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SC: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को दी याचिका संशोधित करने की अनुमति, अब आप देगी NCTD से जुड़े कानून को चुनौती

Fri, 25 Aug 2023 06:01 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Fri, 25 Aug 2023 06:01 PM IST
सार

आप सरकार संसद के दोनों सदनों और राष्ट्रपति द्वारा पारित एनसीटीडी (संशोधन) अधिनियम 2023 को चुनौती देगी। बता दें, यह कानून केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार के नौकरशाहों पर नियंत्रण देता है।

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Supreme court news&update: Aam Aadmi Party will challenge the law related to NCTD in the Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

केंद्र सरकार के दिल्ली सेवा (विधेयक) कानून के खिलाफ दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने दिल्ली सरकार की उस याचिका को संशोधित करने की अनुमति दे दी है, जिसमें उसने 19 मई के सेवा अध्यादेश की वैधता को चुनौती दी थी। बता दें, सेवा अध्यादेश अब कानून बन चुका है।

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आप देगी चुनौती
गौरतलब है, केंद्र के नए NCTD (संशोधन) कानून, 2023 संसद के दोनों सदनों से पास हो चुका है और राष्ट्रपति से भी इसकी मंजूरी मिल गई है। अब आप सरकार संसद के दोनों सदनों और राष्ट्रपति द्वारा पारित एनसीटीडी (संशोधन) अधिनियम 2023 को चुनौती देगी। यह कानून केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार के नौकरशाहों पर नियंत्रण देता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने एमटीपी अधिनियम से जुड़ी याचिका पर विचार करने से किया इनकार 
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और कहा कि संसद ने महिलाओं के हित में कुछ प्रावधान बनाए हैं। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील से उच्च न्यायालय जाने को कहा। 
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याचिकाकर्ता संगठन का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने पीठ को बताया कि उन्होंने एमटीपी अधिनियम के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि उनका मुख्य तर्क यह है कि एक पंजीकृत चिकित्सक एक प्रशिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञ है और वह गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए किसी महिला की मानसिक स्थिति का आकलन नहीं कर सकता है।

इस पर पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय जाइए। वैसे भी, आप एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दे रहे हैं कि ये सुरक्षा महिलाओं को नहीं दी जानी चाहिए। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता सक्षम उच्च न्यायालय में जाने में सक्षम होने के लिए याचिका वापस लेना चाहता है। याचिका वापस ली गई मानकर खारिज की जाती है।

पिछले साल जुलाई में दिए गए एक महत्वपूर्ण आदेश में, शीर्ष अदालत ने अविवाहित महिलाओं को शामिल करने के लिए एमटीपी अधिनियम के दायरे का विस्तार किया था और 25 वर्षीय महिला को सहमति से संबंध से उत्पन्न 24 सप्ताह के गर्भ को गिराने की अनुमति दी थी।
 

SC ने दिल्ली सरकार को अध्यादेश के बजाय सेवाओं पर कानून को चुनौती देने वाली याचिका में संशोधन करने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली सरकार को राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं को नियंत्रित करने में निर्वाचित आप सरकार पर उपराज्यपाल की प्रधानता स्थापित करने वाले केंद्र सरकार के अध्यादेश को चुनौती देने वाली अपनी याचिका में संशोधन करने की अनुमति दी। अध्यादेश के स्थान पर कानून बनने के बाद याचिका में संशोधन करना जरूरी हो गया था। शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी की दलीलों पर ध्यान दिया कि पहले चुनौती उस अध्यादेश के खिलाफ थी जो अब संसद के दोनों सदनों से पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद कानून बन गया है।

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, अंतरिम आवेदन उस रिट याचिका में संशोधन की मांग करता है जिसके द्वारा एनसीटी अध्यादेश को चुनौती दी गई थी। अब, इसे एक अधिनियम (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2023) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है। हमने वकील की बात सुनी है। सॉलिसिटर जनरल का कहना है कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। संशोधन के लिए आवेदन की अनुमति है। जवाबी हलफनामा (केंद्र का जवाब) यदि कोई हो, तो चार सप्ताह के भीतर दाखिल किया जा सकता है।

संसद ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2023 को मंजूरी दी है, जिसे दिल्ली सेवा विधेयक भी कहा जाता है। इसके तहत उपराज्यपाल को सेवा मामलों पर व्यापक नियंत्रण का अधिकार दिया गया है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद यह विधेयक कानून बन गया है। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने केंद्र के 19 मई के अध्यादेश को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था, जिसने शहर की व्यवस्था से सेवाओं पर नियंत्रण छीन लिया था और दो सत्ता केंद्रों के बीच एक नया विवाद शुरू कर दिया था।

ट्रांसजेंडरों के लिए आरक्षण की मांग वाली याचिका पर  मांगा जवाब 
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए आरक्षण की मांग करने वाली याचिका पर शुक्रवार को केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ केरल के एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

जब याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ से कहा कि याचिका में सरकारी रोजगार और शिक्षा में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए आरक्षण की मांग की गई है, तो पीठ ने शुरू में उनसे कहा कि आप उच्च न्यायालय क्यों नहीं जाते? हर कोई (अनुच्छेद) 32 के तहत क्यों आता है? आप उच्च न्यायालय का रुख करें।

वकील ने तब पीठ से कहा कि उन्होंने शीर्ष अदालत का रुख किया है क्योंकि याचिका में सभी राज्यों को पक्षकार बनाया गया है, जिसके बाद अदालत नरम हुई और नोटिस जारी किए। संविधान का अनुच्छेद 32 भारतीय नागरिकों को उचित कार्यवाही के माध्यम से अपने मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सीधे शीर्ष अदालत में जाने का अधिकार देता है।

जी-20 शिखर सम्मेलन के मद्देनजर 8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में छुट्टी रहेगी
शीर्ष अदालत द्वारा जारी एक अधिसूचना में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट आठ सितंबर को बंद रहेगा और भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने राष्ट्रीय राजधानी में जी20 शिखर सम्मेलन के मद्देनजर शुक्रवार को छुट्टी की घोषणा की। जी20 शिखर सम्मेलन 9 और 10 सितंबर को दिल्ली में होगा। 

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जारी एक अधिसूचना में कहा गया है कि सीजेआई ने कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा जारी 24 अगस्त के कार्यालय ज्ञापन पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत के लिए आठ सितंबर को अवकाश घोषित किया है। कार्मिक मंत्रालय द्वारा गुरुवार को जारी एक आदेश के अनुसार, जी20 शिखर सम्मेलन के मद्देनजर राष्ट्रीय राजधानी में सभी केंद्र सरकार के कार्यालय 8 से 10 सितंबर तक बंद रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से प्रीति चंद्रा द्वारा डोमिनिकन गणराज्य की नागरिकता छोड़ने पर अपना रुख बताने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी यूनिटेक के पूर्व प्रवर्तक संजय चंद्रा की पत्नी प्रीति चंद्रा की ओर से डोमिनिकन गणराज्य की नागरिकता छोड़ने पर केंद्र सरकार से उसका रुख बताने को कहा है। प्रीति अपनी भारतीय नागरिकता की बहाली भी चाहती हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा था कि दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में प्रीति ने डोमिनिकन गणराज्य की अपनी नागरिकता छोड़ने का फैसला किया था, साथ ही उन्होंने कहा था कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह राज्यविहीन न हो जाएं, उन्हें भारतीय नागरिकता दी जानी चाहिए। पीठ ने कहा था कि वह भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करेगी और आवेदन पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि डोमिनिकन रिपब्लिक की नागरिकता आपको (चंद्रा को) छोड़नी होगी, क्योंकि मुझे भी पता है कि केमैन आइलैंड्स और अन्य चीजों में कितना पैसा विदेश गया है। सौभाग्य से, हमारे आदेशों के कारण यह सब सामने आया।

शुक्रवार को प्रीति के वकील ने कहा कि डोमिनिकन रिपब्लिक की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन हमने एक अखबार में एक विज्ञापन दिया है जिसमें कहा गया है कि उसने डोमिनिकन रिपब्लिक की नागरिकता छोड़ दी है। इसके बाद अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ईसी) और केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से इस मुद्दे पर निर्देश लेने को कहा और सुनवाई स्थगित कर दी।

शीर्ष अदालत ने चार अगस्त को मामले में प्रीति को जमानत देने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था और राहत को रद्द करने की मांग करने वाली ईडी की याचिका को खारिज कर दिया था।

आपराधिक मामले में आरोपी परीक्षण पहचान परेड के लिए बाध्य : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत जांच के दौरान परीक्षण पहचान परेड (टीआईपी) के लिए जाना बाध्यता है। इससे किसी तरह के सांविधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है।

जस्टिस एमएम सुंद्रेश और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने एक फैसले में यह टिप्पणी की जिसमें उसने हत्या के एक मामले में दोषी की अपील खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि टीआईपी संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत एक अभियुक्त के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है, जिसमें यह प्रावधान है कि किसी भी आरोपी को अपने खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। पीठ ने कहा, केवल टीआईपी में शामिल होने का मतलब खुद के खिलाफ गवाह बनना नहीं है।

पीठ इस सवाल पर विचार कर रही थी कि क्या कोई आरोपी इस आधार पर टीआईपी में भाग लेने से इन्कार कर सकता है कि उसे टीआईपी में हिस्सा लेने से पहले ही चश्मदीदों को दिखाया गया था। ऐसी स्थिति में टीआईपी का हिस्सा बनना उसके लिए खुद के खिलाफ गवाह बनने से कम नहीं होगा। शीर्ष अदालत ने हत्या के मामले में निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ मुकेश सिंह नामक दोषी की अपील खारिज कर दी। निचली अदालत ने मुकेश सिंह और दो अन्य को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

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