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Supreme Court: एम्बिएंस मॉल विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों CBI जांच के आदेश को किया रद्द, जानें पूरा मामला
Tue, 20 Jan 2026 08:11 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Tue, 20 Jan 2026 08:11 PM IST
सार
गुरुग्राम के एम्बिएंस मॉल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए CBI जांच के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने बिना ठोस सबूतों के जांच का निर्देश दिया था। साथ ही याचिका दायर करने में हुई लंबी देरी पर भी सवाल उठाए गए। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं।
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एम्बिएंस मॉल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट।
- फोटो : ANI
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विस्तार
गुरुग्राम के चर्चित एम्बिएंस मॉल प्रोजेक्ट को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एम्बिएंस मॉल परियोजना में कथित अवैध निर्माण को लेकर CBI जांच के निर्देश दिए गए थे। अदालत ने साफ कहा कि बिना पुख्ता और ठोस सबूतों के CBI से FIR दर्ज कराने का आदेश देना कानूनन सही नहीं है।
यह मामला गुरुग्राम में दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एम्बिएंस प्रोजेक्ट से जुड़ा है। आरोप लगाया गया था कि करीब 18.98 एकड़ जमीन, जो एम्बिएंस लैगून आइलैंड रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स के लिए निर्धारित थी, उसे घटाकर 7.9 एकड़ कर दिया गया और बाकी जमीन पर व्यावसायिक निर्माण किया गया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वर्ष 2020 में CBI जांच का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को तथ्यों और कानून दोनों के लिहाज से गलत ठहराया है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह मान लिया था कि पूरी 18.98 एकड़ जमीन पर ही आवासीय कॉलोनी विकसित होनी थी, जबकि यह धारणा ही गलत थी। अदालत ने कहा कि संबंधित पक्षों के बीच हुए अनुबंध और स्वीकृत लेआउट प्लान में साफ तौर पर यह बात दर्ज है कि आवासीय परियोजना सीमित क्षेत्र में ही विकसित की जानी थी। ऐसे में हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष तथ्यात्मक रूप से गलत पाया गया।
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फैसले में अदालत की अहम टिप्पणियां
देरी और याचिकाकर्ताओं की भूमिका पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर खास जोर दिया कि एम्बिएंस मॉल और लीला एम्बिएंस होटल के पूरी तरह चालू हो जाने के करीब आठ साल बाद, यानी 2015 में याचिका दाखिल की गई। अदालत ने कहा कि इतनी लंबी देरी अपने आप में राहत देने से इनकार करने का मजबूत आधार बनती है। हाईकोर्ट ने इस अहम पहलू को नजरअंदाज किया, जो मामले की जड़ में जाता है।
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एनजीटी के आदेश पर भी रोक
शीर्ष अदालत ने इस मामले से जुड़े एक अन्य आदेश पर भी रोक लगा दी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने डेवलपर पर हरित क्षेत्र में निर्माण के आरोप में 10 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर भी फिलहाल रोक लगा दी है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट में लंबित अन्य संबंधित कार्यवाहियों पर इस फैसले का असर नहीं पड़ेगा।
इस फैसले को रियल एस्टेट से जुड़े मामलों में एक अहम नजीर माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि केवल आरोपों और देर से दायर याचिकाओं के आधार पर जांच एजेंसियों को सक्रिय करना उचित नहीं है। अदालत ने साफ किया कि न्यायिक हस्तक्षेप तथ्यों, समय-सीमा और कानूनी प्रक्रिया के दायरे में ही होना चाहिए।
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यह मामला गुरुग्राम में दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एम्बिएंस प्रोजेक्ट से जुड़ा है। आरोप लगाया गया था कि करीब 18.98 एकड़ जमीन, जो एम्बिएंस लैगून आइलैंड रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स के लिए निर्धारित थी, उसे घटाकर 7.9 एकड़ कर दिया गया और बाकी जमीन पर व्यावसायिक निर्माण किया गया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वर्ष 2020 में CBI जांच का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को तथ्यों और कानून दोनों के लिहाज से गलत ठहराया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह मान लिया था कि पूरी 18.98 एकड़ जमीन पर ही आवासीय कॉलोनी विकसित होनी थी, जबकि यह धारणा ही गलत थी। अदालत ने कहा कि संबंधित पक्षों के बीच हुए अनुबंध और स्वीकृत लेआउट प्लान में साफ तौर पर यह बात दर्ज है कि आवासीय परियोजना सीमित क्षेत्र में ही विकसित की जानी थी। ऐसे में हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष तथ्यात्मक रूप से गलत पाया गया।
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फैसले में अदालत की अहम टिप्पणियां
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश बिना सत्यापित और अधूरे तथ्यों के आधार पर दिया गया था।
- अदालत ने यह भी कहा कि जमीन के एक हिस्से को डी-लाइसेंस करने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप पाई गई है।
- मॉल और होटल का निर्माण वर्ष 2002 में शुरू होकर 2007-08 तक पूरा हो चुका था।
- फ्लैट खरीदार उस दौरान निर्माण गतिविधियों से अनजान नहीं हो सकते थे।
- करीब आठ से दस साल की देरी से याचिका दायर करने पर याचिकाकर्ताओं की नीयत पर सवाल उठता है।
देरी और याचिकाकर्ताओं की भूमिका पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर खास जोर दिया कि एम्बिएंस मॉल और लीला एम्बिएंस होटल के पूरी तरह चालू हो जाने के करीब आठ साल बाद, यानी 2015 में याचिका दाखिल की गई। अदालत ने कहा कि इतनी लंबी देरी अपने आप में राहत देने से इनकार करने का मजबूत आधार बनती है। हाईकोर्ट ने इस अहम पहलू को नजरअंदाज किया, जो मामले की जड़ में जाता है।
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एनजीटी के आदेश पर भी रोक
शीर्ष अदालत ने इस मामले से जुड़े एक अन्य आदेश पर भी रोक लगा दी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने डेवलपर पर हरित क्षेत्र में निर्माण के आरोप में 10 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर भी फिलहाल रोक लगा दी है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट में लंबित अन्य संबंधित कार्यवाहियों पर इस फैसले का असर नहीं पड़ेगा।
इस फैसले को रियल एस्टेट से जुड़े मामलों में एक अहम नजीर माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि केवल आरोपों और देर से दायर याचिकाओं के आधार पर जांच एजेंसियों को सक्रिय करना उचित नहीं है। अदालत ने साफ किया कि न्यायिक हस्तक्षेप तथ्यों, समय-सीमा और कानूनी प्रक्रिया के दायरे में ही होना चाहिए।
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