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SC: 'सरकारी कॉलेज में दाखिले से नौकरी का अधिकार पक्का नहीं होता', सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा
Thu, 08 Jan 2026 07:58 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 08 Jan 2026 07:58 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई
- फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कॉलेज में दाखिला मिल जाना अपने आप में सरकारी नौकरी पाने का अधिकार सुनिश्चित नहीं करता। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि विज्ञापन या नीति में नियुक्ति की कोई स्पष्ट गारंटी या आश्वासन नहीं है तो केवल दाखिले के आधार पर नौकरी की मांग नहीं की जा सकती। यह टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने आयुर्वेदिक स्टाफ नर्स के पद पर नियुक्ति की मांग करने वाले अभ्यर्थियों की याचिका खारिज कर दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटा
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 जनवरी 2025 के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सरकारी कॉलेज से प्रशिक्षित अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में वैध अपेक्षा का सिद्धांत लागू नहीं होता क्योंकि समय के साथ सरकारी नीति और योजना में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि पहले आयुर्वेदिक नर्सिंग प्रशिक्षण के लिए केवल 20 सीटें थीं और सिर्फ एक सरकारी संस्थान को यह कोर्स संचालित करने की अनुमति थी। उस समय रिक्त पदों की संख्या अधिक होने के कारण अधिकतर प्रशिक्षुओं को समायोजित कर लिया गया होगा। हालांकि, बाद में स्थिति बदल गई और सरकार ने 15 निजी कॉलेजों को भी यही प्रशिक्षण देने की अनुमति दे दी। ऐसे में पहले की प्रथा के आधार पर भविष्य में नियुक्ति की उम्मीद करना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
भेदभाव तभी माना जाएगा जब समान स्थिति वाले लोगों के साथ हुआ हो अलग-अलग व्यवहार
अदालत ने कहा कि भेदभाव तभी माना जाएगा जब समान स्थिति वाले लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाए। यहां राज्य सरकार यह साबित करने में सफल रही कि 2010-11 सत्र के बाद प्रवेश लेने वाले किसी भी अभ्यर्थी की पुरानी व्यवस्था के तहत नियुक्ति नहीं की गई।
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राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि आयुर्वेदिक स्टाफ नर्स की नियुक्ति से संबंधित उत्तर प्रदेश आयुष (आयुर्वेद) नर्सिंग सेवा नियम वर्ष 2021 में बनाए गए। इसके साथ ही चयन प्रक्रिया में भी बदलाव हुआ। पहले चयन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा किया जाता था, जबकि अब यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से होती है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार कर दिया और साफ किया कि सरकारी कॉलेज में दाखिला मात्र से नौकरी का अधिकार स्वत: उत्पन्न नहीं होता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटा
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 जनवरी 2025 के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सरकारी कॉलेज से प्रशिक्षित अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में वैध अपेक्षा का सिद्धांत लागू नहीं होता क्योंकि समय के साथ सरकारी नीति और योजना में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि पहले आयुर्वेदिक नर्सिंग प्रशिक्षण के लिए केवल 20 सीटें थीं और सिर्फ एक सरकारी संस्थान को यह कोर्स संचालित करने की अनुमति थी। उस समय रिक्त पदों की संख्या अधिक होने के कारण अधिकतर प्रशिक्षुओं को समायोजित कर लिया गया होगा। हालांकि, बाद में स्थिति बदल गई और सरकार ने 15 निजी कॉलेजों को भी यही प्रशिक्षण देने की अनुमति दे दी। ऐसे में पहले की प्रथा के आधार पर भविष्य में नियुक्ति की उम्मीद करना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
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भेदभाव तभी माना जाएगा जब समान स्थिति वाले लोगों के साथ हुआ हो अलग-अलग व्यवहार
अदालत ने कहा कि भेदभाव तभी माना जाएगा जब समान स्थिति वाले लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाए। यहां राज्य सरकार यह साबित करने में सफल रही कि 2010-11 सत्र के बाद प्रवेश लेने वाले किसी भी अभ्यर्थी की पुरानी व्यवस्था के तहत नियुक्ति नहीं की गई।
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राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि आयुर्वेदिक स्टाफ नर्स की नियुक्ति से संबंधित उत्तर प्रदेश आयुष (आयुर्वेद) नर्सिंग सेवा नियम वर्ष 2021 में बनाए गए। इसके साथ ही चयन प्रक्रिया में भी बदलाव हुआ। पहले चयन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा किया जाता था, जबकि अब यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से होती है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार कर दिया और साफ किया कि सरकारी कॉलेज में दाखिला मात्र से नौकरी का अधिकार स्वत: उत्पन्न नहीं होता।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें भ्रष्टाचार के मामलों में दर्ज कुछ एफआईआर को अमान्य घोषित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने एफआईआर को रद्द करवाने के लिए अनुचित प्रयास किए। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण न्याय का मजाक है और अब हाईकोर्ट इन एफआईआर या इन मामलों में चल रही जांच के खिलाफ कोई और चुनौती स्वीकार नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह कदम केवल उस थाने के अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर उठाया था जिसने कई प्राथमिकी दर्ज की थीं।
राज्य की एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) और अन्य ने हाईकोर्ट के पिछले साल अगस्त के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया। बेंच ने कहा कि इन एफआईआर को भ्रष्टाचार रोधी कानून के तहत दर्ज किया गया था और इनमें कुछ मामलों में जांच को रोक दिया गया और कुछ मामलों में आपराधिक कार्रवाई खत्म कर दी गई।
बेंच ने कहा, हमारी राय में हाईकोर्ट का दृष्टिकोण न्याय का मजाक है। अगर किसी तकनीकी आधार पर एफआईआर को रद्द किया जाता है, तो हाईकोर्ट का कर्तव्य है कि वह कानून स्पष्ट करे कि किस थाने को अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 2(एस) थाने की परिभाषित करती है।
राज्य की एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) और अन्य ने हाईकोर्ट के पिछले साल अगस्त के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया। बेंच ने कहा कि इन एफआईआर को भ्रष्टाचार रोधी कानून के तहत दर्ज किया गया था और इनमें कुछ मामलों में जांच को रोक दिया गया और कुछ मामलों में आपराधिक कार्रवाई खत्म कर दी गई।
बेंच ने कहा, हमारी राय में हाईकोर्ट का दृष्टिकोण न्याय का मजाक है। अगर किसी तकनीकी आधार पर एफआईआर को रद्द किया जाता है, तो हाईकोर्ट का कर्तव्य है कि वह कानून स्पष्ट करे कि किस थाने को अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 2(एस) थाने की परिभाषित करती है।
अंतरिम आदेशों के कारण जघन्य मामलों में वर्षों तक ट्रायल रुकना न्याय का मजाक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हत्या, दुष्कर्म, दहेज हत्या जैसे जघन्य अपराधों में यदि हाईकोर्ट से पारित अंतरिम आदेशों के कारण ट्रायल लंबे समय तक लंबित रहते हैं, तो यह न्यायिक व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है। शीर्ष अदालत ने कहा, न्याय केवल अभियुक्तों तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि पीड़ितों और उनके परिजनों के अधिकारों की अनदेखी कर वर्षों तक ट्रायल रोकना न्याय का उपहास उड़ाने के समान है।
'न्याय सभी पक्षों के लिए होना चाहिए'
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, 'न्याय सभी पक्षों के लिए होना चाहिए। अन्याय कहीं भी हो, वह हर जगह न्याय के लिए खतरा है।' पीठ ने सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया कि जिन मामलों में अंतरिम आदेशों के चलते हत्या, दहेज हत्या, दुष्कर्म जैसे संवेदनशील और गंभीर अपराधों के ट्रायल रुके हुए हैं, उन्हें तुरंत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए और शीघ्र निपटारा सुनिश्चित हो। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अंतरिम राहत, स्थायी रोक का जरिया न बने। रजिस्ट्रार से मांगा पिछले 25 वर्षों का रिकॉर्ड...अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से 2001 से 2026 के बीच दायर और निपटाए गए आपराधिक मामलोंका विस्तृत विवरण मांगा। साथ ही सवाल उठाया कि राजस्थान सरकार ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया?
दो दशकों तक रुका रहा ट्रायल
पीठ महिला की शादी के एक वर्ष के भीतर हुई मृत्यु के मामले में सुनवाई कर रही थी। वर्ष 2002 में दहेज उत्पीड़न और हत्या के आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई थी। वर्ष 2003 में राजस्थान हाईकोर्ट में दायर पुनरीक्षण याचिका पर जारी अंतरिम आदेश के कारण ट्रायल पर रोक लग गई। यह याचिका लगभग दो दशकों तक लंबित रही और 2025 में खारिज की गई। इसके बाद अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस अपील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे बेहद परेशान करने वाला बताया और कहा कि इतने गंभीर अपराध में ट्रायल का करीब 20 वर्षों तक रुका रहना संस्थागत देरी को उजागर करता है।
'न्याय सभी पक्षों के लिए होना चाहिए'
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, 'न्याय सभी पक्षों के लिए होना चाहिए। अन्याय कहीं भी हो, वह हर जगह न्याय के लिए खतरा है।' पीठ ने सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया कि जिन मामलों में अंतरिम आदेशों के चलते हत्या, दहेज हत्या, दुष्कर्म जैसे संवेदनशील और गंभीर अपराधों के ट्रायल रुके हुए हैं, उन्हें तुरंत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए और शीघ्र निपटारा सुनिश्चित हो। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अंतरिम राहत, स्थायी रोक का जरिया न बने। रजिस्ट्रार से मांगा पिछले 25 वर्षों का रिकॉर्ड...अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से 2001 से 2026 के बीच दायर और निपटाए गए आपराधिक मामलोंका विस्तृत विवरण मांगा। साथ ही सवाल उठाया कि राजस्थान सरकार ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया?
दो दशकों तक रुका रहा ट्रायल
पीठ महिला की शादी के एक वर्ष के भीतर हुई मृत्यु के मामले में सुनवाई कर रही थी। वर्ष 2002 में दहेज उत्पीड़न और हत्या के आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई थी। वर्ष 2003 में राजस्थान हाईकोर्ट में दायर पुनरीक्षण याचिका पर जारी अंतरिम आदेश के कारण ट्रायल पर रोक लग गई। यह याचिका लगभग दो दशकों तक लंबित रही और 2025 में खारिज की गई। इसके बाद अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस अपील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे बेहद परेशान करने वाला बताया और कहा कि इतने गंभीर अपराध में ट्रायल का करीब 20 वर्षों तक रुका रहना संस्थागत देरी को उजागर करता है।