Supreme Court: क्या जेल में बंद माओवादी नेता की सुनवाई के लिए विशेष अदालत बनाई जा सकती है? ओडिशा सरकार से सवाल
क्या जेल में बंद माओवादी नेता की सुनवाई के लिए विशेष अदालत बनाई जा सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से पूछा है कि क्या जेल में बंद माओवादी नेता दुना केशव राव उर्फ आजाद के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए एक विशेष अदालत स्थापित की जा सकती है। राव ने 2011 में आंध्र प्रदेश में आत्मसमर्पण कर दिया था। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ को राव की ओर से पेश वकील मोहम्मद इरशाद हनीफ ने बताया कि वह 14 साल से अधिक समय से हिरासत में है।
ओडिशा सरकार के वकील ने कहा कि राज्य ने राव की याचिका पर जवाबी हलफनामा दायर किया है, जिसमें बताया गया है कि उसे 10 मामलों में बरी किया गया है, जबकि उसके खिलाफ 37 मामले लंबित हैं। पीठ ने अपने हालिया आदेश में कहा, ओडिशा राज्य के वकील को निर्देश दिया जाता है कि वे इस बारे में निर्देश प्राप्त करें कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लंबित मुकदमों को पूरा करने के लिए ओडिशा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से अपेक्षित विशेष अदालतें स्थापित की जा सकती हैं या नहीं। आंध्र प्रदेश के वकील की ओर से राव की याचिका पर जवाब देने के लिए समय मांगे जाने के बाद मामले की सुनवाई 28 अप्रैल को स्थगित कर दी गई। इससे पहले 20 दिसंबर, 2024 को शीर्ष अदालत ने याचिका पर नोटिस जारी कर दोनों सरकारों से जवाब मांगा था।
मुझ पर झूठे मामले दर्ज किए जा रहे - राव
राव ने आरोप लगाया कि उन पर एक के बाद एक झूठे मामले दर्ज किए जा रहे हैं और ओडिशा तथा आंध्र प्रदेश सरकारों को समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर सामान्य जीवन जीने के लिए उन्हें दिए गए अपने आश्वासन को पूरा करना चाहिए। गौरतलब है कि राव को कभी ओडिशा और आंध्र प्रदेश में सक्रिय सबसे खूंखार माओवादी कमांडरों में से एक माना जाता था और जो सीपीआई (माओवादी) ओडिशा राज्य संगठन समिति का सदस्य था। उसने 18 मई, 2011 को हैदराबाद पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था।
मयूर विहार में 3 मंदिरों को तोड़ने की कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर विचार करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को दिल्ली के मयूर विहार फेज-2 इलाके में संजय झील पार्क में बने तीन मंदिरों को तोड़ने के लिए शुरू की गई कार्रवाई के खिलाफ दाखिल याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। यह कार्रवाई दिल्ली विकास प्राधिकरण(डीडीए) द्वारा की जा रही है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को अपनी मांग को लेकर हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी है। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि वह इस मामले में फिलहाल हस्तक्षेप करने में इच्छुक नहीं है। पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन से सवाल किया कि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे शीर्ष अदालत में याचिका क्यों दाखिल किया। जवाब में जैन ने कहा कि इस अदालत ने जहांगीरपुरी मामले में हस्तक्षेप करते हुए आदेश पारित किया था। हालांकि पीठ ने मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।पीठ ने याचिकाकर्ताओं को अपनी मांग को लेकर हाईकोर्ट जाने के लिए कहा। वकील जैन ने कहा कि 35 साल से यह मंदिर स्थित हैं और सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहता है कि 2009 से पहले के धार्मिक स्थल नहीं हटाए जा सकते हैं।
वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने के लिए साक्षात्कार की सलाह कभी नहीं दी : जयसिंह
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने के लिए साक्षात्कार आयोजित करने के निर्देश का सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया। जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एसवीएन भट्टी की तीन जजों की पीठ ने शीर्ष अदालत प्रशासन की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और इस मुद्दे पर दिशा-निर्देश मांगने वाली जयसिंह सहित कई वकीलों की दलीलें सुनीं।
शीर्ष अदालत ने याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई करते हुए इस बात पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने की प्रक्रिया पर 2017 के फैसले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। जयसिंह ने कहा कि उन्होंने कभी यह सुझाव नहीं दिया कि वरिष्ठ पदनाम देने के लिए वकीलों का साक्षात्कार होना चाहिए और फिर भी यह फैसले में निर्धारित किया गया था और साक्षात्कार के लिए 25 अंक भी निर्धारित किए गए थे।
जयसिंह ने कहा, मैंने साक्षात्कार का सुझाव नहीं दिया था। फिर जब फैसला सुनाया गया तो मैंने विद्वान न्यायाधीश को इसे पढ़ते हुए सुना और कहा कि साक्षात्कार के लिए 25 अंक होंगे। मैंने कभी 25 अंक का सुझाव नहीं दिया। यह काफी बड़ा है। मैं यह तय करना अदालत पर छोड़ती हूं कि 25 अंकों का क्या करना है। जयसिंह ने विभिन्न देशों में अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं का भी उल्लेख किया। हालांकि, मेहता ने कहा, हर देश में वहां के विशिष्ट मुद्दे होते हैं। अन्य देशों में प्रचलित प्रणालियों में जाने के बजाय, भारतीय न्यायशास्त्र को फिर से भारतीय बनाने का समय आ गया है। जयसिंह ने कहा कि वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने के लिए गुप्त मतदान प्रणाली का पालन करना है या नहीं, यह निर्णय पूर्ण न्यायालय को लेना है और यह न्यायिक पक्ष से तय नहीं किया जा सकता है।
19 मार्च की सुनवाई में मेहता ने कहा था कि अधिवक्ताओं को वरिष्ठ पदनाम प्रदान करने की प्रक्रिया के बारे में 2017 के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पीठ जयसिंह की याचिका पर दो फैसलों में परिकल्पित वरिष्ठ पदनाम प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने के लिए याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
कुछ राज्यों के साथ रॉयल्टी बकाया मुद्दे के समाधान का प्रयास कर रहे हैं : केंद्र
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह खनिज संपन्न राज्यों के साथ खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर रॉयल्टी और कर बकाया की वसूली के मुद्दे को सुलझाने का प्रयास कर रहा है। इस बीच, शीर्ष अदालत ने झारखंड जैसे कई खनिज संपन्न राज्यों की ओर से बाद में दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई 24 अप्रैल तक के लिए टाल दी, जिसमें केंद्र और खनन कंपनियों से हजारों करोड़ रुपये की खनिज रॉयल्टी और कर बकाया दिलाने की मांग की गई है।
जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस उज्जल भुईयां की पीठ ने कहा कि वह खनिज संपदा से समृद्ध कई राज्यों की याचिकाओं पर किस क्रम में सुनवाई हो इसका फैसला करेगी। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, इस मुद्दे का समाधान निकालने के प्रयास जारी हैं और याचिकाओं को मई के पहले सप्ताह में सूचीबद्ध किया जा सकता है। इस पर झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि सुनवाई के किसी भी स्तर पर समझौता हो सकता है इसलिए सुनवाई में देरी नहीं होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने 25 जुलाई, 2024 को 8:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति संसद के पास नहीं बल्कि राज्यों के पास है। बाद के एक आदेश में 14 अगस्त को शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का भावी प्रभाव नहीं होगा और खनिज संपन्न राज्यों को 1 अप्रैल, 2005 से 12 वर्षों की अवधि में हजारों करोड़ रुपये के खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर रॉयल्टी और कर बकाया को केंद्र और खनन फर्मों से वसूलने की अनुमति दी। बाद में, कई राज्यों और केंद्र के बीच विवाद को सुलझाने के लिए न्यायमूर्ति ओका की अध्यक्षता में एक विशेष पीठ का गठन किया गया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट को उम्र के वैज्ञानिक आकलन के तौर पर माना जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की गणना के उद्देश्य से पोस्टमार्टम रिपोर्ट को मृतक की उम्र के वैज्ञानिक आकलन के तौर पर माना जा सकता है। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक लाभकारी और कल्याणकारी कानून है और उचित मुआवजा देना अदालत का कर्तव्य है।
पीठ ने मृतक के परिवार को दिए जाने वाले कुल मुआवजे की राशि 5,96,761 रुपये से बढ़ाकर 13,82,500 रुपये कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मृतक तारावती की उम्र पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर निर्धारित 45 वर्ष की बजाय 60 वर्ष मानने के पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को गलत पाया। तारावती की पुत्रवधू सुनीता के नेतृत्व में अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया था कि मृतक की आयु 60 वर्ष पूरी तरह से अनुमान के आधार पर ली गई है। यह अनुमान यह मानते हुए लगाया गया था कि सामाजिक मानदंडों के अनुसार, पत्नी अपने पति से दो वर्ष छोटी होगी। वहीं, 7 फरवरी, 2003 की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका की आयु स्पष्ट रूप से 45 वर्ष दर्ज की गई थी। पीठ ने दलील में दम पाते हुए कहा कि दावेदार और मृतक की आयु के संबंध में कथित विसंगति गलत है। न्यायालय ने कहा कि जब दावा दायर किया गया था, तब अपीलकर्ता संख्या 1 की आयु लगभग 30 वर्ष थी तथा मृतका के विवाह के समय प्रचलित सामाजिक मानदंडों को देखते हुए बहू और सास के बीच 15 वर्ष का अंतर पूरी तरह से वास्तविकता से रहित नहीं कहा जा सकता है। पीठ ने कहा कि इसके अलावा विपरीत संकेत देने वाली सामग्री के अभाव में, मृतका की आयु पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है। इस प्रकार, हम उसकी आयु 45 वर्ष मानते हुए लाभ देने के लिए इच्छुक हैं।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जजों की नियुक्ति को दी मंजूरी
सीजेआई संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने गुजरात हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में आठ न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इनमें लियाकाथुसैन शमसुद्दीन पीरजादा, रामचंद्र ठाकुरदास वच्छानी, जयेश लखनशीभाई ओडेड्रा, प्रणव महेशभाई रावल, मूलचंद त्यागी, दीपक मनसुखलाल व्यास, उत्कर्ष ठाकोरभाई देसाई और रोहनकुमार कुंदनलाल चूड़ावाला के नाम शामिल हैं।
वहीं, एक अन्य बयान में कहा गया है कि कॉलेजियम ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीशों के रूप में अतिरिक्त न्यायाधीशों - न्यायमूर्ति सुमीत गोयल, न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा और न्यायमूर्ति कीर्ति सिंह की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही कॉलेजियम ने यह भी सिफारिश की है कि न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत, राधाकिशन अग्रवाल और संजय कुमार जायसवाल को एक वर्ष की नई अवधि के लिए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट : आरोपी की जमानत याचिका में सहमति से संबंध लिखने पर वकील को फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक वकील को अपने मुवक्किल की जमानत याचिका में बार-बार सहमति से संबंध लिखने को लेकर फटकार लगाई। पीठ ने वकील से यह भी कहा कि यदि पीड़िता नाबालिग है तो सहमति कोई मायने नहीं रखती। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, याचिका पढ़कर हम परेशान हो गए। विशेष अनुमति याचिका में आपने कम से कम 20 बार सहमति से संबंध लिखा है। लड़की की उम्र क्या है? आपने खुद याचिका में कहा है कि वह एक नाबालिग है। वकील के पीठ से माफी मांगने के बाद कोर्ट ने जमानत याचिका पर पुलिस और अन्य को नोटिस जारी किया।
इससे पहले कोर्ट ने कहा, आपने हर पैरा में सहमति से संबंध लिखा है। सहमति से संबंध से आपका क्या मतलब है? आपको कानून की एबीसीडी भी नहीं पता। आप एसएलपी क्यों दायर कर रहे हैं। क्या आप एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (एओआर) हैं? कोर्ट ने कहा, ये लोग एओआर कैसे बन गए। गौरतलब है कि शीर्ष अदालत वकीलों के लिए एओआर परीक्षा आयोजित करती है।
कश्मीर यूनिवर्सिटी के कुलपति, उनके निजी सचिव के अपहरण व हत्या मामले में बरी करने का फैसला बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कुलपति डॉ. मुशीर उल हक और उनके निजी सचिव के अपहरण व हत्या के सनसनीखेज मामले में प्रतिबंधित जम्मू-कश्मीर छात्र मुक्ति मोर्चा (जेकेएसएलएफ) के सदस्यों को बरी करने के खिलाफ सीबीआई की दायर अपील को खारिज कर दिया।
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने अब निरस्त हो चुके आतंकवादी एवं विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम(टाडा), 1987 के तहत दर्ज मामले में सीबीआई की अपील में कोई दम नहीं पाया। पीठ ने कहा कि सीबीआई के पुलिस अधीक्षक की ओर से आरोपियों के इकबालिया बयान दर्ज करने में प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया था। पीठ ने कहा कि हमें प्रतिवादियों मोहम्मद सलीम जरगर उर्फ फैयाज और अन्य को बरी करने में विशेष अदालत के अपनाए गए दृष्टिकोण में कोई त्रुटि नहीं दिखती।
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक वकील को अपने मुवक्किल की जमानत याचिका में बार-बार सहमति से संबंध लिखने को लेकर फटकार लगाई। पीठ ने वकील से कहा कि यदि पीड़िता नाबालिग है तो सहमति कोई मायने नहीं रखती। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, याचिका पढ़कर हम परेशान हो गए। विशेष अनुमति याचिका में आपने कम से कम 20 बार सहमति से संबंध लिखा है। लड़की की उम्र क्या है? आपने खुद याचिका में कहा है कि वह एक नाबालिग है। वकील के पीठ से माफी मांगने के बाद कोर्ट ने जमानत याचिका पर पुलिस और अन्य को नोटिस जारी किया। इससे पहले कोर्ट ने कहा, आपने हर पैरा में सहमति से संबंध लिखा है। सहमति से संबंध से आपका क्या मतलब है? आपको कानून की एबीसीडी भी नहीं पता। आप एसएलपी क्यों दायर कर रहे हैं। क्या आप एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (एओआर) हैं? कोर्ट ने कहा, ये लोग एओआर कैसे बन गए।