सीजेआई सूर्यकांत की दो-टूक: डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध पर न्यायपालिका सक्रिय, संसद के फैसले का इंतजार नहीं
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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि भारतीय न्यायपालिका डिजिटल अरेस्ट जैसे तेजी से उभरते धोखाधड़ी के तरीकों से निपटने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रही है और ऐसे मामलों में संसद की ओर से कानून बनाए जाने का इंतजार नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि बदलती तकनीक के साथ आर्थिक अपराधों के स्वरूप में भी तेजी से बदलाव हो रहा है और न्यायपालिका को इन चुनौतियों के अनुरूप अपनी भूमिका निभानी होगी। लंदन में आयोजित 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम ऑन इकोनॉमिक क्राइम के समापन सत्र को संबोधित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने शनिवार को (ब्रिटिश समय) डिजिटल अरेस्ट का उदाहरण देते हुए बताया कि ऐसे मामलों में साइबर ठग पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों या सरकारी नौकरशाहों का रूप धारण कर वीडियो कॉल के जरिए लोगों को डराते हैं और उनसे पैसे ऐंठते हैं।
चीफ जस्टिस ने किन बातों को रेखांकित किया?
- सुप्रीम कोर्ट ने इस उभरते साइबर फ्रॉड को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लिया है।
- ऐसे मामलों में अपराध निर्धारित करने के अलग प्रावधान और नुकसान के अनुरूप सजा के नियम बनाने चाहिए।
- आरोपी को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में बताए जाने चाहिए।
- बड़े पैमाने पर मनी लॉन्ड्रिंग के बावजूद वैश्विक पैमाने पर अवैध धन की बरामदगी बेहद कम, ये चिंताजनक।
- आर्थिक अपराध और अवैध संपत्ति की वापसी के लिए देशों के बीच सहयोग अहम।
आर्थिक अपराध से कैसे निपटें, न्यायपालिका ने क्या किया ?
न्यायपालिका की तरफ से की गई पहल का उल्लेख करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा, डिजिटल अरेस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को इस समस्या का आकलन विस्तार से करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा, यह भारतीय न्यायपालिका के उस व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें न्यायपालिका उभरते हुए धोखाधड़ी के तरीकों पर समय रहते प्रतिक्रिया देती है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भारत में आर्थिक अपराधों से निपटने की व्यवस्था किसी एक कानून तक सीमित नहीं है। बीते कई दशकों में व्यापक ढांचा विकसित हुआ है। इसमें कानून, जांच एजेंसियां, संस्थागत व्यवस्थाएं और न्यायिक सिद्धांतों की अपनी-अपनी भूमिका रही है।
मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए बनाए गए कानून- प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 और आर्थिक अपराध करके देश से भागने वाले आरोपियों को दंडित करने के लिए बने कानून- फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट, 2018 का उल्लेख करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ये व्यवस्थाएं पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं। कई लोगों ने जांच एजेंसियों की तरफ से PMLA के कथित दुरुपयोग किए जाने की शिकायतें की हैं। गिरफ्तारी के स्पष्ट कारण नहीं बताए जाने और उपलब्ध तथ्यों की तुलना में अधिक समय तक हिरासत में रखे जाने जैसे मामलों में न्यायपालिका ने हस्तक्षेप कर स्थिति को ठीक करने की कोशिश की है।
गिरफ्तारी पर चीफ जस्टिस ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल मौखिक रूप से गिरफ्तारी के कारण पढ़कर सुना देना पर्याप्त नहीं है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए सीजेआई ने बताया कि इस मामले में अदालत ने गिरफ्तारी को कानूनी माना, लेकिन इसके बावजूद जमानत दी। इसका आधार यह सिद्धांत था कि मुकदमे से पहले लंबे समय तक हिरासत को किसी दूसरे रूप में सजा में तब्दील नहीं किया जा सकता।
मनी लॉन्ड्रिंग पूरी दुनिया के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
मनी लॉन्ड्रिंग के वैश्विक स्तर को बेहद गंभीर चुनौती बताते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, अगर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े वैश्विक अनुमान मोटे तौर पर भी सही हैं, तो दुनिया में एक साल में जितने पैसों का अवैध लेन-देन किया जाता है, उससे धरती पर मौजूद करीब आठ अरब लोगों में से हर एक के लिए एक सामान्य लैपटॉप खरीदा जा सकता है। इसके बाद भी पैसा बच सकता है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में अवैध धन के प्रवाह के बावजूद, केवल एक प्रतिशत से कम अवैध संपत्ति ही बरामद हो पाती है। यह हालात बताते हैं कि आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए जांच एजेंसियों, न्यायपालिका और विभिन्न देशों के बीच बेहतर अंतरराष्ट्रीय समन्वय जरूरी है।
CJI सूर्यकांत के संबोधन की खास झलकियां
- आर्थिक अपराध और सरकारी धन के दुरुपयोग की चुनौती नई नहीं, तकनीक से समस्या जटिल बनी।
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख कर बोले- राजस्व को संभालने वाला अधिकारी बिना उसमें से कुछ हिस्सा लिए रह जाए, यह उतना ही कठिन है जितना जीभ की नोक पर रखे शहद या विष का स्वाद लिए बिना रह जाना।
- आर्थिक अपराध देशों की सीमाओं और संप्रभुता से परे।
- सतर्कता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और कानून, धोखाधड़ी और आर्थिक अपराध के खिलाफ लड़ाई में सबसे अहम हथियार।
- न्यायिक, प्रशासनिक और जांच तंत्र को मिलकर अवैध धन और धोखाधड़ी के नेटवर्क पर नकेल कसने के लिए ठोस कार्रवाई करनी होगी।
लंदन में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मकसद बताते हुए सीजेआई ने कहा, सामान्य परिस्थितियों में देशों की कानूनी व्यवस्थाएं विदेशी हस्तक्षेप से सुरक्षित रखती हैं। हालांकि, अब आर्थिक अपराधों से प्रभावी तरीके से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग आवश्यक है।