकैत परिवार की पसंद भी है। वो कहते हैं कि इस विधानसभा के चुनावों में जाटों को साधना भारतीय जनता पार्टी के लिए इस बार निश्चित तौर पर चुनौती तो बना हुआ है। वो कहते हैं कि अनुमान तो यही लगाया जा रहा है कि जाट मुस्लिम समीकरण इस बार बड़ा गेमचेंजर साबित होगा।