{"_id":"5f48263c8ebc3e3cda734687","slug":"supreme-court-says-on-reservation-that-development-of-all-classes-is-necessary-for-progress-of-the-nation","type":"story","status":"publish","title_hn":"राज्य खुद अपनी असल स्थिति के बेहतर ‘जज’ : सुप्रीम कोर्ट","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
राज्य खुद अपनी असल स्थिति के बेहतर ‘जज’ : सुप्रीम कोर्ट
Fri, 28 Aug 2020 06:12 AM IST
Jeet Kumar
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली
Published by: Jeet Kumar
Updated Fri, 28 Aug 2020 06:12 AM IST
विज्ञापन
supreme court
- फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि राज्यों को अपने यहां की स्थितियों के बारे में भलीभांति जानकारी होती है। अपने क्षेत्र में असमानताओं को समझने के लिए राज्य खुद ही बेहतर ‘जज’ हैं। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के वे लोग जो आरक्षण का लाभ पा रहे हैं, यह दावा नहीं कर सकते कि पूर्ण या एक निश्चित फीसदी आरक्षण सिर्फ उनके लिए है।
विज्ञापन
आगे कहा कि कोई भी पूरे आरक्षण का आनंद लेने के अधिकार का दावा नहीं कर सकता, बल्कि यह आवश्यकता के अनुसार समानुपातिक होना चाहिए। आरक्षण की मूल भावना ही है कि राष्ट्र की प्रगति के लिए सभी वर्गों का उत्थान आवश्यक है।
विज्ञापन
पीठ ने कहा, राज्य को विभिन्न वर्गों के उत्थान के लिए उपाय करने से वंचित नहीं किया जा सकता है। राज्य तर्कसंगत तरीके से सूची के भीतर किसी वर्ग को वरीयता प्रदान कर सकता है, जिसे उत्थान की आवश्यकता हो।
विज्ञापन
शीर्ष कोर्ट ने कहा, संघीय ढांचे में, राज्य के साथ-साथ संसद को भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के उत्थान के निर्देश देने का अधिकार है। राज्य को रोजगार और शिक्षण क्षेत्र में आरक्षण प्रदान करने का अधिकार है। इसमें किसी प्रकार की सांविधानिक रुकावट नहीं है।
हम मूकदर्शक नहीं बन सकते
पीठ ने कहा, हम इंद्रा साहनी समेत अन्य मामलों में दी गई व्यवस्था का सम्मान करते हैं लेकिन साथ ही हम मूक दर्शक नहीं बन सकते। हम जमीनी हकीकत से नजरें नहीं मोड़ सकते। सामाजिक परिवर्तन का सांविधानिक लक्ष्य समाज में हो रहे बदलावों पर विचार किए बगैर नहीं प्राप्त किया जा सकता।