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SC: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-न्याय तक पहुंच लोकतांत्रिक शासन की बुनियाद; फ्लिपकार्ट के खिलाफ NCLAT का आदेश रद्द
Tue, 03 Feb 2026 03:28 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Tue, 03 Feb 2026 03:28 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट में आज कई अहम मुद्दों पर सुनवाई होगी। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के खिलाफ उनकी पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो की तरफ से दायर याचिका शामिल है। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट दवा कंपनियों की कथित अनैतिक प्रथाओं पर अंकुश लगाने के लिए दवा विपणन प्रथाओं की एक समान संहिता की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करेगा।
वहीं सुप्रीम कोर्ट केरल उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें नैदानिक संस्थानों को दी जाने वाली सेवाओं और पैकेज दरों की सूची प्रमुखता से प्रदर्शित करने सहित दिशानिर्देश जारी किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट आज एसिड हमले के पीड़ितों से संबंधित मुद्दों, जिनमें उन्हें मुआवजे के भुगतान में देरी भी शामिल है, को उठाने वाली याचिका पर भी सुनवाई करेगा। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट जमानत देने की नीतिगत रणनीति से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले पर सुनवाई करेगा।
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वहीं सुप्रीम कोर्ट केरल उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें नैदानिक संस्थानों को दी जाने वाली सेवाओं और पैकेज दरों की सूची प्रमुखता से प्रदर्शित करने सहित दिशानिर्देश जारी किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट आज एसिड हमले के पीड़ितों से संबंधित मुद्दों, जिनमें उन्हें मुआवजे के भुगतान में देरी भी शामिल है, को उठाने वाली याचिका पर भी सुनवाई करेगा। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट जमानत देने की नीतिगत रणनीति से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले पर सुनवाई करेगा।
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I-PAC रेड विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली
सुप्रीम कोर्ट ने I-PAC से जुड़े ईडी रेड विवाद में सुनवाई 10 फरवरी तक के लिए टाल दी है। यह मामला प्रवर्तन निदेशालय की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने पश्चिम बंगाल सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर जांच में हस्तक्षेप का आरोप लगाया है। ईडी का कहना है कि जनवरी में जब वह कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में I-PAC कार्यालय पर छापेमारी कर रही थी, तब मुख्यमंत्री वहां पहुंचीं और अधिकारियों के काम में बाधा डाली। एजेंसी का आरोप है कि इस दौरान कुछ अहम दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस भी हटाए गए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि राज्य सरकार ने इस मामले में हलफनामा दाखिल किया है और समय मांगा है, जिसके बाद अदालत ने अगली तारीख तय की। सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले को गंभीर बता चुका है और ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगा चुका है। तृणमूल कांग्रेस ने ईडी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह कार्रवाई चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव बनाने के लिए की गई है। राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, जिससे यह मामला और ज्यादा संवेदनशील हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने I-PAC से जुड़े ईडी रेड विवाद में सुनवाई 10 फरवरी तक के लिए टाल दी है। यह मामला प्रवर्तन निदेशालय की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने पश्चिम बंगाल सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर जांच में हस्तक्षेप का आरोप लगाया है। ईडी का कहना है कि जनवरी में जब वह कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में I-PAC कार्यालय पर छापेमारी कर रही थी, तब मुख्यमंत्री वहां पहुंचीं और अधिकारियों के काम में बाधा डाली। एजेंसी का आरोप है कि इस दौरान कुछ अहम दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस भी हटाए गए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि राज्य सरकार ने इस मामले में हलफनामा दाखिल किया है और समय मांगा है, जिसके बाद अदालत ने अगली तारीख तय की। सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले को गंभीर बता चुका है और ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगा चुका है। तृणमूल कांग्रेस ने ईडी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह कार्रवाई चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव बनाने के लिए की गई है। राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, जिससे यह मामला और ज्यादा संवेदनशील हो गया है।
कांग्रेस विधायक कवासी लखमा को सुप्रीम कोर्ट से राहत
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस विधायक और पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा को शराब घोटाले के कथित मामलों में अंतरिम जमानत दे दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस विधायक और पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा को शराब घोटाले के कथित मामलों में अंतरिम जमानत दे दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा-न्याय तक पहुंच लोकतांत्रिक शासन की बुनियाद
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय तक पहुंच लोकतांत्रिक शासन की बुनियाद है और एक निष्पक्ष एवं न्यायसंगत समाज का आधार है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि मध्यस्थता कार्यवाही के कुशल संचालन से मध्यस्थता के माध्यम से विवाद समाधान की प्रभावशीलता सुनिश्चित होती है।
पीठ ने माना कि मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 29ए(5) के तहत मध्यस्थ के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए आवेदन धारा 29ए(1) और (3) के तहत निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद और उस दौरान निर्णय दिए जाने के बाद भी स्वीकार्य है। अधिनियम की धारा 29ए मध्यस्थता निर्णय की समय सीमा से संबंधित है। पीठ ने एक कानूनी प्रश्न उठाया कि क्या कोई अदालत अधिनियम की धारा 29ए(5) के अंतर्गत मध्यस्थ को निर्णय देने के लिए अधिकृत करने के आवेदन पर विचार कर सकती है। वह भी तब जब निर्णय दिए जाने के बाद 18 माह की वैधानिक समय सीमा समाप्त हो गई हो। मद्रास हाईकोर्ट के जनवरी 2025 के आदेश के विरुद्ध अपील पर अपने निर्णय में पीठ ने कहा, न्याय तक पहुंच लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला है, जो एक निष्पक्ष और न्यायसंगत समाज का मुख्य आधार है। एजेंसी
पीठ ने माना कि मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 29ए(5) के तहत मध्यस्थ के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए आवेदन धारा 29ए(1) और (3) के तहत निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद और उस दौरान निर्णय दिए जाने के बाद भी स्वीकार्य है। अधिनियम की धारा 29ए मध्यस्थता निर्णय की समय सीमा से संबंधित है। पीठ ने एक कानूनी प्रश्न उठाया कि क्या कोई अदालत अधिनियम की धारा 29ए(5) के अंतर्गत मध्यस्थ को निर्णय देने के लिए अधिकृत करने के आवेदन पर विचार कर सकती है। वह भी तब जब निर्णय दिए जाने के बाद 18 माह की वैधानिक समय सीमा समाप्त हो गई हो। मद्रास हाईकोर्ट के जनवरी 2025 के आदेश के विरुद्ध अपील पर अपने निर्णय में पीठ ने कहा, न्याय तक पहुंच लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला है, जो एक निष्पक्ष और न्यायसंगत समाज का मुख्य आधार है। एजेंसी
धोखाधड़ी मामले में शादी डॉट कॉम के संस्थापक अनुपम मित्तल की गिरफ्तारी पर दो सप्ताह की रोक
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को शादी डॉट कॉम के संस्थापक अनुपम मित्तल और दो अन्य को धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तारी से दो हफ्ते के लिए बड़ी राहत दे दी। इस वैवाहिक वेबसाइट की एक महिला यूजर ने आर्थिक धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने मित्तल के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही को निरस्त करने से इन्कार करते हुए मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए हाईकोर्ट के पास वापस भेजा था।
फ्लिपकार्ट के खिलाफ सीसीआई जांच वाला एनसीएलएटी का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने फ्लिपकार्ट के खिलाफ सीसीआई जांच वाला राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) का 2020 का आदेश रद्द कर दिया। एनसीएलएटी ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के महानिदेशक को ई-कॉमर्स दिग्गज की ओर से प्रतिस्पर्धा कानून उल्लंघनों की जांच करने का निर्देश दिया था। पीठ ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए एनसीएलएटी को वापस भेज दिया। एनसीएलएटी को फ्लिपकार्ट के इस तर्क को ध्यान में रखते हुए मामले पर पुनर्विचार करना चाहिए कि न्यायाधिकरण ने आयकर कार्यवाही में एक मूल्यांकन अधिकारी की टिप्पणियों पर भरोसा किया था, जिन्हें बाद में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) ने रद्द कर दिया था।
आपराधिक मामले में बरी होने पर धनशोधन का केस चलेगा या नहीं, शीर्ष कोर्ट जांचेगी
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में सैकड़ों मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की तरफ से की गई अभियोजन कार्रवाई को प्रभावित करने वाले व्यापक कानूनी प्रश्न की पड़ताल करने पर मंगलवार को सहमति जताई। कोर्ट इस पर विचार करेगा कि किसी आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति के बरी होने का मतलब क्या यह होगा कि आरोपी पर धनशोधन के अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शिकायत की कि जब मूल अपराध में बड़े और प्रभावशाली लोग शामिल होते हैं, तो अलग-अलग राज्यों की पुलिस ढिलाई बरतती है। ऐसे मामलों में आरोपियों के बरी हो जाने से धनशोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्रवाई नहीं हो पा रही। इस पर शीर्ष कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है मानो ईडी को पूरी तरह बाहर ही कर दिया गया हो। पीएमएलए के तहत मूल अपराध (या अनुसूचित अपराध) वह अपराध है जिससे अपराध की आय उत्पन्न होती है, जो ईडी द्वारा मामले की जांच शुरू करने के लिए एक पूर्व शर्त है।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में 2022 के फैसले पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा, कई उलझनों को सुलझाना बाकी है। गौरतलब है कि इस फैसले में ईडी की गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती की शक्ति बरकरार रखी गई थी। पीठ ने कहा कि इस निष्कर्ष से सहमत होना मुश्किल है कि अगर मूल अपराध रद्द कर दिया जाए, तो धनशोधन का मामला अपने आप खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने कहा, ईडी का मामला मूल अपराध पर क्यों निर्भर करता है? हर मामले के अपने तथ्य होते हैं और वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हो सकते। ईडी मूल अपराध का बचाव करने के लिए अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं है। यह हमारी समझ से परे है। ये गंभीर आर्थिक अपराध हैं।
ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कहा कि 2022 के फैसले की कई लोगों ने अलग-अलग तरह से व्याख्या की है और उन्होंने धनशोधन के मामलों में अभियोजन के दौरान उन्हें हो रही कठिनाइयों की ओर इशारा किया। जस्टिस सुंदरेश ने पवना दिब्बुर बनाम प्रवर्तन निदेशालय के 2023 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निर्णय में यह निष्कर्ष कि धनशोधन के अपराध के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी अनुसूचित अपराध में भी आरोपी हो, संदिग्ध है व अदालत इसकी भी पड़ताल करेगी।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शिकायत की कि जब मूल अपराध में बड़े और प्रभावशाली लोग शामिल होते हैं, तो अलग-अलग राज्यों की पुलिस ढिलाई बरतती है। ऐसे मामलों में आरोपियों के बरी हो जाने से धनशोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्रवाई नहीं हो पा रही। इस पर शीर्ष कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है मानो ईडी को पूरी तरह बाहर ही कर दिया गया हो। पीएमएलए के तहत मूल अपराध (या अनुसूचित अपराध) वह अपराध है जिससे अपराध की आय उत्पन्न होती है, जो ईडी द्वारा मामले की जांच शुरू करने के लिए एक पूर्व शर्त है।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में 2022 के फैसले पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा, कई उलझनों को सुलझाना बाकी है। गौरतलब है कि इस फैसले में ईडी की गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती की शक्ति बरकरार रखी गई थी। पीठ ने कहा कि इस निष्कर्ष से सहमत होना मुश्किल है कि अगर मूल अपराध रद्द कर दिया जाए, तो धनशोधन का मामला अपने आप खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने कहा, ईडी का मामला मूल अपराध पर क्यों निर्भर करता है? हर मामले के अपने तथ्य होते हैं और वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हो सकते। ईडी मूल अपराध का बचाव करने के लिए अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं है। यह हमारी समझ से परे है। ये गंभीर आर्थिक अपराध हैं।
ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कहा कि 2022 के फैसले की कई लोगों ने अलग-अलग तरह से व्याख्या की है और उन्होंने धनशोधन के मामलों में अभियोजन के दौरान उन्हें हो रही कठिनाइयों की ओर इशारा किया। जस्टिस सुंदरेश ने पवना दिब्बुर बनाम प्रवर्तन निदेशालय के 2023 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निर्णय में यह निष्कर्ष कि धनशोधन के अपराध के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी अनुसूचित अपराध में भी आरोपी हो, संदिग्ध है व अदालत इसकी भी पड़ताल करेगी।
रिहाई का मतलब यह नहीं कि अपराध नहीं हुआ
कई उदाहरण देते हुए पीठ ने कहा कि किसी मूल अपराध में आरोपी को बरी कर दिए जाने या रिहा कर दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि अपराध हुआ ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यदि 2022 के फैसले के अनुसार ईडी के हाथ बंधे रहेंगे, तो वह धनशोधन के मामलों में कार्रवाई कैसे करेगी? इससे कानून बनाने का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। हम रोज ऐसे मामलों से निपट रहे हैं।
अप्रैल में होगी व्यापक सवाल पर सुनवाई....पीठ कई ऐसी याचिकाओं की सुनवाई कर रही है जिनमें आरोपियों ने धनशोधन के मामलों में अपनी रिहाई की इस आधार पर की मांग की है कि उन्हें मूल या अनुसूचित अपराध में बरी कर दिया गया है और इसलिए, अपराध से अर्जित कोई आय नहीं थी। पीठ ने कहा, अगर ऐसा होता है तो किसी मूल अपराध में बरी होने के बाद ईडी की कार्यवाही निरर्थक हो जाएगी। साथ ही कहा, वह कानूनी प्रश्न की पड़ताल करेगी और 2022 और 2023 के फैसलों में दिए गए निष्कर्ष की वैधता पर विचार करेगी। शीर्ष अदालत व्यापक प्रश्न की जांच के लिए अप्रैल में दोनों पक्षों को सुनेगा। पीठ ने राजू से सवाल किया कि ईडी ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में 2022 के फैसले की समीक्षा के लिए याचिका अब तक क्यों नहीं दायर की है।
अप्रैल में होगी व्यापक सवाल पर सुनवाई....पीठ कई ऐसी याचिकाओं की सुनवाई कर रही है जिनमें आरोपियों ने धनशोधन के मामलों में अपनी रिहाई की इस आधार पर की मांग की है कि उन्हें मूल या अनुसूचित अपराध में बरी कर दिया गया है और इसलिए, अपराध से अर्जित कोई आय नहीं थी। पीठ ने कहा, अगर ऐसा होता है तो किसी मूल अपराध में बरी होने के बाद ईडी की कार्यवाही निरर्थक हो जाएगी। साथ ही कहा, वह कानूनी प्रश्न की पड़ताल करेगी और 2022 और 2023 के फैसलों में दिए गए निष्कर्ष की वैधता पर विचार करेगी। शीर्ष अदालत व्यापक प्रश्न की जांच के लिए अप्रैल में दोनों पक्षों को सुनेगा। पीठ ने राजू से सवाल किया कि ईडी ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में 2022 के फैसले की समीक्षा के लिए याचिका अब तक क्यों नहीं दायर की है।
विचाराधीन कैदी को सात साल से जेल में रखने पर फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने एक विचाराधीन कैदी को सात वर्षों तक जेल में रखे जाने पर जम्मू-कश्मीर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार का घोर उल्लंघन बताया। अदालत ने अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोपी को जमानत दे दी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि सात वर्षों में अभियोजन ने केवल सात गवाहों की जांच की है। यह न्याय व्यवस्था की दयनीय स्थिति को दर्शाता है।
पीठ ने कहा कि त्वरित सुनवाई की अवधारणा का मजाक बना दिया गया है और आरोपी के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ है। यह मामला 2018 का है, जब आरोपी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। फरवरी 2019 में आरोप तय हुए लेकिन इसके बाद सुनवाई में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, 82 से अधिक तारीखों में एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हो सका। अभियोजन ने देरी के लिए कोविड-19 महामारी और पीड़ित पक्ष की ओर से दायर याचिकाओं को कारण बताया। हालांकि कोर्ट ने इसे अपर्याप्त कारण माना। मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव को अगली सुनवाई में ऑनलाइन उपस्थित होने और पांच वर्ष से अधिक समय से हिरासत में बंद आरोपियों के सभी लंबित मामलों की सूची पेश करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा कि त्वरित सुनवाई की अवधारणा का मजाक बना दिया गया है और आरोपी के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ है। यह मामला 2018 का है, जब आरोपी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। फरवरी 2019 में आरोप तय हुए लेकिन इसके बाद सुनवाई में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, 82 से अधिक तारीखों में एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हो सका। अभियोजन ने देरी के लिए कोविड-19 महामारी और पीड़ित पक्ष की ओर से दायर याचिकाओं को कारण बताया। हालांकि कोर्ट ने इसे अपर्याप्त कारण माना। मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव को अगली सुनवाई में ऑनलाइन उपस्थित होने और पांच वर्ष से अधिक समय से हिरासत में बंद आरोपियों के सभी लंबित मामलों की सूची पेश करने का निर्देश दिया।