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Supreme Court: तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल, चार दिन बाद होगी सुनवाई

Mon, 18 Jul 2022 05:29 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Mon, 18 Jul 2022 05:29 PM IST
सार

याचिकाकर्ता का कहना है कि तलाक-ए-हसन और एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक के अन्य रूपों की प्रथा न तो मानव अधिकारों और लैंगिक समानता के आधुनिक सिद्धांतों के साथ सामंजस्यपूर्ण है, न ही इस्लामी विश्वास का एक अभिन्न अंग है।

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Supreme Court to hear the petition challenging practice of Talaq-e-Hasan after four days
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई

विस्तार

तलाक-ए-हसन की प्रथा को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई चार दिनों बाद के लिए सूचीबद्ध किया है। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद ने बताया कि महिला को तलाक का तीसरा नोटिस मिला है और उसका एक नाबालिग बच्चा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले को चार दिनों के बाद सूचीबद्ध करने के लिए कहा। 
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दरअसल एक मुस्लिम महिला की ओर से तलाक-ए-हसन और एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक के अन्य सभी रूपों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में सभी के लिए तलाक की समान प्रक्रिया के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के लिए केंद्र को निर्देश जारी करने की मांग की गई है। 
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इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं तलाक-ए-हसन
याचिकाकर्ता का कहना है कि तलाक-ए-हसन और एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक के अन्य रूपों की प्रथा न तो मानव अधिकारों और लैंगिक समानता के आधुनिक सिद्धांतों के साथ सामंजस्यपूर्ण है, न ही इस्लामी विश्वास का एक अभिन्न अंग है। कई इस्लामी राष्ट्रों ने इस तरह की प्रथाओं को प्रतिबंधित किया है, जबकि यह सामान्य रूप से भारतीय समाज और विशेष रूप से याचिकाकर्ता की तरह मुस्लिम महिलाओं को परेशान करना जारी रखता है। 
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याचिका में कहा गया है कि तलाक-ए-हसन प्रथा कई महिलाओं और उनके बच्चों, खासकर वे लोग जो समाज के कमजोर आर्थिक वर्ग से संबंधित हैं, के जीवन पर भी कहर बरपाती है। याचिका में मांग की गई है कि तलाक-ए-हसन और एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक के अन्य सभी रूप शून्य और संवैधानिक हैं। याचिका मुस्लिम महिला की ओर से दायर की गई है जिसने खुद के पत्रकार होने के साथ-साथ एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक-ए-हसन की पीड़ित होने का दावा किया है। 


गर्भावस्था के दौरान किया मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित
याची महिला ने यह भी दावा किया कि उसके पति और उसके परिवार के सदस्यों ने न केवल शादी के लिए बल्कि गर्भावस्था के दौरान भी उसे शारीरिक-मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जिससे वह गंभीर रूप से बीमार हो गई। महिला के मुताबिक उसके पिता ने दहेजदेने से इनकार किया तो उसके पति ने उसे एक वकील के माध्यम से एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक-ए-हसन दिया, जो पूरी तरह से अनुच्छेद 14, 15, 21, 25 और संयुक्त राष्ट्र सम्मेलनों के खिलाफ है। 
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