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SC Updates: सुप्रीम कोर्ट से मुरादाबाद की फर्म को मिली बड़ी राहत; MP सिविल जज भर्ती मामले में फैसला सुरक्षित
Mon, 25 Aug 2025 09:58 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Mon, 25 Aug 2025 09:58 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई (फाइल)
महाराष्ट्र सरकार जुडपी जंगल की करीब 86,409 हेक्टेयर भूमि को वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के दायरे से बाहर करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। सरकार ने इस इलाके में हुए अतिक्रमण को भी बिना किसी दंड और क्षतिपूर्ति के नियमित करने की भी मांग की है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार की यह मांग उसके ही अपने कानूनी ढांचे के विपरीत हैं। साथ ही ये मांग सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्ति केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की सिफारिशों के भी खिलाफ है।
क्या है मामला
जुडपी जंगल, महाराष्ट्र के पूर्वी विदर्भ के नागपुर, वर्धा, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर और गढ़चिरौली जिलों में सरकारी राजस्व अभिलेखों में जंगल के रूप में दर्ज झाड़ीदार भूमि है। ऐतिहासिक रूप से, इस भूमि को निम्न भूभाग के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जहां की मिट्टी खराब थी और जहां घने वृक्ष नहीं हो सकते। इस जंगल का उपयोग लंबे समय से मवेशियों की चारागाह, श्मशान स्थल, खलिहान और स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों व अन्य ग्रामीण बुनियादी ढांचों के लिए किया जाता रहा है। हालांकि जुडपी के जंगलों का पारिस्थितिक महत्व है। ये जंगलों और कृषि भूमि के बीच संक्रमणकालीन पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक दिसंबर 1996 के टी.एन. गोदावर्मन फैसले में कहा था कि सरकारी अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज कोई भी भूमि, चाहे उसकी गुणवत्ता या स्वामित्व कुछ भी हो, वन (संरक्षण) अधिनियम के अंतर्गत आएगी। इससे जुडपी के जंगल सख्त वन संरक्षण कानूनों के दायरे में आ गए। इस महीने की शुरुआत में दायर महाराष्ट्र सरकार के हलफनामे में कहा 'राज्य ने अदालत से यह घोषित करने का आग्रह किया है कि वन प्रबंधन के लिए अनुपयुक्त जुडपी की 86409 हेक्टेयर भूमि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के दायरे में नहीं आती है और 12 दिसंबर, 1996 के आदेशों के प्रावधानों को भी लागू नहीं करती है।'
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क्या है मामला
जुडपी जंगल, महाराष्ट्र के पूर्वी विदर्भ के नागपुर, वर्धा, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर और गढ़चिरौली जिलों में सरकारी राजस्व अभिलेखों में जंगल के रूप में दर्ज झाड़ीदार भूमि है। ऐतिहासिक रूप से, इस भूमि को निम्न भूभाग के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जहां की मिट्टी खराब थी और जहां घने वृक्ष नहीं हो सकते। इस जंगल का उपयोग लंबे समय से मवेशियों की चारागाह, श्मशान स्थल, खलिहान और स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों व अन्य ग्रामीण बुनियादी ढांचों के लिए किया जाता रहा है। हालांकि जुडपी के जंगलों का पारिस्थितिक महत्व है। ये जंगलों और कृषि भूमि के बीच संक्रमणकालीन पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करते हैं।
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उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक दिसंबर 1996 के टी.एन. गोदावर्मन फैसले में कहा था कि सरकारी अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज कोई भी भूमि, चाहे उसकी गुणवत्ता या स्वामित्व कुछ भी हो, वन (संरक्षण) अधिनियम के अंतर्गत आएगी। इससे जुडपी के जंगल सख्त वन संरक्षण कानूनों के दायरे में आ गए। इस महीने की शुरुआत में दायर महाराष्ट्र सरकार के हलफनामे में कहा 'राज्य ने अदालत से यह घोषित करने का आग्रह किया है कि वन प्रबंधन के लिए अनुपयुक्त जुडपी की 86409 हेक्टेयर भूमि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के दायरे में नहीं आती है और 12 दिसंबर, 1996 के आदेशों के प्रावधानों को भी लागू नहीं करती है।'
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जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने संबंधी याचिकाओं पर जल्द सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई की तारीख आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और कहा कि यह मामला पहले ही 10 अक्टूबर को सूचीबद्ध है। 14 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार से जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने पर आठ हफ्तों में जवाब दाखिल करने को कहा था। एक वकील ने सोमवार को इस मामले पर जल्द सुनवाई करने की मांग की तो सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया और कहा कि यह मामला 10 अक्तूबर को सूचीबद्ध है। साथ ही अदालत ने कहा कि फिलहाल वे संवैधानिक मामले पर सुनवाई कर रहे हैं, जो राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समयसीमा तय करने से जुड़ा है।
निमिषा प्रिया मामले से जुड़ी याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें यमन में मौत की सजा का सामना कर रही भारतीय नर्स निमिषा प्रिया के मामले में सार्वजनिक तौर पर असत्यापित बयान देने पर रोक लगाने की मांग की गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता के ए पॉल से कहा कि अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमाणी ने आश्वासन दिया है कि इस मामले पर केवल सरकार ही बोलेगी और कोई नहीं। पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि 'आप क्या चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि कोई भी सामने आकर मीडिया से कुछ न कहे? अटॉर्नी जनरल ने कहा है कि भारत सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी मीडिया को जानकारी न दे। आप और क्या चाहते हैं?'
अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने कहा कि यह एक बेहद संवेदनशील मामला है और वह यह सुनिश्चित करेंगे कि इसके समाप्त होने तक कोई भी मीडिया ब्रीफिंग न हो। याचिकाकर्ता ने कहा कि निमिषा प्रिया के मामले में मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए कानूनी हस्तक्षेप की मांग की थी। उन्होंने कहा कि इस समय इस मामले में नाजुक बातचीत चल रही है और कुछ लोग झूठे बयान दे रहे हैं। याचिका में केंद्र को यमन के साथ तत्काल, समन्वित राजनयिक उपाय करने का निर्देश देने की मांग की गई है ताकि मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सके।
अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने कहा कि यह एक बेहद संवेदनशील मामला है और वह यह सुनिश्चित करेंगे कि इसके समाप्त होने तक कोई भी मीडिया ब्रीफिंग न हो। याचिकाकर्ता ने कहा कि निमिषा प्रिया के मामले में मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए कानूनी हस्तक्षेप की मांग की थी। उन्होंने कहा कि इस समय इस मामले में नाजुक बातचीत चल रही है और कुछ लोग झूठे बयान दे रहे हैं। याचिका में केंद्र को यमन के साथ तत्काल, समन्वित राजनयिक उपाय करने का निर्देश देने की मांग की गई है ताकि मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सके।
केरल हाईकोर्ट के आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को केरल उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड को एक सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किया गया था और यह सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के दायरे में आता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ 5 अगस्त के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ हवाई अड्डा अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। हवाई अड्डे की ओर से पेश हुए वकील ने दलील दी कि सीआईएएल कंपनी अधिनियम के तहत गठित एक कंपनी है। उन्होंने कहा कि हवाई अड्डा न तो संसद द्वारा बनाया गया है और न ही सरकार द्वारा वित्त पोषित है।
उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने अपनी एकल पीठ और राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सीआईएएल को सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 2(एच)(डी)(आई) के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को केरल उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड को एक सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किया गया था और यह सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के दायरे में आता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ 5 अगस्त के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ हवाई अड्डा अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। हवाई अड्डे की ओर से पेश हुए वकील ने दलील दी कि सीआईएएल कंपनी अधिनियम के तहत गठित एक कंपनी है। उन्होंने कहा कि हवाई अड्डा न तो संसद द्वारा बनाया गया है और न ही सरकार द्वारा वित्त पोषित है।
उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने अपनी एकल पीठ और राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सीआईएएल को सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 2(एच)(डी)(आई) के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने MP सिविल जज भर्ती मामले में फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश में सिविल जज भर्ती विवाद पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मामला हाईकोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है जिसमें कहा गया था कि तीन साल की प्रैक्टिस पूरी किए बिना भर्ती मान्य नहीं होगी। 1994 के नियमों में 2023 में संशोधन कर यह प्रावधान जोड़ा गया था। दो उम्मीदवारों ने दावा किया कि वे नए नियमों के तहत योग्य हैं और कट-ऑफ दोबारा तय किया जाए। हाईकोर्ट ने भर्ती रोकने का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट इस पर अंतिम निर्णय देगा। संशोधित नियमों के अनुसार, सामान्य और ओबीसी वर्ग के वे उत्कृष्ट छात्र जिन्होंने 70% से अधिक अंक पाए हैं, उन्हें तीन साल की प्रैक्टिस से छूट मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश में सिविल जज भर्ती विवाद पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मामला हाईकोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है जिसमें कहा गया था कि तीन साल की प्रैक्टिस पूरी किए बिना भर्ती मान्य नहीं होगी। 1994 के नियमों में 2023 में संशोधन कर यह प्रावधान जोड़ा गया था। दो उम्मीदवारों ने दावा किया कि वे नए नियमों के तहत योग्य हैं और कट-ऑफ दोबारा तय किया जाए। हाईकोर्ट ने भर्ती रोकने का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट इस पर अंतिम निर्णय देगा। संशोधित नियमों के अनुसार, सामान्य और ओबीसी वर्ग के वे उत्कृष्ट छात्र जिन्होंने 70% से अधिक अंक पाए हैं, उन्हें तीन साल की प्रैक्टिस से छूट मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने मुरादाबाद की फर्म पर एनजीटी के 50 करोड़ रुपये के जुर्माने को किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मानदंडों के उल्लंघन में मुरादाबाद स्थित हस्तशिल्प निर्यातक पर 50 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने वाले राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून राज्य या उसकी एजेंसियों को पर्यावरणीय मामलों में भी एक पाउंड मांस वसूलने की अनुमति नहीं देता है।22 अगस्त के अपने फैसले में, सीजेआई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि कंपनी ने उल्लंघन तो किया, लेकिन जुर्माना, जो पूरी तरह से उसके कारोबार पर आधारित था कानूनी आधार का अभाव था। शीर्ष अदालत ने पर्यावरण मानदंडों के कथित उल्लंघन के लिए मुरादाबाद स्थित हस्तशिल्प निर्यातक सीएल गुप्ता एक्सपोर्ट लिमिटेड पर जुर्माना लगाने वाले एनजीटी के लंबे फैसले की भी आलोचना की। अदालत ने क्षोभ व्यक्त किया और कहा कि विचार का प्रयोग पृष्ठों की संख्या के अनुपात में नहीं था। फैसले में कहा गया कि उन्हें तथ्यों का हवाला दिए बिना कानून का सामान्य विवरण देकर केवल बयानबाजी करने से बचना चाहिए। पीठ ने वार्षिक कारोबार के आधार पर जुर्माना लगाने के सवाल पर चर्चा करते हुए एक फैसले का हवाला दिया। एनजीटी ने उस मामले में कंपनी का राजस्व 100-500 करोड़ रुपये के बीच पाया और 500 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मानदंडों के उल्लंघन में मुरादाबाद स्थित हस्तशिल्प निर्यातक पर 50 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने वाले राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून राज्य या उसकी एजेंसियों को पर्यावरणीय मामलों में भी एक पाउंड मांस वसूलने की अनुमति नहीं देता है।22 अगस्त के अपने फैसले में, सीजेआई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि कंपनी ने उल्लंघन तो किया, लेकिन जुर्माना, जो पूरी तरह से उसके कारोबार पर आधारित था कानूनी आधार का अभाव था। शीर्ष अदालत ने पर्यावरण मानदंडों के कथित उल्लंघन के लिए मुरादाबाद स्थित हस्तशिल्प निर्यातक सीएल गुप्ता एक्सपोर्ट लिमिटेड पर जुर्माना लगाने वाले एनजीटी के लंबे फैसले की भी आलोचना की। अदालत ने क्षोभ व्यक्त किया और कहा कि विचार का प्रयोग पृष्ठों की संख्या के अनुपात में नहीं था। फैसले में कहा गया कि उन्हें तथ्यों का हवाला दिए बिना कानून का सामान्य विवरण देकर केवल बयानबाजी करने से बचना चाहिए। पीठ ने वार्षिक कारोबार के आधार पर जुर्माना लगाने के सवाल पर चर्चा करते हुए एक फैसले का हवाला दिया। एनजीटी ने उस मामले में कंपनी का राजस्व 100-500 करोड़ रुपये के बीच पाया और 500 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।