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उत्तर प्रदेश चुनाव: क्या 300 सीटों तक का आंकड़ा छू पाएगी भाजपा? ये है अमित शाह के दावे की सच्चाई

Sat, 05 Feb 2022 02:59 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Sat, 05 Feb 2022 02:59 PM IST
सार

अल्पसंख्यक मतों के बारे में भाजपा के नेता भी मान रहे हैं कि इस बार बंटवारे की गुंजाइश कम है। इसका सबसे अधिक लाभ (90 फीसदी तक) समाजवादी पार्टी को मिल सकता है। गैर यादव पिछड़ा और अन्य पिछड़ा वर्ग तथा गैर जाटव दलित वोटों के बारे में भाजपा नेताओं का कहना है इसमें भाजपा को समाजवादी पार्टी से अधिक वोट मिलेंगे...

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UP election 2022: BJP leader Amit Shah again claimed to win more than 300 seats in assembly election
स्वतंत्र देव सिंह, योगी आदित्यनाथ, अमित शाह और धर्मेंद्र प्रधान - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

विधानसभा चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की अब धीरे-धीरे एंट्री हो रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह दर्जन भर से अधिक बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो आए हैं और पूरी सूझबूझ से राज्य में फिर भाजपा की सरकार बनवाने के लिए हर दांव चल रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने गोरखपुर में फिर 300 से अधिक सीटें जीतने का दावा किया। भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय को 250-300 सीटें जीत लेने का भरोसा है। प्रयागराज से ज्ञानेश्वर शुक्ला का कहना है कि 225-250 सीटें भाजपा की झोली में आएंगी।

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उत्तर प्रदेश के योगी सरकार के एक केंद्रीय मंत्री का कहना है कि 375 सीटों पर उन्होंने होमवर्क किया है। भाजपा को 215-245 सीटें मिल सकती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बड़े भाजपा नेता का कहना है कि वह अपने क्षेत्र में 14 फरवरी को मतदान होने के बाद कुछ सही बता पाएंगे। अभी समाजवादी पार्टी और रालोद गठबंधन से कांटे का मुकाबला चल रहा है। सूत्र का कहना है कि चुनाव किसान, खेती-खलिहानी और जातिगत आधार पर बना रहा तो कहना मुश्किल है। लेकिन इसमें किसी तरह का बदलाव होने पर भाजपा की राह आसान हो जाएगी।

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क्या कहती है उत्तर प्रदेश की हवा?

शामली, ननौता, बागपत से लेकर सहारनपुर तक और लौटते समय मेरठ, बुलंदशहर से लेकर गाजियाबाद तक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के कई रंग देखने को मिल रहे हैं। यहां तक कि यमुना एक्सप्रेस-वे के किनारे सटे जेवर के आस-पास के गांव में भी इस बार भाजपा और राष्ट्रीय लोक दल, समाजवादी पार्टी गठबंधन के बीच में कांटे का मुकाबला दिखाई पड़ रहा है। ग्रेटर नोएडा के सोनपुरा से लेकर बिसरख, अमनाबाद, शाहबेरी के गांवों में भी लोगों से चर्चा करने पर 2017 की तुलना में इस बार राजनीतिक लड़ाई साफ दिखाई दे रही है। इस बारे में भाजपा के राज्यसभा सांसद का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही थोड़ी लड़ाई है। इसके बाद भाजपा की राह बहुत आसान है। रुहेलखंड, अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी को अच्छी सफलता मिलेगी। वे कहते हैं कि 2017 से 50 सीटें कम हो सकती हैं, लेकिन सरकार भाजपा ही बनाएगी। हालांकि रुहेलखंड, अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को चुनौती का सामना करने की पूरी संभावना दिखाई दे रही है।

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क्या कह रहे हैं जातिगत समीकरण?

जातिगत समीकरण उत्तर प्रदेश के तमाम क्षेत्रों का दौरा करने के बाद भाजपा के नेताओं और आमजनों से बातचीत पर आधारित हैं। गोरखपुर से गाजियाबाद तक यह मान लेने में किसी को कोई संकोच नहीं है कि पूरे प्रदेश का क्षत्रिय मतदाता पूरी एकजुटता के साथ भाजपा और खासकर योगी आदित्यनाथ के साथ है। इसी तरह से यादव समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को जिताने, मुख्यमंत्री बनवाने के लिए मतदान बूथ पर जाएगा। जाट के बारे में खुद भाजपा के नेता मान रहे हैं कि राष्ट्रीय लोक दल और भाजपा के बीच में आधा-आधा वोटों का बंटवारा होगा। समाजवादी पार्टी को भी रालोद से गठबंधन के कारण 35-40 फीसदी जाट वोट दे सकते हैं।


अल्पसंख्यक मतों के बारे में भाजपा के नेता भी मान रहे हैं कि इस बार बंटवारे की गुंजाइश कम है। इसका सबसे अधिक लाभ (90 फीसदी तक) समाजवादी पार्टी को मिल सकता है। गैर यादव पिछड़ा और अन्य पिछड़ा वर्ग तथा गैर जाटव दलित वोटों के बारे में भाजपा नेताओं का कहना है इसमें भाजपा को समाजवादी पार्टी से अधिक वोट मिलेंगे। हालांकि भाजपा के मान रहे हैं कि केशव प्रसाद मौर्या से मौर्या समाज के बड़े नेता स्वामी प्रसाद मौर्या और महान दल के केशव मौर्या हैं। इस बार मौर्या, सैनी, चौहान, राजभर, कुशवाहा, वर्मा मतों में समाजवादी पार्टी 30 फीसदी तक सेंध लगा सकती है।

भाजपा ने पूरब तक बिछाए हैं मोहरे

समाजवादी पार्टी के सपनों को चकनाचूर करने के लिए भाजपा के रणनीतिकार हर दांव चल रहे हैं। कांग्रेस के नेता आरपीएन सिंह को पार्टी में शामिल कराकर और पडरौना से उतारने की खबरों ने स्वामी प्रसाद मौर्या को सीट बदलने पर मजबूर कर दिया। इसी तरह भाजपा की निगाह में ओमप्रकाश राजभर भी हैं। योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर से उतारने की वजह भी मुख्यमंत्री के किले और क्षेत्र को अभेद्य बनाना है। पार्टी ने बगावत रोकने के लिए यथा संभव पुराने विधायकों को मैदान में उतारा है। अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें लगातार मनाने की पहल चल रही है। योगी सरकार के ही एक मंत्री ने माना कि राज्य में अगले मुख्यमंत्री को लेकर पार्टी ने अभी कोई स्पष्ट राय जनता के बीच नहीं रखी है। मीडिया से चर्चा के दौरान उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने भी संकेत दिया कि चुनाव बाद भाजपा के विधायक मुख्यमंत्री का चेहरा तय करते हैं। कुल मिलाकर यह भ्रम की स्थिति अगड़ा और पिछड़ा वर्ग को बांधे रखने के लिए हो रही है।

क्या 300 के पार आ जाएगी भाजपा?

इसका पता 10 मार्च को मतगणना के बाद लगेगा, लेकिन इस बार लड़ाई कांटे की है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में पूरी ताकत झोंक दी है। बसपा प्रमुख मायावती ने देर से ही सही लेकिन पत्ते खोल दिए हैं। उत्तर प्रदेश के चुनाव सर्वेक्षण में लगे सूत्रों का कहना है कि जितना कांग्रेस मजबूती से लड़ेगी, उतना भाजपा का नुकसान होगा। जितना बसपा मजबूती से लड़ेगी, इसबार उतना नुकसान समाजवादी पार्टी का बढ़ेगा। इसके बीच में एक समीकरण और काम करेगा। जनता का रुझान जितना समाजवादी पार्टी गठबंधन की तरफ बढ़ेगा, भाजपा को उसी अनुपात में नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस आधार पर यह कहना मुश्किल है कि भाजपा की सीटें 300 के पार या इसके आस-पास आ सकेंगी। यह तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिए दिया जाने वाला मंत्र है। एक चुनाव प्रचार रणनीतिकार का कहना है कि अभी तो प्रधानमंत्री मोदी का खुलकर मैदान में उतरना बाकी है। यदि वह हर सीट पर भाजपा का 100 वोट भी बढ़ा देंगे तो 30-35 सीटें वैसे ही बढ़ जाएंगी।

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