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बायोमैट्रिक पहचान का किया जा सकता है दुरुपयोग: सुप्रीम कोर्ट

Thu, 19 Apr 2018 05:59 AM IST
एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली Updated Thu, 19 Apr 2018 05:59 AM IST
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Supreme Court says Misuse of biometric identity can be done
सुप्रीम कोर्ट
आधार मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अगर हर लेनदेन को किसी व्यक्ति की बायोमैट्रिक पहचान से जोड़ा जाएगा तो यह सूचना के खजाने में बदल सकता है। ऐसे में डाटा की सुरक्षा किया जाना आवश्यक है। अन्यथा इसका दुरुपयोग संभव है।
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ आधार और इसे अनिवार्य बनाने वाले 2016 के कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ ने यह कहते हुए यूआईडीएआई को अपनी आशंकाओं से अवगत कराया कि प्रत्येक लेनदेन के लिए आधार नंबर की बायोमैट्रिक पहचान नागरिकों के मेटा डाटा एकत्रीकरण का कारण बन सकती है। इसका इस्तेमाल सर्विलांस समेत कई उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
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पीठ के दूसरे जजों जस्टिम एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण ने कहा, फिंगरप्रिंट अपने आप से किसी की पहचान सार्वजनिक नहीं करेंगे लेकिन जब इसे दूसरी सूचनाओं के साथ जोड़ दिया जाएगा तो यह सूचनाओं का खजाना बन जाएगा और तब डाटा सुरक्षा की आवश्यकता होगी। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, अगर मेरा बायोमैट्रिक हर लेनदेन के साथ जोड़ा जाएगा तो यह सिर्फ एक पहचान बन जाएगा। उन्होंने कहा, अगर कोई व्यक्ति जन्म से नर्सरी में प्रवेश, सीबीएसई परीक्षा, पहली नौकरी और विदेश दौरे के लिए आधार पहचान देगा तो यह सूचनाओं का खजाना बन जाएगा। इसे कई उद्देश्यों के लिए एकत्रित कर दुरुपयोग किया जा सकता है।
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काल्पनिक डर दिखाकर आधार को नाकाम करना चाहते हैं कुछ लोग: यूआईडीएआई

Supreme Court says Misuse of biometric identity can be done
आधार - फोटो : SELF
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने बुधवार को उन आशंकाओं को खारिज कर दिया कि आधार के डाटा का निकट भविष्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राधिकरण ने कहा कि कुछ लोग काल्पनिक डर दिखाकर राष्ट्रीय पहचान कार्यक्रम को नाकाम करना चाहता है। यहां एक बयान में यूआईडीएआई ने स्पष्ट किया कि उसके वकील राकेश द्विवेदी के हवाले से कुछ मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि गूगल आधार को फेल करना चाहता है। ये खबरें सही नहीं हैं। 

वरिष्ठ वकील ने कोर्ट में कहा था कि गूगल, फेसबुक और ट्विटर को तुलना आधार से नहीं की जा सकती। क्योंकि इनमें सूचनाओं की प्रकृति अलग है। इसमें इस्तेमाल की जा रही एल्गोरिदम की प्रकृति में भी अंतर है। आधार और ऐसी दूसरी कंपनियों में अंतर का जिक्र करते हुए कहा कि आधार सिर्फ बायोमैट्रिक जानकारी का मिलान करता है। वहीं दूसरी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां डाटा के विश्लेषण के लिए लर्निंग टूल का इस्तेमाल करती हैं। यूआईडीएआई ने कहा कि कानून इस तरह के विश्लेषण की इजाजत नहीं देता। इसलिए किसी पर नजर रखे जाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
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