Manipur Violence: मणिपुर हिंसा में यह है 'गोल्डन ट्रायंगल' का बड़ा कनेक्शन, मैक्सिको का भी सामने आ रहा नाम
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विस्तार
मणिपुर में हो रही हिंसा के पीछे जो भी सियासी कारण बताए जा रहे हों, लेकिन हकीकत में इन सबके पीछे बड़ा कारण इस इलाके में होने वाला नशे का अवैध कारोबार ही है। दरअसल मणिपुर के कुछ जिलों में म्यांमार, थाईलैंड और लाओस के बड़े ड्रग माफियाओं का कब्जा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो से जुड़े सूत्रों के मुताबिक म्यांमार, थाईलैंड और लाओस के गोल्डन ट्रायंगल में होने वाली नशे की बड़ी तस्करी की खेप मणिपुर के भारत-म्यांमार बॉर्डर के माध्यम से आगे पहुंचाई जाती है। जानकारों के अनुसार दरअसल मणिपुर के कुछ जिलों की भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण म्यांमार, थाईलैंड और लाओस के बड़े ड्रग माफिया अपने कारोबार को यहां के सस्ते कामगार और अफीम की अच्छी उपज के चलते आगे बढ़ा रहे हैं। दक्षिण एशिया के इन राज्यों में उत्तरी अमेरिका के मेक्सिको के बड़े ड्रग कार्टेल का सपोर्ट भी बताया जा रहा है। क्योंकि दुनिया की सबसे अच्छी अफीम में म्यांमार और मणिपुर की अफीम को एक से तीन नंबर के पायदान पर ही हमेशा रखा जाता है। जिस प्रोसेस करके अंतरराष्ट्रीय बाजार में हेरोइन के तौर पर भी आगे बेचने का धंधा चलता है। फिलहाल मणिपुर की अफीम के लिए उपजाऊ जमीन पर सबसे ज्यादा कब्जा कुकी चिन समुदाय के लोगों का है। इसलिए नए समीकरणों में जमीन की दावेदारी पर इस समुदाय के हक कम होने से नशे के व्यापार पर पड़ने वाले समीकरणों से हालात और ज्यादा बिगड़ रहे हैं।
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हजारों एकड़ में होती है अफीम की खेती
राज्य की एंटी ड्रग्स यूनिट नारकोटिक्स एंड अफेयर्स ऑफ बॉर्डर के मुताबिक मणिपुर में 2017 से 2023 तक अफीम की खेती 15497 एकड़ में होती है। नारकोटिक्स एंड अफेयर्स ऑफ़ बॉर्डर से जुड़े सूत्रों के मुताबिक 15497 एकड़ जमीन पर सबसे ज्यादा अफीम की खेती के लिए कब्जा कुकी चिन का है। सूत्रों के मुताबिक 13122 एकड़ जमीन पर कुकी अफीम की खेती का दावा करते हैं। जबकि 2340 एकड़ पहाड़ी जमीन पर नगा का दावा है। सूत्रों के मुताबिक पूरे मणिपुर में मैतेई 35 एकड़ पहाड़ी भूभाग पर अफीम उगाते हैं। नारकोटिक्स एंड अफेयर्स ऑफ़ बॉर्डर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यहां पैदा होने वाली अफीम को म्यांमार के बड़े ड्रग माफिया स्थानीय लोगों के साथ मिलकर नशे का बड़ा धंधा चलाते हैं। सूत्रों के मुताबिक अब जब नई व्यवस्था के मुताबिक नगा और कुकी समुदाय की जमीनों को मैतेई समुदाय के बीच में बड़ी हिस्सेदारी मिलने की कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई, तो मणिपुर में हालात हिंसक हो गए। जानकारों का कहना है कि पूरे मामले में म्यांमार के पीछे चीन भी अपनी चाल चल रहा है।
म्यांमार, लाओस और थाईलैंड बना 'गोल्डन ट्रायंगल'
मणिपुर में नशे के कारोबार पर नजर रखने वाली एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक मणिपुर में नशे के पीछे थाईलैंड, लाओस और म्यांमार का बड़ा कनेक्शन काम कर रहा है। एजेंसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा करीब 95 फीसदी अफीम की पैदावार अफगानिस्तान, मेक्सिको और म्यांमार में ही होती है। क्योंकि म्यांमार से लगता हुआ भारत का मणिपुर राज्य उन्हीं भौगोलिक दशाओं में है, जिसमें म्यांमार के भीतर बड़ी मात्रा में अफीम की खेती होती है। उनका कहना है कि म्यांमार, थाईलैंड और लाओस के बड़े ड्रग माफियाओं ने सस्ते कामगारों और अपने ही देश जैसी भौगोलिक दशाओं वाले मणिपुर में बड़े ड्रग उत्पादन और नशे के बड़े कारोबार वाले हब के तौर पर विकसित करना शुरू कर दिया। ड्रग्स एंड मेडिसिन डेवलपमेंट फॉर ह्यूमैनिटी के चरणजीत सिंह भोगल कहते हैं कि मणिपुर की अफीम को दुनिया की सबसे बेहतरीन और उच्च गुणवत्ता के तौर पर पहचाना जाता है। उनका मानना है कि इसी वजह से मणिपुर को गोल्डन ट्रायंगल वाले म्यांमार, थाईलैंड और लाओस जैसे देश अपने फायदे के लिए यहां पर नशे के कारोबार को न सिर्फ बढ़ावा देते हैं बल्कि तस्करी भी करते हैं।
इसलिए आ रहा उत्तर अमेरिका के मेक्सिको का भी नाम
मणिपुर में नशे के कारोबार पर नियंत्रण करने वाली जांच एजेंसियों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि म्यांमार, लाओस और थाईलैंड में अमेरिका के मेक्सिको के बड़े ड्रग कार्टेल का हस्तक्षेप सीधे तौर पर सामने आता रहा है। एक प्रमुख जांच एजेंसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि अमेरिका की ड्रग एनफोर्समेंट एजेंसी (डीईए) और यूनाइटेड नेशन के यूएन रिपोर्ट ऑन ड्रग एंड क्राइम में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक उत्तरी अमेरिका के मेक्सिको के बड़े ड्रग कार्टेल समूची दुनिया के सबसे बड़े ड्रग उत्पादक देशों पर अपनी पकड़ बनाकर रखते हैं। इनके कार्टेल से जुड़े हुए हुए नशे के सौदागर यूरोपीय यूनियन, अफगानिस्तान, अमेरिका, अफ्रीका, और म्यांमार समेत भारत अपना बड़ा हस्तक्षेप रखते हैं। इस पूरे मामले में नजर रखने वाले प्रमुख जांच एजेंसी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सीधे तौर पर तो फिलहाल मणिपुर में बिगड़े हालातों में म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के बड़े ड्रग माफियाओं गोल्डन ट्रायंगल का भी हाथ नजर आ रहा है।
साल दर साल बढ़ रही है ड्रग माफियाओं की एंट्री
म्यांमार, थाईलैंड और लाओस के ड्रग माफियाओं के इशारों पर मणिपुर में स्थानीय लोग नशे के कारोबार में जबरदस्त तरीके से शामिल हो चुके हैं। एंटी ड्रग यूनिट नारकोटिक्स एंड अफेयर्स बॉर्डर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 2017 से लेकर 2020 तक 2518 लोग नशे की बड़ी तस्करी में संलिप्त पाए गए और उन्हें हिरासत में लिया गया। आंकड़ों के मुताबिक बीते 5 सालों में सबसे ज्यादा हिरासत में मुस्लिम समुदाय के 1083 लोगों को लिया गया। उसके बाद पूरे मणिपुर में कुकी चिन समुदाय के 873 लोगों को नशे के अवैध धंधे में शामिल पाया गया और उन्हें हिरासत में लिया। समूचे मणिपुर में 381 लोग मैतेई समुदाय के लोग भी नशे के अवैध कारोबार में संलिप्त पाए गए। जबकि 181 अन्य दूसरी जाति समुदाय के लोग इस अवैध धंधे में शामिल होने के चलते हिरासत में लिए गए।
नशे के कारोबार में कुकी चिन लगातार बढ़ते रहे
आंकड़ों के मुताबिक 13122 एकड़ जमीन पर कुकी चिन अफीम की खेती का दावा करते हैं। जांच एजेंसियों के आंकड़ों में दर्ज दस्तावेजों के मुताबिक 2017 में कुकी समुदाय के 82 लोग नशे के कारोबार में लिप्त होकर जेल भेजे गए। हालांकि यह संख्या 2018 में 54 पर ही सिमट गई। लेकिन 2019 में यह बढ़कर दुगने से भी ज्यादा 122 हो गई। कोविड के दौर के बावजूद 2020 में कुकी समुदाय से जुड़े नशे के व्यापारियों की संख्या बढ़कर 127 हो गई। 2021 में 151 और 2022 में 288 कुकी समुदाय के लोग नशे के व्यापार में जांच एजेंसियों के हत्थे चढ़े। जांच एजेंसी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 2018 और 19 के बीच में कुकी समुदाय के तस्करों ने नशे के कारोबार में बढ़ावा किया तो मुस्लिम समुदाय के तस्करों की संख्या कुछ कम हुई।
इसलिए मणिपुर बना अफीम की खेती का स्वर्ग, बनाए अस्थाई ठिकाने भी
अफीम के लिए उपजाऊ जमीन, सस्ते मजदूर, आपसी कलह और बेरोजगारी का फायदा म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के तस्करों ने उठाया। वरिष्ठ रिटायर आईपीएस अधिकारी सुजान बनर्जी कहते हैं कि मणिपुर में म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के बड़े नशे के कारोबारियों और ड्रग कार्टेल चलाने वालों के अपने स्थाई और अस्थाई ठिकाने बनाकर लोगों को गुमराह करते हैं। इन कारोबारियों के लिए स्थानीय लोग पैसों के खातिर न सिर्फ अफीम की खेती में यहां के अलग-अलग जाति समुदाय के लोगों को शामिल कराते हैं बल्कि उनके इशारे पर बाद में तस्करी भी करते हैं। सुजान का कहना है कि मणिपुर में इतने व्यवस्थित तरीके से अब नशे का कारोबार होता है कि सब कुछ 'सिस्टम' में आ गया है, हालांकि यह सिस्टम अवैध है। वहीं जिम्मेदार एजेंसियां समय-समय पर बड़ी कार्रवाई के माध्यम से न सिर्फ फसलों को नष्ट करती हैं, बल्कि नशे के अवैध कारोबार में शामिल लोगों को जेल भी भेजती हैं।
6300 किलो नष्ट की गई अफीम, फिर भी बढ़ रही पैदावार
एक आंकड़े के मुताबिक मणिपुर मे तकरीबन सोलह हजार एकड़ से ज्यादा की पहाड़ी जमीन पर अवैध अफीम की खेती होती है। मणिपुर सरकार और जांच एजेंसियां ऐसी अवैध खेती पर लगातार बुलडोजर भी चलाती हैं। एक आंकड़े के मुताबिक बीते कुछ समय में सात जिलों की 630 एकड़ जमीन पर 6300 किलो अफीम को नष्ट किया गया। आंकड़ों के मुताबिक मणिपुर के कामजोंग जिले की 80 एकड़ जमीन पर 800 किलो अफीम को नष्ट किया गया। इसी तरह छुरछंदपुर जिले की 220 एकड़ जमीन पर 2200 किलो, कांपपोंगजी जिले की सौ एकड़ जमीन पर 1100 किलो, सेनापति जिले की 150 एकड़ जमीन पर 150 किलो, उखरूल की 90 एकड़ पर 900 किलो और टेंगनोपाल के 35 एकड़ में 350 किलो और चंदेल जिले के 90 एकड़ में 900 किलो अफीम को नष्ट किया गया। मणिपुर की एंटी ड्रग यूनिट नारकोटिक्स एंड अफेयर्स ऑफ़ बॉर्डर से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में नष्ट की गई अफीम की कीमत ही तकरीबन 100 करोड रुपये से ज्यादा की थी।
मणिपुर हालातों के पीछे यह भी हैं वजहें
सिन्हा का मानना है कि इस वक्त जो मणिपुर में हालात हैं, उसके पीछे व्यवस्थित रूप से चल रहे नशे के कारोबार का एक बड़ा हाथ है। वह कहते हैं कि नशे के कारोबार में संलिप्त एक प्रमुख समुदाय के लोगों को यह लग रहा है कि अब मणिपुर में कोर्ट के आदेश के बाद मैतेई समुदाय के लोगों को जमीन का हक मिलने का दायरा बढ़ जाएगा। ऐसे में उनकी जमीनों पर होने वाली अवैध अफीम की खेती और ड्रग के फल-फूल रहे अवैध कारोबार खत्म होने का डर बना हुआ है। यही वजह है कि मणिपुर में हालात और ज्यादा बिगड़ रहे हैं। हालांकि नॉर्थ-ईस्ट से जुड़े विश्लेषकों का मानना है कि मणिपुर के हालात सिर्फ बड़े नशे के कारोबार की वजह से ही नहीं बिगड़े हैं, बल्कि सियासी शिथिलता के चलते भी यहां के हालात बिगड़े हैं। नार्थ ईस्ट के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक जाईलोंग कहते है कि जिस तरीके से मणिपुर के लोगों के हाथों में अत्याधुनिक हथियार पहुंचे और फिर हिंसा हुई पर निश्चित तौर पर न सिर्फ जांच का विषय है, बल्कि आगे के लिए चिंता का विषय है। जाइलोंग कहते हैं कि इस पूरे मामले में यह जरूर पता किया जाना चाहिए कि आखिर अत्याधुनिक हथियारों की पहुंच माहौल खराब करने वालों तक कैसे पहुंचे। जो सवाल उठाते हैं कि क्या यह हथियार अंतरराष्ट्रीय तस्कर गिरोहों की ओर से उन तक पहुंचाए गए। अगर ऐसा है तो या बेहद चिंताजनक है इसका सीधा सीधा इंटरनेशनल ड्रग तस्कर कार्टेल कनेक्शन भी है। इस पूरे मामले में जांच कर रही है केंद्रीय एजेंसियों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि वह मणिपुर हिंसा में हर एंगल पर तफ्तीश कर केंद्र को पूरी रिपोर्ट भेज रहे हैं।