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क्यों उठी थी प्रमोशन में आरक्षण की मांग: जानिए पूरा इतिहास

Wed, 26 Sep 2018 11:49 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला
न्यूज डेस्क,अमर उजाला Updated Wed, 26 Sep 2018 11:49 AM IST
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why demand of reservation in promotion: know complete history
पदोन्नति में आरक्षण
सरकारी नौकरी में पदोन्नति में एससी/एसटी को आरक्षण देने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने आज बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 2006 के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा है कि एम नागराज केस के फैसले पर दोबारा विचार नहीं किया जा सकता। देश के प्रमुख न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए ये भी कहा कि यह मामला 7 जजों की बेंच को नहीं भेजा जाएगा।
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संविधान पीठ के फैसले को पढ़ते हुए जस्टिस सीकरी ने कहा कि केंद्र सरकार को पदोन्नति में आरक्षण के पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने की आवश्यकता नहीं है। जबकि केंद्र सरकार कोर्ट को बताया था कि वो पहले पदोन्नति में आरक्षण के लिए आंकड़े जुटाएगी।
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क्या है एम नागराज का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के एम. नागराज केस को लेकर फैसला दिया था कि 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा सरकारी नौकरियों की पदोन्नतियों में एससी-एसटी आरक्षण में लागू नहीं की जा सकती, जैसा अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर को लेकर पहले के दो फैसलों 1992 के इंद्रा साहनी और अन्य बनाम केंद्र सरकार (मंडल आयोग फैसला) और 2005 के ईवी चिन्नैय्या बनाम आंध्र प्रदेश के फैसले में कहा गया था। 
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क्या था पेंच?

1. राज्य सरकारों की दलील है कि जब राष्ट्रपति ने नोटिफिकेशन के जरिए एससी/एसटी के पिछड़ेपन को निर्धारित किया है, तो इसके बाद पिछड़ेपन को आगे निर्धारित नहीं किया जा सकता।
2. कई न्यायिक फैसलों और बीएसपी जैसी पार्टियों के दबाव के चलते यूपीए सरकार ने संविधान में 117वें संशोधन का बिल 2012 में पेश में किया, लेकिन यह संसद में पास नहीं हो सका। 
3. संविधान पीठ सरकारी नौकरियों की पदोन्नति में 'क्रीमी लेयर' के लिए एससी-एसटी आरक्षण के मुद्दे पर अपने 12 साल पुराने फैसले की समीक्षा।
4. संविधान पीठ इस बात पर भी विचार करेगी कि इस मुद्दे पर सात जजों की पीठ को पुनर्विचार करने की जरूरत है या नहीं।
5. क्या सरकारी नौकरी में पदोन्नति में एससी/एसटी को आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं, भले ही इस संबंध में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर डेटा ना हो।

 

प्रमोशन में आरक्षण की मांग का इतिहास

1. एससी/एसटी को सबसे पहले 1955 में पदोन्नति में आरक्षण दिया गया था।

2. 1992 में इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था। जिसके बाद सरकार को सरकारी नौकरियों में मिलने वाले पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगानी पड़ी।

3. 1955 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने संविधान में 77वां संशोधन कर अनुच्छेद 16 में नई धारा 4/A को जोड़ा गया जिसके तहत एससी-एसटी प्रतिभागियों को वरियता देते हुए पदोन्नत किया जा सकता था।
 
4. इस नए कानून की संविधानिक वैधता को फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 2006 में एम नागराज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में न्यायालय निर्देश दिए कि प्रमोशन देने के लिए संबंधित राज्य को अनुच्छेद 335 के तहत जायज कारण बताने होंगे मसलन पिछड़ापन,प्रतिनिधित्व की कमी और प्रतिभागी की प्रशासनिक योग्यता।

5. 2010 में राजस्थान हाईकोर्ट और 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की इसी निर्देश का पालन करते हुए पदोन्नति में आरक्षण के राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया था।

आरक्षण की अधिकतम सीमा 

1. 1963 में बाला जी मामले के फैसले को दोहराते हुए इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता। क्योंकि एक तरफ हमें मेरिट का ख्याल रखना होगा तो दूसरी तरफ हमें सामाजिक न्याय को भी ध्यान में रखना होगा।

2. लेकिन इसी मामले में जस्टिस जीवन रेड्डी ने ये साफ तौर पर कहा है कि विशेष परिस्थिति में स्पष्ट कारण दिखाकर सरकार 50 फीसदी की सीमा रेखा को भी लांघ सकती है।

3. हालांकि सामान्य तौर पर 50 फीसदी का नियम है कि इससे ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए।

क्या है आरक्षण देने का तरीका 

1. राज्य अपने यहां एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करता है ,जिसका काम राज्य के अलग अलग तबकों की सामाजिक स्थिति का ब्यौरा रखना है।
2. ओबीसी कमीशन इसी आधार पर अपनी सिफारिशें देता है।
3. मामला पूरे देश का है तो राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग अपनी सिफारिशें करे।
4. 1993 के मंडल कमीशन केस में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने बताया था कि किस-किस आधार पर भारतीय संविधान के तहत आरक्षण दिया जा सकता है।
5. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक जाति अपने आप में कोई आधार नहीं बन सकती, दिखाना पड़ेगा कि पूरी जाति ही शैक्षणिक और सामाजिक रूप से बाकियों से पिछड़ी है।

आपको बता दें कि सभी पार्टी की सरकारें पदोन्नति में आरक्षण की पक्षधर रही हैं और इसे लागू करने की पूरी कोशिश की गई थी। अभी तक केंद्र सरकार और राज्य सरकारें नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण दे रही हैं। हालांकि कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें चाहें तो आरक्षण दे सकती हैं। पदोन्नति में आरक्षण की मांग सरकारी ही नहीं बल्कि गैर-सरकारी नौकरियों में भी होती रही है।
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