अमर उजाला शब्द सम्मान 2024: तीन पीढ़ियों की धुन और शब्दों की एक शाम, साधक हुए सम्मानित
समारोह में पद्मभूषण डॉ. एन. राजम ने पुत्री संगीता शंकर और नातिन रागिनी शंकर के साथ विशेष प्रस्तुति दी। इसमें तबले पर संगत अभिषेक मिश्र की रही। वायलिन व तबले की एक-दूसरे की पूरक बनती धुनों से दर्शक भावविभोर हो उठे। प्रस्तुतियां इतनी अनूठी रहीं कि एक घंटे से ज्यादा समय तक के कार्यक्रम में दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए।
विस्तार
शब्द और सुर एक-दूसरे के पूरक हैं। शब्दों के बिना सुरों में भाव नहीं आ सकता और सुरों की अनुपस्थिति में शब्दों में रंजकता उत्पन्न नहीं होती। इसीलिए एक कवि-साहित्यकार को लय का ज्ञान जितना जरूरी है, एक संगीतकार के लिए साहित्य पढ़ना भी उतना ही आवश्यक है। अमर उजाला शब्द सम्मान के छठे संस्करण में शुक्रवार को मुख्य अतिथि विख्यात वायलिन वादक पद्मभूषण डॉ. एन. राजम ने ये बातें कहीं। उन्होंने कहा, हम सब सुर और लय से बंधे हैं। शब्द और सुर का रिश्ता अटूट है। इनको एक-दूसरे से अलग किया ही नहीं जा सकता।
इस मौके पर आकाशदीप सम्मान से अलंकृत गोविंद मिश्र ने कहा, लेखकों को जानने का सबसे अच्छा तरीका उन तक रचनाओं के माध्यम से पहुंचना है। वहीं, गुजराती भाषा में आकाशदीप से अलंकृत सितांशु यशश्चंद्र ने कहा, सर्व भाषा परिणिता: यानी ऐसी भाषा जो और सरल भाषाओं में परिणत हो सके। वही साहित्य के लिए जरूरी है।
समारोह में पद्मभूषण डॉ. एन. राजम ने पुत्री संगीता शंकर और नातिन रागिनी शंकर के साथ विशेष प्रस्तुति दी। इसमें तबले पर संगत अभिषेक मिश्र की रही। वायलिन व तबले की एक-दूसरे की पूरक बनती धुनों से दर्शक भावविभोर हो उठे। प्रस्तुतियां इतनी अनूठी रहीं कि एक घंटे से ज्यादा समय तक के कार्यक्रम में दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। समारोह के दौरान नोएडा के एमिटी यूनिवर्सिटी का सभागार खचाखच भरा हुआ था।
साहित्य के जमघट में आनंद
वायलिन वादक और एन. राजन की बेटी डॉ. संगीता शंकर ने कहा कि साहित्यकारों के जमघट में हमें आनंद आ रहा है। गोविंद जी ने एक बात कही थी कि अंधकार को देखने की जगह हम अपनी शमा जला दें। हमें पीढ़ियों को मूल्य देने होंगे। पांच से 15 साल के बच्चों को मूल्य आधारित शिक्षा देने के मकसद से मैंने पहल शुरू की है। इसके तहत बच्चों के लिए कविताओं को रागों में संगीतबद्ध कर गीत बनाए जा रहे हैं।
गरिमा बढ़ाती है भागीदारी : राजुल माहेश्वरी
अमर उजाला समूह के चेयरमैन राजुल माहेश्वरी ने कहा कि शब्द-साधकों के सम्मान समारोह में सुधी श्रोताओं-दर्शकों और साहित्य प्रेमियों की भागीदारी व मौजूदगी से इस आयोजन को गरिमा मिलती है। उन्होंने कहा कि इससे हर साल कुछ नया करने की प्रेरणा मिलती है। माहेश्वरी ने डॉ. एन. राजम का इस संध्या को शानदार बनाने और नई ऊंचाइयां देने के लिए आभार व्यक्त किया। माहेश्वरी ने डॉ. राजम, संगीता शंकर और रागिनी शंकर को शॉल और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित भी किया।
साहित्य के साथ कला का अनूठा उत्सव
अमर उजाला के समूह सलाहकार यशवंत व्यास ने बताया कि शब्द सम्मान शृंखला की यह छठी कड़ी है। हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं उड़िया, मलयालम, बांग्ला, मराठी और गुजराती भाषा के समृद्ध साहित्यकारों के सम्मान से भारतीय साहित्य परंपरा की समृद्धता रेखांकित होती है। साहित्य के साथ कला को जोड़ने का यह अनूठा उत्सव है। समारोह में साल-दर-साल बढ़ती भागीदारी ने इस एहसास को शक्ति दी है कि साहित्य और कलाओं का रिश्ता अटूट है।
लेखन आत्मा से संवाद करता है- गोविंद मिश्र
शब्दों के माध्यम से रचना तक पहुंचना शब्द सम्मान को विशेष बनाता है। आज धरती पर संकट है। शब्दों के अर्थ धुंधले, उल्टे-सीधे हो गए हैं। यही प्रेरित करता है कि हम शब्दों के अर्थ ढूढ़ें। लेखन आत्मा से संवाद करता है। संसार के कष्टों को झेलने की ताकत देता है। इसके माध्यम से यह अच्छाई को बचाते हुए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को इसे सौंप देता है। यह सुंदरता ही संसार को बचाएगी।
मातृभाषा क्या है और वो मेरी कैसे बनी? स्त्री जब बच्चे को जन्म देती है, तो युवती से मां बन जाती है। वह व्यापक मानव संबंधों को जन्म देती है। वैसे ही एक भाषा जब साहित्य को जन्म देती है, तो समस्त भाषा कुल में हलचल मच जाती है, भले ही दिखे नहीं। हेमचंद कहते हैं कि हमारी भाषा कारागार नहीं बल्कि पंख बननी चाहिए।