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Tripura Election 2023: क्या त्रिपुरा में सफल हो जाएगी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की भविष्यवाणी?

Fri, 17 Feb 2023 05:43 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Fri, 17 Feb 2023 05:43 PM IST
सार

Tripura Election 2023: केंद्रीय गृहमंत्री ने 60 सीटों वाले त्रिपुरा को काफी समय दिया। तीन महत्वपूर्ण चुनावी जनसभा करके आए। लेकिन पश्चिम बंगाल के तृणमूल के एक बड़े नेता का कहना है कि भाजपा के सपने पर पानी फिर सकता है...

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Tripura Election 2023: Will Union Home Minister Amit Shah prediction be successful in Tripura
Tripura Election 2023: अमित शाह - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

भाजपा गृहमंत्री अमित शाह को राजनीति का चाणक्य मानती है। एक अच्छे चुनावी रणनीतिकार अमित शाह ने त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव को डंके की चोट पर जीतने की भविष्यवाणी की है। छोटे राज्य त्रिपुरा में भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। हालांकि इस बार उसे त्रिपुरा में लंबे समय से एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी कांग्रेस और सीपीएम के गठबंधन से सीधी चुनौती मिल रही है। दो प्रमुख क्षेत्रीय पाटियां भी चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या त्रिपुरा में अमित शाह की भविष्यवाणी सच हो पाएगी?

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त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव प्रचार में पांच साल पहले सुनील देवधर ने एड़ी चोटी का जोर लगाया था। इस बार भी प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा समेत कई केंद्रीय मंत्रियों ने काफी जोर लगाया। केंद्रीय गृहमंत्री ने 60 सीटों वाले त्रिपुरा को काफी समय दिया। तीन महत्वपूर्ण चुनावी जनसभा करके आए। लेकिन पश्चिम बंगाल के तृणमूल के एक बड़े नेता का कहना है कि भाजपा के सपने पर पानी फिर सकता है। भाजपा के त्रिपुरा के ही एक नेता का कहना है कि पिछले विधानसभा चुनाव वाली बात तो नहीं है, लेकिन उससे खराब स्थिति भी नहीं है। शांतनु बनर्जी कहते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक एजेंडा खड़ा किया था और जीत हासिल हुई थी। बिप्लब देब मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन बिप्लब देव सरकार से जनता में बढ़ती नाराजगी के बाद भाजपा ने माणिक साहा को मुख्यमंत्री बनाया। माणिक साहा की छवि साफ सुथरी है। मतदान में राज्य की जनता ने खूब मतदान (81 फीसदी) भी किया है। इतना ही नहीं चुनाव घोषणा पत्र से लेकर भाजपा ने वादा का पूरा पिटारा खोल दिया है। लेकिन साख दांव पर है।

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'जब पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व नहीं चला तो त्रिपुरा में भी नहीं चलेगा'

अभिषेक सरकार त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में हैं। चुनाव की नब्ज टटोलने गए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह की जनसभाओं को भी कवर किया। साफ कहते हैं कि मतदान के दिन वह घूमे। उन्हें पांच साल पहले वाला उत्साह नहीं दिखाई दिया। अभिषेक कहते हैं कि पांच साल पहले भगवा रंग चल रहा था, इस बार हिंदुत्व का रंग चुनाव में असर दिखाता नहीं दिखाई दे रहा है। सरकार के मुताबिक पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी हिंदुत्व का रंग नहीं दिखा था। असली मुद्दा जनता के बीच में भ्रष्टाचार और मूल समस्याओं से जुड़ा है। सरकार विरोधी लहर की भी स्थिति है। इसलिए मुझे काफी कुछ भाजपा के पक्ष में जाता नहीं दिखाई देता।

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सीपीएम के नेता और जितेन्द्र चौधरी ने इस बार त्रिपुरा में परिवर्तन का भरोसा जताया है। जितेंद्र चौधरी की छवि भी ठीक है। सीपीएम और कांग्रेस का गठबंधन सत्ता में आने की स्थिति में आया तो वह मुख्यमंत्री बन सकते हैं। जितेंद्र चौधरी कहते हैं कि त्रिपुरा की पांच साल की सरकार में आम जनता ने भाजपा को देख लिया है। अब उसमें हिंदुत्व वाली पार्टी के प्रति कोई उत्साह नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की एक राज्यसभा सांसद का कहना है कि पूरे देश में भाजपा राम मंदिर और हिन्दुत्व को धार दे रही है, लेकिन त्रिपुरा के चुनाव प्रचार में उसके एजेंडे से ही यह मुद्दा गायब था।

इस बार कौन दे रहा है भाजपा को कड़ी चुनौती?

विपक्ष का मुख्य नेतृत्व सीपीएम के नेता जितेंद्र चौधरी पर टिका है। आधार कांग्रेस और माकपा का गठबंधन है। विपक्ष की यह उम्मीद की किरण काफी हद तक वहां 48 सीटों पर चुनाव लड़ रही प्रद्युत कुमार किशोर की पार्टी टिपरा मोथा पर टिकी है। प्रद्युत कुमार शाही परिवार से ताल्लुक रखते हैं। आदिवासी प्रभावित 20 से अधिक विधानसभा सीटों में अच्छा खासा प्रभाव रखते हैं। उनकी पार्टी भाजपा सरकार की कारगुजारियों को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में है। मूल एजेंडा त्रिपुरा लैंड की मांग है। प्रद्युत कुमार किशोर की पार्टी अपना मुकाबला भाजपा से ही मानकर चल रही है। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि चुनाव बाद समीकरण बनने पर कांग्रेस, सीपीएम और टिपरा मोथा तालमेल की सरकार चला सकते हैं। दिलचस्प है कि 2018 में टिपरा मोथा ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था। इसने आईपीएफटी का समर्थन किया था। आईपीएफटी भी आदिवासी प्रभाव वाली पार्टी है। आईपीएफटी का भाजपा के साथ गठबंधन है। सीपीएम के जितेंद्र चौधरी भी आदिवासी समाज से हैं। ऐसे में वोट बंटने की काफी गुंजाइश है। यह भाजपा के पक्ष में कम है।

2018 और 2023 में काफी फर्क दिखाई दे रहा है

त्रिपुरा में पिछले विधानसभा चुनाव 2018 में हुए था। अरुण शंकर को 2018 और 2023 दोनों विधानसभा चुनाव में इस बार अंतर दिखाई दे रहा है। वह कहते हैं भाजपा के पास माणिक साहा जैसा नेता है। वह कांग्रेस से भाजपा में आए। शंकर कहते हैं कि 2018 में जनता कांग्रेस से ऊब चुकी थी। इसलिए पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 1.8 के आस-पास था। 2018 में भाजपा ने 36, सीपीएम ने 16 और आईपीएफटी ने 8 सीटें जीती थीं। लेकिन 2019 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के बावजूद बड़ी संख्या में मतदाताओं ने कांग्रेस में भरोसा जताया। अरुण शंकर कहते हैं कि भले ही कांग्रेस को सीट जीतने में सफलता नहीं मिली, लेकिन वोट प्रतिशत बढ़कर 25 फीसदी तक हो गया। इसका मतलब साफ है कि जनता के मन में सीपीएम को लेकर भी बदलाव होगा। क्योंकि जनता हिंदुत्व के एजेंडे पर नहीं आती तो इसका फायदा सीपीएम के खाते में जाने की संभावना बढ़ेगी।

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