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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में मतभेद: जस्टिस दत्ता-शर्मा की राय अलग; कौन तय करेगा क्या होगा?
Wed, 23 Sep 2026 03:25 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 23 Sep 2026 03:25 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अलग-अलग राय दी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने केंद्र की बड़ी पीठ को भेजने की मांग खारिज की, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने बड़ी पीठ को मामला भेजने की जरूरत बताई। मतभेद के बाद अब सीजेआई तय करेंगे कि संविधान पीठ बनाई जाए या नहीं। विवाद का केंद्र सीजेआई को चयन समिति से हटाकर कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान है।
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सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की राय अलग-अलग
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को विभाजित फैसला सुनाया। मामला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के सामने था। केंद्र सरकार ने मांग की थी कि इस मामले को संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत बड़ी पीठ के पास भेजा जाए। जस्टिस दत्ता ने केंद्र की यह मांग खारिज कर दी, जबकि जस्टिस शर्मा ने माना कि मामले में कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल शामिल है, जिसे बड़ी पीठ को तय करना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को मामला भेजने की केंद्र की मांग को खारिज किया और 2023 के कानून को चुनौती देने पर अपनी प्रथम दृष्टया राय भी रखी।
जस्टिस शर्मा ने जस्टिस दत्ता की टिप्पणियों से असहमति जताई और कहा कि मामले में ऐसा महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है, जिस पर बड़ी पीठ का फैसला जरूरी है।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
दोनों जजों की राय अलग होने के बाद मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास भेजा जाएगा। सीजेआई यह तय करेंगे कि इस मुद्दे पर संविधान पीठ बनाई जानी चाहिए या नहीं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि पांच दिन से ज्यादा समय तक मामले की सुनवाई हुई और संस्थागत एकजुटता के लिए दोनों जजों की एक राय बेहतर होती, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि सांविधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि शासक कानून से बंधे होते हैं और कानून से ऊपर नहीं होते।
मामले से जुड़ी बड़ी बातें
विवाद आखिर किस बात को लेकर है?
पूरा विवाद 2023 में बनाए गए उस कानून को लेकर है, जिसने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति की संरचना बदल दी। पहले अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद द्वारा इस संबंध में कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई की समिति नियुक्तियां करेगी। नए कानून में सीजेआई की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल किया गया है। इसी बदलाव को याचिकाओं में चुनौती दी गई है।
यह भी पढ़ें: ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष एकजुट: शरद पवार की पार्टी ने की सर्वदलीय बैठक की मांग, किस पार्टी ने क्या कहा?
जस्टिस दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर क्या कहा?
जस्टिस दत्ता ने कहा कि सिर्फ चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की ओर से नामित कैबिनेट मंत्री से अपने ही नामित व्यक्ति के खिलाफ जाने की उम्मीद करना बहुत दूर की बात होगी। उन्होंने कहा कि कैबिनेट मंत्री का शामिल होना ऐसे स्वतंत्र संतुलन की व्यवस्था नहीं करता, जो किसी तटस्थ चयनकर्ता की मौजूदगी से बन सकती है। दूसरी ओर, जस्टिस शर्मा ने इन टिप्पणियों से असहमति जताई और मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की जरूरत बताई।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार और याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील क्या रही?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल उस समय मौजूद विधायी शून्य को भरा था। उन्होंने तर्क दिया कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने के बाद संसद की विधायी समझ को उस अस्थायी न्यायिक व्यवस्था पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वहीं, याचिकाओं में कहा गया है कि सीजेआई को चयन प्रक्रिया से हटाने वाला 2023 का कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़ी सांविधानिक आवश्यकता के खिलाफ है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा था कि भारत की सरकारें चुनाव आयोग की स्वतंत्र कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने में विफल रही थीं।
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क्या है पूरा मामला?
जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को मामला भेजने की केंद्र की मांग को खारिज किया और 2023 के कानून को चुनौती देने पर अपनी प्रथम दृष्टया राय भी रखी।
जस्टिस शर्मा ने जस्टिस दत्ता की टिप्पणियों से असहमति जताई और कहा कि मामले में ऐसा महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है, जिस पर बड़ी पीठ का फैसला जरूरी है।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
दोनों जजों की राय अलग होने के बाद मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास भेजा जाएगा। सीजेआई यह तय करेंगे कि इस मुद्दे पर संविधान पीठ बनाई जानी चाहिए या नहीं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि पांच दिन से ज्यादा समय तक मामले की सुनवाई हुई और संस्थागत एकजुटता के लिए दोनों जजों की एक राय बेहतर होती, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि सांविधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि शासक कानून से बंधे होते हैं और कानून से ऊपर नहीं होते।
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मामले से जुड़ी बड़ी बातें
- मामला अब सीधे सीजेआई के सामने जाएगा, जहां यह तय होगा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े इस कानूनी विवाद के लिए संविधान पीठ गठित की जाए या नहीं।
- जस्टिस दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को केवल वास्तविक रूप से ही नहीं, बल्कि लोगों को दिखाई देने वाली स्वतंत्रता के रूप में भी जरूरी बताया।
- उनके मुताबिक प्रधानमंत्री की ओर से नामित कैबिनेट मंत्री से प्रधानमंत्री के खिलाफ रुख अपनाने की उम्मीद करना मुश्किल है, क्योंकि मंत्री सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत से सरकार के साथ जुड़े होते हैं।
- 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।
- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चयन प्रक्रिया से सीजेआई को हटाना चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता की जरूरत को प्रभावित करता है।
- 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ ने कानून बनने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई वाली समिति से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का निर्देश दिया था।
- केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि अनूप बरनवाल फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ विधायी शून्य को भरने का काम किया था और कानून बनने के बाद संसद की विधायी समझ को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
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विवाद आखिर किस बात को लेकर है?
पूरा विवाद 2023 में बनाए गए उस कानून को लेकर है, जिसने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति की संरचना बदल दी। पहले अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद द्वारा इस संबंध में कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई की समिति नियुक्तियां करेगी। नए कानून में सीजेआई की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल किया गया है। इसी बदलाव को याचिकाओं में चुनौती दी गई है।
यह भी पढ़ें: ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष एकजुट: शरद पवार की पार्टी ने की सर्वदलीय बैठक की मांग, किस पार्टी ने क्या कहा?
जस्टिस दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर क्या कहा?
जस्टिस दत्ता ने कहा कि सिर्फ चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की ओर से नामित कैबिनेट मंत्री से अपने ही नामित व्यक्ति के खिलाफ जाने की उम्मीद करना बहुत दूर की बात होगी। उन्होंने कहा कि कैबिनेट मंत्री का शामिल होना ऐसे स्वतंत्र संतुलन की व्यवस्था नहीं करता, जो किसी तटस्थ चयनकर्ता की मौजूदगी से बन सकती है। दूसरी ओर, जस्टिस शर्मा ने इन टिप्पणियों से असहमति जताई और मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की जरूरत बताई।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार और याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील क्या रही?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल उस समय मौजूद विधायी शून्य को भरा था। उन्होंने तर्क दिया कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने के बाद संसद की विधायी समझ को उस अस्थायी न्यायिक व्यवस्था पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वहीं, याचिकाओं में कहा गया है कि सीजेआई को चयन प्रक्रिया से हटाने वाला 2023 का कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़ी सांविधानिक आवश्यकता के खिलाफ है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा था कि भारत की सरकारें चुनाव आयोग की स्वतंत्र कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने में विफल रही थीं।