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Supreme Court: मुस्लिम लड़की को अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के अधिकार से जुड़ी याचिका पर सुनवाई, नोटिस जारी

Fri, 13 Jan 2023 02:59 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रांजुल श्रीवास्तव Updated Fri, 13 Jan 2023 02:59 PM IST
सार

उच्च न्यायालय के फैसले में कहा गया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार मुस्लिम लड़की 15 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद कानूनी रूप से विवाह में प्रवेश कर सकती है। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम लड़कियों को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। याचिका में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया है कि एक मुस्लिम लड़की 15 साल के बाद अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी कर सकती है।

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शीर्ष अदालत ने इस मामले में हरियाणा सरकार व अन्य को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि उच्च न्यायालय के फैसले को अन्य मामलों में मिसाल के तौर पर नहीं माना जाना चाहिए। दरअसल, उच्च न्यायालय के फैसले में कहा गया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार मुस्लिम लड़की 15 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद कानूनी रूप से विवाह में प्रवेश कर सकती है। 
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मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा, हम इन रिट याचिकाओं पर विचार के लिए सहमत हैं। आगे के आदेश लंबित हैं और हाईकोर्ट के फैसले को मिसाल के तौर पर नहीं माना जाएगा।
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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में बताया कि कि 14, 15, 16 साल की मुस्लिम लड़कियों की शादी हो रही है। ऐसे में क्या एक दंडनीय अपराध का मुस्लिम पर्सनल लॉ से बचाव किया जा सकता है? दरअसल, इस्लामी कानून के अनुसार, यौवनावस्था की आयु 15 वर्ष है और इसके बाद लड़कियों की शादी की जा सकती है। 

नागरिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले कानून के समान कर कानूनों का परीक्षण नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि नागरिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले कानूनों की कसौटी पर ही कर (टैक्स) कानूनों का परीक्षण नहीं किया जा सकता तथा इन कानूनों की पड़ताल करते समय कानून निर्माताओं को व्यापक छूट देनी चाहिए।

शीर्ष कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जुलाई 2007 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हिमाचल प्रदेश मोटर वाहन कराधान (संशोधन) अधिनियम, 1999 की धारा 3ए(3) को अधिकारातीत माना गया था।

न्यायमूर्ति एस के कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अदालतों को न्यायिक संयम दिखाना चाहिए और कर कानून में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक यह दिखाया और साबित नहीं किया जाता है कि इस तरह के कर कानून स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण या असंवैधानिक हैं। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय की राय थी कि धारा 3ए(3) के तहत लगाया गया कर दंड की प्रकृति का है, जिसके लिए राज्य विधानमंडल के पास कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं है।  

राजकोषीय कानूनों में हस्तक्षेप की गुंजाइश का उल्लेख करते हुए शीर्ष कोर्ट ने कहा, "अब तक यह अच्छी तरह से स्थापित हो गया है कि किसी भी कर कानून में आसानी से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।" पीठ में न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ भी शामिल थे।

नफरती भाषणों से खतरा, हम भारत में स्वतंत्र और संतुलित प्रेस चाहते हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने टीवी समाचार सामग्री पर नियामकीय नियंत्रण की कमी पर अफसोस जताते हुए कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषण (हेट स्पीच) एक 'बड़ा खतरा' हैं और भारत में 'स्वतंत्र एवं संतुलित प्रेस' की जरूरत है।

शीर्ष कोर्ट ने कहा कि आजकल सब कुछ टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) से संचालित होता है और चैनल एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं तथा समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं। इसने कहा कि यदि कोई टीवी समाचार एंकर, नफरत फैलाने वाले भाषण के प्रचार की समस्या का हिस्सा बनता है, तो उसे प्रसारण से क्यों नहीं हटाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि प्रिंट मीडिया के विपरीत, समाचार चैनलों के लिए कोई भारतीय प्रेस परिषद नहीं है। इसने कहा कि "हम स्वतंत्र भाषण चाहते हैं, लेकिन किस कीमत पर।’’ 

देश भर में नफरती भाषणों की घटनाओं पर अंकुश लगाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा, "घृणास्पद भाषण एक बड़ा खतरा बन गया है। इसे रोकना होगा।"

सुप्रीम कोर्ट ने धनशोधन मामले में आरोपी को जमानत देने से किया इनकार 

सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक घोटाले से जुड़े धनशोधन मामले में आरोपी को जमानत देने से शुक्रवार को इनकार कर दिया। कोर्ट ने ट्रैवल फर्म ‘कॉक्स एंड किंग्स इंडिया’ और उसकी समूह कंपनियों के आंतरिक लेखा परीक्षक नरेश टी जैन की जमानत याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। जैन 3,642 करोड़ रुपये के यस बैंक घोटाले से जुड़े धनशोधन मामले में जेल में हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अनुसार, यात्रा समूह ने यस बैंक से 3,642 करोड़ रुपये का ऋण लिया था और इसके लिए हेरफेर किए गए वित्त विवरणों और ‘बैलेंस शीट’ का उपयोग किया गया था। एजेंसी ने दावा किया कि यस बैंक के संस्थापक एवं तत्कालीन एमडी और सीईओ राणा कपूर द्वारा ऋण की मंजूरी मानदंडों की अवहेलना करके दी गई थी।

सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा की पीठ ने जैन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे की दलीलों पर संज्ञान लिया और कहा कि इस स्तर पर वह जमानत देने की इच्छुक नहीं है। जैन पांच अक्टूबर, 2020 से हिरासत में है।

पीठ ने कहा, ‘‘हालांकि, हम निर्देश देते हैं कि ईडी यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाये कि वह सुनवाई जल्द पूरी करने में सहयोग करे। यदि 31 मई, 2023 तक मुकदमे में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो हम याचिकाकर्ता (जैन) को (बम्बई) उच्च न्यायालय के समक्ष नए सिरे से जमानत के लिए आवेदन करने की अनुमति देते हैं।”

सीजेआई ने वेलनेस सेंटर का उद्घाटन किया
सुप्रीम कोर्ट परिसर के अतिरिक्त भवन परिसर में शुक्रवार को शीर्ष अदालत के कर्मचारियों के लिए एक हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर का उद्घाटन किया गया।

शीर्ष अदालत ने एक बयान में कहा, सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने एक वरिष्ठ कर्मचारी सदस्य को रिबन काटने और कर्मचारियों के लिए वेलनेस सेंटर खोलने के लिए आमंत्रित किया, जो इस महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं। सीजेआई ने कर्मचारियों के कल्याण की कामना की और उन्हें अपने स्वास्थ्य और कल्याण पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया। वेलनेस सेंटर में नियमित जिम उपकरण के साथ योग और कार्डियो की सुविधाएं हैं जिनका उपयोग कर्मचारियों द्वारा किया जा सकता है।

महिला किसी की जागीर नहीं, शादी कर लेने से उसकी पहचान खत्म नहीं हो जाती: सुप्रीम कोर्ट

महिला जागीर नहीं है और उसकी खुद की एक पहचान है, यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अप्रैल, 2008 के बाद एक गैर-सिक्किम से शादी करने वाली महिलाओं को आयकर अधिनियम की धारा- 10 (26एएए) के तहत छूट के प्रावधान से पूरी तरह से बाहर को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताया है।

जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस बी वी नागरथना की पीठ ने कहा कि एक महिला जागीर नहीं है और उसकी खुद की एक पहचान है और विवाहित होने पर उसकी पहचान को खत्म नहीं किया जाना चाहिए। आयकर अधिनियम की धारा- 10 कुल आय में शामिल न होने वाली आय से संबंधित है। धारा- 10 (26एएए) में किसी भी व्यक्ति की पिछले वर्ष की कुल आय की गणना करने में चुनिंदा स्थितियों के अंतर्गत आने वाली किसी भी आय को शामिल नहीं करने से संबंधित है।

इस मामले में रिट याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि आयकर अधिनियम, 1961 की धारा- 10 (26एएए) का यह प्रावधान कि एक अप्रैल, 2008 के बाद एक गैर-सिक्किम से शादी करने वाली सिक्किम की महिला छूट के दायरे से बाहर होंगी, भेदभावपूर्ण औरअसंवैधानिक है। उनका कहना था कि विवाहित होने से महिलाओं की पहचान नहीं छिननी चाहिए। पीठ ने इस विवाद से निपटते हुए कहा कि सिक्किम की महिला द्वारा अप्रैल, 2008 के बाद गैर-सिक्किम से शादी करना, अयोग्यता नहीं है। ऐसी महिलाओं को छूट के दायरे से बाहर रखने का कोई औचित्य नहीं है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि यह भेदभाव लिंग पर आधारित है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद- 14, 15 और 21 का पूर्ण उल्लंघन है।

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