जम्मू-कश्मीर में पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जितनी जरूरी स्वतंत्रता, उतनी सुरक्षा भी
- धारा 144 लागू करने के मामले में पीठ ने कहा, मजिस्ट्रेट अपने विवेक का करें इस्तेमाल
- पीठ ने कहा, लोगों की स्वतंत्रता व सुरक्षा के बीच एक संतुलन कायम किया जाना चाहिए
- कश्मीर में सुरक्षा के साथ मानवाधिकार व स्वतंत्रता के बीच संतुलन साधने की कोशिश हो
विस्तार
जम्मू-कश्मीर पर संचार माध्यमों पर लगी पाबंदियों पर जस्टिस एनवी रमना अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने स्वतंत्रता के साथ-साथ सुरक्षा की भी वकालत की। पीठ ने कहा, हम प्रतिबंधात्मक आदेशों के पीछे की राजनीतिक मंशा पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। बार-बार यह सवाल हमारे सामने आता है कि लोगों की स्वतंत्रता ज्यादा जरूरी है या फिर उनकी सुरक्षा।
पीठ ने कहा, हम इस बात में पड़ना ही नहीं चाहते हैं कि आजादी जरूरी है या फिर सुरक्षा। हमारी चिंता बस यही है कि लोगों की स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच एक संतुलन कायम किया जाना चाहिए। हम केवल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि नागरिकों को उनके सभी पर्याप्त अधिकार और आजादी तो मिले हीं, साथ में उनकी सुरक्षा भी हो।
वहीं, जम्मू-कश्मीर प्रशासन को फटकार लगाते हुए पीठ ने कहा, मजिस्ट्रेट को धारा 144 के तहत पाबंदियों के आदेश देते समय नागरिकों की स्वतंत्रता और सुरक्षा में तालमेल बिठाते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। बार-बार एक ही तरीके के आदेश जारी करना सही नहीं है। इंटरनेट बंद करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। कश्मीर में सुरक्षा के साथ-साथ मानवाधिकार और स्वतंत्रता के बीच संतुलन साधने की कोशिश होनी चाहिए। सरकार को पाबंदी के सभी आदेशों को प्रकाशित करना चाहिए ताकि प्रभावित लोग अदालत जा सकें।
पहली बार इंटरनेट के संदर्भ को अनुच्छेद 19 से जोड़ा
चार्ल्स डिकंस की पंक्तियों से की फैसले की शुरुआत
पीठ ने अपने फैसले की शुरुआत 19वीं सदी के ब्रिटिश लेखक चार्ल्स डिकंस के उपन्यास ‘ए टेल ऑफ टू सिटीज’ की चंद पंक्तियों से की। जिसका मजमून कुछ यूं है...यह सबसे शानदार समय था और सबसे खराब वक्त भी
कई बार, यह ज्ञान का युग था, यह मूर्खता का भी युग
यह विश्वास का युग था, यह अविश्वास का भी युग
यह उजाले का भी मौसम था, और अंधेरे का भी
यह उम्मीदों का वसंत था और निराशा की सर्दिया
हमारे सामने सब कुछ था और कुछ भी नहीं था,
हम सीधे स्वर्ग जा रहे थे, हम दूसरे रास्ते से भी जा रहे थे
यह वक्त अपने वर्तमान से काफी दूर था
अब कोलाहलपूर्ण वक्त में जीने के लिए मजबूर
अच्छा हो या बुरा, जो भी है अति है।
इन्होंने दायर की थी याचिका
पीठ की अहम टिप्पणी
- इंटरनेट बैन पर आदेशों की बीच-बीच में समीक्षा की जानी चाहिए
- बिना वजह इंटरनेट पर बैन नहीं लगाया जा सकता
- इंटरनेट पर पूरा बैन सख्त कदम, जरूरी होने पर लगे
- चिकित्सा समेत सभी जरूरी सेवाओं में इंटरनेट को बहाल किया जाए
पाबंदी से मीडिया के काम पर असर पड़ने के दावे को किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस दावे को खारिज कर दिया कि गत वर्ष अगस्त से जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा संचार व आने-जाने पर लगाई गई पाबंदी से मीडिया पर चिलिंग इफेक्ट (मीडिया के प्रभावी तरीके से काम करने पर असर) हो रहा है। जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा, बिना किसी साक्ष्य को रिकार्ड पर लगाए यह समझना असंभव है कि चिलिंग इफेक्ट पड़ने का वैधानिक दावा सही है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महज भावनात्मक दलीलों से यह दावा करना सही नहीं है।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि जिम्मेदार सरकार के लिए हर वक्त मीडिया को आजादी देने और पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने में सहायता करने की जरूरत है। वास्तव में कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने कश्मीर में इंटरनेट व अन्य संचार माध्यम पर लगाई पाबंदियों की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इससे प्रेस की आजादी प्रभावित हो रही है।