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SC: 'एक ही धर्म के दो संप्रदायों के विवाद में लागू नहीं हो सकता पूजा स्थल अधिनियम', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Sat, 30 Jul 2022 05:26 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 30 Jul 2022 05:26 PM IST
सार

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले में विवाद एक ही संप्रदाय के दो खंडों के बीच है। ये दोनों श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन समुदाय का तपगछ संप्रदाय है। ऐसे में  एक ही धर्म के दो संप्रदायों के विवाद में पूजा स्थल अधिनियम 1991 लागू नहीं किया जा सकता। 

 

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Supreme Court says Places of Worship Act 1991 cannot be enforced in dispute between two sects of same religion
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने श्वेतांबर मूर्तिपुजक जैन धर्म के तपगछ संप्रदाय के मोहिजीत समुदाय के सदस्यों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ही धर्म के दो संप्रदायों के विवाद में पूजा स्थल अधिनियम 1991 लागू नहीं किया जा सकता। 

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क्या है याचिका में की गई मांग
गौरतलब है कि इस याचिका में उसी धर्म के दूसरे संप्रदाय द्वारा पूजा स्थलों के कथित रूपांतरण पर पूजा के स्थान (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 को लागू करने की मांग की गई थी। याचिका में यह भी सुनिश्चित करने की मांग की गई है कि पूजा स्थल जहां तपगछ के अनुयायी धार्मिक अधिकारों का प्रयोग करने के हकदार हैं, वहां, भिक्षुओं सहित संप्रदाय के सभी सदस्यों को अपनी पूजा करने का हक होना चाहिए। 
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सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी
शीर्ष अदालत शरद जावेरी और अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले में विवाद एक ही संप्रदाय के दो खंडों के बीच है। ये दोनों श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन समुदाय का तपगछ संप्रदाय है। ऐसे में  एक ही धर्म के दो संप्रदायों के विवाद में पूजा स्थल अधिनियम 1991 लागू नहीं किया जा सकता। 
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पेश करने चाहिए सबूत
जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा कि इस विवाद का समाधान केवल अनुच्छेद 32 के तहत याचिका में दिए गए कथनों और विपक्ष के जवाबी हलफनामों के आधार पर नहीं हो सकता है। मामले में दावा किए गए अधिकारों को साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं को सबूत पेश करने चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता पूजा के स्थान (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 को लागू करने की मांग करते हैं, यह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर विचार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। 

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता जिन अधिकारों का दावा करते हैं, उनकी प्रकृति को साक्ष्य के आधार पर स्थापित करना होगा। पीठ ने कहा कि जिन अधिकारों का दावा किया गया है और अधिकारों के कथित उल्लंघन को भी सबूतों के आधार पर स्थापित करना होगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि नागरिक प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 92 के तहत या अन्यथा भी एक मुकदमे के रूप में पर्याप्त उपाय उपलब्ध हैं। इस पृष्ठभूमि में, यह अदालत संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है। याचिकाकर्ताओं को कानून में उपलब्ध अपने नागरिक उपचारों को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी गई है। पीठ ने कहा कि इस आदेश में निहित कुछ भी याचिकाकर्ताओं के दावे या वास्तव में या कानून में उनके अधिकारों पर राय की अभिव्यक्ति के बराबर नहीं होगा।


क्या है पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 
गौरतलब है कि  पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 एक अधिनियम है, जो 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में आए हुए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को एक आस्था से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने और किसी स्मारक के धार्मिक आधार पर रखरखाव पर रोक लगाता है। यह केंद्रीय कानून 18 सितंबर, 1991 को पारित किया गया था।

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