आधार, आरक्षण और प्रसारण : सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फैसलों की हैट्रिक

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 26 Sep 2018 03:21 PM IST
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Three important decisions heard by Supreme Court

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार सुबह तीन अहम मामलों में फैसला सुनाया। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर को रिटायर हो जाएंगे, लिहाजा रिटायरमेंट से पहले सिर्फ चार कार्य दिवस ही शेष बचे हैं। बुधवार सुबह कोर्ट की कार्यवाही शुरू होने के बाद एक के बाद एक कुल तीन बड़े फैसले आए। समझिए तीनों फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कुछ कहा। 
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यह भी पढ़ें : पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 'इस पर फिर से विचार की जरूरत नहीं'
सरकारी नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण देना जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण पर अहम फैसला सुनाते हुए अनुसूचित जाति और जनजाति (एससी-एसटी) के सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देने से इनकार कर दिया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को ये अधिकार दिया है कि वे चाहें तो वे राज्य स्तरीय सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण दे सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में एससी/एसटी को आरक्षण मिलेगा लेकिन इसके निर्धारण का अधिकार राज्य सरकारों को दिया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने कहा कि नागराज जजमेंट को सात जजों को रैफर करने की जरूरत नहीं है। 

जस्टिम सीकरी ने पढ़ा संविधान पीठ का फैसला
संविधान पीठ के फैसले को पढ़ते हुए जस्टिस सीकरी ने कहा कि केंद्र सरकार को पदोन्नति में आरक्षण के पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने की आवश्यकता नहीं है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार की ओर से पहले कहा गया था कि वह पदोन्नति में आरक्षण के लिए आंकड़े जुटाएगी।

फैसला सुनाते हुए जस्टिस नरीमन ने कहा कि नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही था, इसलिए इस पर फिर से विचार करना जरूरी नहीं है। यानी इस मामले को दोबारा सात जजों की पीठ के पास भेजना जरूरी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आंकड़े जारी करने के बाद राज्य सरकारें आरक्षण पर विचार कर सकती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकारें आरक्षण देने के लिए निम्नलिखित कारकों को ध्यान में रखकर नीति बना सकती हैं। 

1. वर्गों का पिछड़ापन निर्धारण

2. नौकरी में उनके प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता

3. संविधान के अनुच्छेद 335 का अनुपालन

कोर्ट ने कहा कि पिछड़ेपन का निर्धारण राज्य सरकारों द्वारा एकत्र आंकड़ों के आधार पर तय किया जाएगा। बता दें कि नागराज बनाम संघ के फैसले के अनुसार प्रमोशन में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती। इस सीमा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा है कि 'क्रीमी लेयर' के सिद्धांत को सरकारी नौकरियों की पदोन्नती में एससी-एसटी आरक्षण में लागू नहीं किया जा सकता।

दरअसल, 2006 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने सरकारी नौकरियों में प्रमोशन पर आरक्षण को लेकर फैसला दिया था, उस वक्त कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ इस तरह की व्यवस्था को सही ठहराया था।

यह भी पढ़िए : क्यों उठी थी प्रमोशन में आरक्षण की मांग: जानिए पूरा इतिहास

पढ़िए एम. नागराज का फैसला 

सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में केस में एम. नागराज को लेकर फैसला दिया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा सरकारी नौकरियों की पदोन्नतियों में एससी-एसटी आरक्षण में लागू नहीं की जा सकती, जैसा अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर को लेकर पहले के दो फैसलों 1992 के इंद्रा साहनी व अन्य बनाम केंद्र सरकार (मंडल आयोग फैसला) और 2005 के ईवी चिन्नैय्या बनाम आंध्र प्रदेश के फैसले में कहा गया था, लेकिन आरक्षण के लिए राज्य सरकारों को मात्रात्मक डेटा देना होगा.

नागराज फैसले पर क्या था केंद्र का तर्क?

दरअसल, इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2006 में नागराज मामले में आया फैसला एससी-एसटी कर्मचारियों के प्रमोशन में आरक्षण दिए जाने में बाधा डाल रहा है, लिहाजा इस फैसले पर फिर से विचार की जरूरत है।

हालांकि, 12 साल बाद भी न तो केंद्र और न राज्य सरकारों ने ये आंकड़े दिए। इसके बजाय कई राज्य सरकारों ने प्रमोशन में आरक्षण के कानून पास किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते ये कानून रद्द होते गए। एससी-एसटी संगठनों ने प्रमोशन में आरक्षण की मांग को लेकर 28 सितंबर को बड़े आंदोलन का एलान कर रखा है।
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