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सुप्रीम कोर्ट अपडेट: यूनिटेक केस में अदालत ने ईडी-दिल्ली पुलिस से मांगी रिपोर्ट, 30 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
Wed, 16 Sep 2026 07:37 PM IST
अमन तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 16 Sep 2026 07:37 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स
- फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और दिल्ली पुलिस को रियल एस्टेट कंपनी यूनिटेक लिमिटेड के निदेशकों के खिलाफ दर्ज मामलों का पूरा ब्योरा देने का निर्देश दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि मुकदमों की सुनवाई में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने इन मामलों की विशेष सुनवाई के लिए विशेष अदालत बनाने की बात कही। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर को होगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि घर खरीदारों का पैसा कहां गया और क्या यह देश से बाहर भेजा गया। अदालत को बताया गया कि यूनिटेक निदेशकों के खिलाफ मामलों की जांच दो हिस्सों में हो रही है। कुछ मामलों की जांच ईडी कर रही है, जबकि आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) 63 मामलों में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है।
यूनिटेक के करीब 22,000 घर खरीदार कई वर्षों से अपने घरों का इंतजार कर रहे हैं। फोरेंसिक ऑडिट के अनुसार, पूर्व प्रमोटर संजय चंद्रा और अजय चंद्रा के कार्यकाल में करीब 29,800 खरीदारों से 14,270 करोड़ रुपये और छह वित्तीय संस्थानों से 1,805 करोड़ रुपये मिले थे। ऑडिट में खरीदारों की 5,063 करोड़ और वित्तीय संस्थानों की 763 करोड़ रुपये की राशि का इस्तेमाल नहीं किए जाने की बात कही गई थी। साथ ही, 2007 से 2010 के बीच टैक्स-हेवन देशों में हाई-वैल्यू निवेश किए जाने की बात सामने आई थी।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि घर खरीदारों का पैसा कहां गया और क्या यह देश से बाहर भेजा गया। अदालत को बताया गया कि यूनिटेक निदेशकों के खिलाफ मामलों की जांच दो हिस्सों में हो रही है। कुछ मामलों की जांच ईडी कर रही है, जबकि आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) 63 मामलों में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है।
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यूनिटेक के करीब 22,000 घर खरीदार कई वर्षों से अपने घरों का इंतजार कर रहे हैं। फोरेंसिक ऑडिट के अनुसार, पूर्व प्रमोटर संजय चंद्रा और अजय चंद्रा के कार्यकाल में करीब 29,800 खरीदारों से 14,270 करोड़ रुपये और छह वित्तीय संस्थानों से 1,805 करोड़ रुपये मिले थे। ऑडिट में खरीदारों की 5,063 करोड़ और वित्तीय संस्थानों की 763 करोड़ रुपये की राशि का इस्तेमाल नहीं किए जाने की बात कही गई थी। साथ ही, 2007 से 2010 के बीच टैक्स-हेवन देशों में हाई-वैल्यू निवेश किए जाने की बात सामने आई थी।
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दिव्यांगता पेंशन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 271 अपीलें खारिज, कहा, 2015 की सिफारिश अब तक लागू क्यों नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन से जुड़े केंद्र के खिलाफ 271 अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, 2015 में रक्षा मंत्रालय की समिति ने ऐसे मामलों में सरकार की अपीलें तत्काल वापस लेने की सिफारिश की थी, लेकिन उसका पूरी तरह पालन नहीं हुआ। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने 15 सितंबर को दिए फैसले में रक्षा मंत्रालय की 2015 की ‘रक्षा मंत्री रिपोर्ट’ का उल्लेख किया। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में कई दिव्यांग सैनिकों को तकनीकी आधारों पर पेंशन लाभ से वंचित किया जा रहा है। समिति ने ऐसे मामलों में लंबित अपीलें वापस लेने की सिफारिश की थी। पीठ ने कहा कि मंत्रालय की सिफारिश स्वीकार किए जाने के बावजूद इस तरह के मामले दायर होते रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि करीब 271 सिविल अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं में अधिकांश समय-सीमा से बाहर दायर की गई थीं। मामलों में रिहाई मेडिकल बोर्ड ने शुरुआती आकलन में पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता को सैन्य सेवा से संबंधित या उससे बढ़ी हुई नहीं माना था। विभागीय अपीलें खारिज होने के बाद पूर्व सैनिकों ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) या हाईकोर्ट का रुख किया, जहां उन्हें दिव्यांगता पेंशन देने के आदेश दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन से जुड़े केंद्र के खिलाफ 271 अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, 2015 में रक्षा मंत्रालय की समिति ने ऐसे मामलों में सरकार की अपीलें तत्काल वापस लेने की सिफारिश की थी, लेकिन उसका पूरी तरह पालन नहीं हुआ। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने 15 सितंबर को दिए फैसले में रक्षा मंत्रालय की 2015 की ‘रक्षा मंत्री रिपोर्ट’ का उल्लेख किया। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में कई दिव्यांग सैनिकों को तकनीकी आधारों पर पेंशन लाभ से वंचित किया जा रहा है। समिति ने ऐसे मामलों में लंबित अपीलें वापस लेने की सिफारिश की थी। पीठ ने कहा कि मंत्रालय की सिफारिश स्वीकार किए जाने के बावजूद इस तरह के मामले दायर होते रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि करीब 271 सिविल अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं में अधिकांश समय-सीमा से बाहर दायर की गई थीं। मामलों में रिहाई मेडिकल बोर्ड ने शुरुआती आकलन में पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता को सैन्य सेवा से संबंधित या उससे बढ़ी हुई नहीं माना था। विभागीय अपीलें खारिज होने के बाद पूर्व सैनिकों ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) या हाईकोर्ट का रुख किया, जहां उन्हें दिव्यांगता पेंशन देने के आदेश दिए गए।