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सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स: एसटीएफ थानों-विशेष अदालतों पर कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर रोक, एमसीडी-एएसआई को भी फटकार
Tue, 25 Aug 2026 07:31 PM IST
शिवम गर्ग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवम गर्ग
Updated Tue, 25 Aug 2026 07:31 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स
- फोटो : अमर उजाला ग्रापिक
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के लिए बनाए गए समर्पित पुलिस थानों और उनके मामलों की सुनवाई के लिए तय विशेष अदालतों से जुड़े कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। वहीं, दिल्ली के विरासत स्मारकों की बदहाली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एमसीडी और एएसआई को कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की अपील पर नोटिस जारी किया। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने 19 जून के अपने फैसले में पश्चिम बंगाल सरकार की दो अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था। इन अधिसूचनाओं के जरिए स्पेशल टास्क फोर्स के लिए विशेष पुलिस थाने बनाए गए थे और STF की जांच से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए बिधाननगर और सिलीगुड़ी की अदालतों को निर्धारित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है।
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हाईकोर्ट ने माना था कि पश्चिम बंगाल में 2019 में गठित STF वैध रूप से काम कर सकती है और उसे सौंपे गए अपराधों की जांच जारी रख सकती है। हालांकि, अदालत के मुताबिक राज्य सरकार को मौजूदा कानूनों से अलग जाकर STF के लिए विशेष पुलिस थाने और अलग न्यायिक ढांचा बनाने का अधिकार नहीं है। मामला जलपाईगुड़ी बार एसोसिएशन के सदस्यों की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने 30 जनवरी 2025 और 10 फरवरी 2025 को जारी दोनों सरकारी अधिसूचनाओं को चुनौती दी थी।
पहली अधिसूचना में सिलीगुड़ी STF मुख्यालय और साल्ट लेक STF मुख्यालय पुलिस स्टेशन बनाने का प्रावधान था। दूसरी अधिसूचना में इन थानों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए आपराधिक अदालतों का क्षेत्राधिकार तय किया गया था।
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने 19 जून के अपने फैसले में पश्चिम बंगाल सरकार की दो अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था। इन अधिसूचनाओं के जरिए स्पेशल टास्क फोर्स के लिए विशेष पुलिस थाने बनाए गए थे और STF की जांच से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए बिधाननगर और सिलीगुड़ी की अदालतों को निर्धारित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है।
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CJI ने साइबर अपराधों का भी किया जिक्र
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने साइबर अपराधों समेत बढ़ते मामलों के बीच अतिरिक्त अदालतों की जरूरत पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब साइबर अपराध बढ़ रहे हैं तो अधिक अदालतों की आवश्यकता है, ऐसे में हाईकोर्ट को इससे परेशानी क्यों होनी चाहिए? हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार कार्यपालिका के आदेश के जरिए आपराधिक न्याय व्यवस्था के ढांचे में बदलाव नहीं कर सकती।
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हाईकोर्ट ने माना था कि पश्चिम बंगाल में 2019 में गठित STF वैध रूप से काम कर सकती है और उसे सौंपे गए अपराधों की जांच जारी रख सकती है। हालांकि, अदालत के मुताबिक राज्य सरकार को मौजूदा कानूनों से अलग जाकर STF के लिए विशेष पुलिस थाने और अलग न्यायिक ढांचा बनाने का अधिकार नहीं है। मामला जलपाईगुड़ी बार एसोसिएशन के सदस्यों की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने 30 जनवरी 2025 और 10 फरवरी 2025 को जारी दोनों सरकारी अधिसूचनाओं को चुनौती दी थी।
पहली अधिसूचना में सिलीगुड़ी STF मुख्यालय और साल्ट लेक STF मुख्यालय पुलिस स्टेशन बनाने का प्रावधान था। दूसरी अधिसूचना में इन थानों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए आपराधिक अदालतों का क्षेत्राधिकार तय किया गया था।
CBSE 12वीं की कॉपियों के दोबारा मूल्यांकन पोर्टल को फिर खोलने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सीबीएसई की 12वीं कक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन से जुड़े पोर्टल को दोबारा खोलने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। यह मामला उन छात्रों से जुड़ा था, जिन्हें ऑन-स्क्रीन मार्किंग व्यवस्था के तहत अपनी कॉपियों के मूल्यांकन में गड़बड़ी की शिकायत थी। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सीबीएसई ने सभी छात्रों के लिए निर्धारित अवधि में पुनर्मूल्यांकन का पोर्टल उपलब्ध कराया था। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि तय समय में किसी ने सुविधा का इस्तेमाल नहीं किया तो बाद में पोर्टल दोबारा खोलने का निर्देश देने से नए दावों का रास्ता खुल सकता है। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से केवल एक सप्ताह के लिए पोर्टल खोलने का अनुरोध किया था। उन्होंने दलील दी कि वेबसाइट क्रैश होने के कारण कई छात्र ऑन-स्क्रीन सत्यापन के लिए आवेदन नहीं कर सके।
लखनऊ जिला न्यायालय परिसर में वकीलों के अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के पास सार्वजनिक भूमि पर कथित तौर पर अवैध रूप से बनाए गए वकीलों के चैंबरों के विध्वंस से संबंधित एक याचिका को खारिज कर दिया है। मंगलवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि विध्वंस होना ही है। पीठ ने याचिका पर सुनवाई के प्रति अनिच्छा व्यक्त की, जिसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने इसे वापस ले लिया। न्यायमूर्ति नाथ, जो पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके हैं, ने कहा कि उन्होंने स्वयं वहां की स्थिति देखी है और उन्हें निर्माणों की प्रकृति का पता है।
याचिकाकर्ता के वकील ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का सुझाव दिया था, लेकिन पीठ ने इस पर असहमति जताते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के 4 अगस्त के उस आदेश को चुनौती दे रही थी। हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर निगम (एलएमसी) को निर्देश दिया था कि वह लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के पास सार्वजनिक रास्तों या सार्वजनिक उपयोगिता भूमि पर कथित तौर पर बनाए गए चैंबरों और अन्य ढांचों के संबंध में 72 कथित अतिक्रमणकारियों, जिनमें से अधिकांश वकील थे, को नोटिस जारी करे। उच्च न्यायालय ने कथित अतिक्रमणकारियों को या तो ढांचों को खाली करने या भूमि और निर्माणों पर अपना कानूनी अधिकार स्थापित करने का निर्देश दिया था। ऐसा न करने की स्थिति में, एलएमसी को विध्वंस की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के पास सार्वजनिक भूमि पर कथित तौर पर अवैध रूप से बनाए गए वकीलों के चैंबरों के विध्वंस से संबंधित एक याचिका को खारिज कर दिया है। मंगलवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि विध्वंस होना ही है। पीठ ने याचिका पर सुनवाई के प्रति अनिच्छा व्यक्त की, जिसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने इसे वापस ले लिया। न्यायमूर्ति नाथ, जो पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके हैं, ने कहा कि उन्होंने स्वयं वहां की स्थिति देखी है और उन्हें निर्माणों की प्रकृति का पता है।
याचिकाकर्ता के वकील ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का सुझाव दिया था, लेकिन पीठ ने इस पर असहमति जताते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के 4 अगस्त के उस आदेश को चुनौती दे रही थी। हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर निगम (एलएमसी) को निर्देश दिया था कि वह लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के पास सार्वजनिक रास्तों या सार्वजनिक उपयोगिता भूमि पर कथित तौर पर बनाए गए चैंबरों और अन्य ढांचों के संबंध में 72 कथित अतिक्रमणकारियों, जिनमें से अधिकांश वकील थे, को नोटिस जारी करे। उच्च न्यायालय ने कथित अतिक्रमणकारियों को या तो ढांचों को खाली करने या भूमि और निर्माणों पर अपना कानूनी अधिकार स्थापित करने का निर्देश दिया था। ऐसा न करने की स्थिति में, एलएमसी को विध्वंस की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।