{"_id":"610677658ebc3e360646746e","slug":"supreme-court-probe-demanded-in-pegasus-snooping-row-what-could-it-reveal-or-the-the-protests-are-just-for-political-gain-here-is-all-you-need-to-know","type":"story","status":"publish","title_hn":"पेगासस विवादः सुप्रीम कोर्ट ने कराई जांच तो क्या मिलने की संभावना, या केवल राजनीतिक लाभ के लिए हंगामा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
पेगासस विवादः सुप्रीम कोर्ट ने कराई जांच तो क्या मिलने की संभावना, या केवल राजनीतिक लाभ के लिए हंगामा
Sun, 01 Aug 2021 04:08 PM IST
गौरव पाण्डेय
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Sun, 01 Aug 2021 04:08 PM IST
सार
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार विशेष परिस्थिति में कुछ ही जानकारी मिलने की संभावना रहती है, लेकिन पेगासस की उच्च तकनीकी के कारण जांच से भी कुछ खास मिलने की संभावना नहीं है।
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पिक्साबे
विस्तार
पेगासस जासूसी विवाद पर संसद से लेकर सड़क तक जबरदस्त हंगामा जारी है। अब मामला सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट से इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। अगर सुप्रीम कोर्ट जांच कराने पर सहमत हो जाता है तो इस पेगासस जासूसी विवाद से क्या निकल कर सामने आ सकता है? इसे लेकर साइबर विशेषज्ञ कहते हैं कि पेगासस सॉफ्टवेयर की जांच कई बिंदुओं पर निर्भर करती है।
विज्ञापन
अगर सब कुछ जांच के अनुरूप हो तो फोन की जांच कर यह बताया जा सकता है कि किस समय पर फोन से किस प्रकार की जानकारी चुराई गई, लेकिन इससे चुराई गई जानकारियों का विवरण नहीं प्राप्त किया जा सकता। लेकिन, अगर सरकार के नियमों के अंतर्गत आधिकारिक तौर पर जासूसी की गई है तो इसमें बहुत कुछ निकल कर सामने आ सकता है। इसका बड़ा कारण यह है कि इसमें कई एजेंसियां शामिल होती हैं और इसका रिकॉर्ड भी रखा जाता है।
विज्ञापन
साइबर एक्सपर्ट मयंक जायसवाल ने अमर उजाला को बताया कि पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर कोई एक अकेला सॉफ्टवेयर नहीं है। यह इस तरह के सॉफ्टवेयर की एक फैमिली है। इसमें जासूसी के हजारों अलग-अलग तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं। जबकि फॉरेन्सिक जांच करने वाले एक्सपर्ट को पेगासस के कुछ ही फुटप्रिंट्स की जानकारी होती है। अगर इन्हीं फुटप्रिंट्स से जासूसी की गई है तो फोन में इसके निशान प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन अगर किसी नए तरीके के सॉफ्टवेयर से जासूसी की गई है तो इसकी जांच कर पाना बेहद कठिन है।
विज्ञापन
पेगासस सॉफ्टवेयर को आईफोन को हैक करने के लिए ही बनाया गया था। इसे डिजाइन करते समय ही यह ध्यान रखा गया है कि जासूसी करने के बाद कोई फुटप्रिंट न छूटे। लिहाजा आईफोन से भी फुटप्रिंट्स मिलने की बहुत कम संभावना होती है। किसी फोन का नया मॉडल आने के बाद उच्च वर्ग सबसे पहले उसे खरीदने की कोशिश करता है। लेकिन अगर किसी के फोन की जासूसी की गई थी, और उसके बाद उसने अपना फोन बदल लिया है तब जासूसी की जानकारी कर पाना बिल्कुल संभव नहीं है।
कम मेमोरी का फोन इस्तेमाल करने पर फोन पुराना डाटा खत्म करता जाता है, और उसी जगह पर नया डाटा लिखता जाता है। यह चक्र चलता रहता है। इसलिए अगर पेगासस जासूसी होने की जानकारी बाद में चलती है और बाद में इसकी जांच की जाती है, लेकिन कम मेमोरी होने के कारण फोन ने पिछला डाटा मिटाकर उस पर नई जानकारी शेयर कर दी है, तब भी चुराई गई जानकारी का पता कर पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
लोग बार-बार नए-नए एप्स इस्तेमाल करते रहते हैं। उपयोग में न आने पर उन्हें डिलीट या अनइंस्टॉल भी करते रहते हैं। ज्यादातर एप्स यूजर से ऐसी जानकारी पाने की अनुमति भी ले लेते हैं जिसका उनके लिए कोई उपयोग नहीं होता। (आशंका है कि वे ऐसी जानकारी दूसरी कंपनियों को बेचकर पैसा कमाते हैं) ऐसे में अगर किसी दूसरे एप ने आपकी जानकारी चुराई है तो यह तय कर पाना मुश्किल भरा काम हो सकता है कि आपकी जानकारी पेगासस के जरिए चुराई गई है या किसी अन्य एप से। विशेषज्ञों की सलाह है कि कोई एप तभी इंस्टॉल करें जब आपको उसकी आवश्यकता हो।
पीड़ित ने क्या कहा
अशोक भारती एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। जिन मोबाइल फोन की जासूसी किए जाने का मामला सामने आया है, उसमें अशोक भारती का मोबाइल नंबर भी शामिल है। अमर उजाला के पूछने पर अशोक भारती ने बताया कि आशंका है कि उनके फोन की भी जासूसी की गई है, लेकिन चूंकि वे सार्वजनिक जीवन में हैं, इसलिए उनके पास छिपाने जैसा कुछ नहीं है।
एक मजबूत सरकार चलाने के लिए कई बार सरकार को कई लोगों की गतिविधियों पर दृष्टि रखनी पड़ती है। इसलिए अगर सरकार देश के हित के लिए इसका कोई सकारात्मक उपयोग करती है तो कुछ उपयोगकर्ताओं को लगता है कि इस तरह की जासूसी से कोई बड़ा खतरा नहीं है, लेकिन इसका दुरुपयोग रोके जाने की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि इससे यूजर को भारी सामाजिक-आर्थिक नुकसान हो सकता है।