SC Updates: शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने स्वराज अभियान की एक याचिका से किया खुद को अलग, जानें पूरा मामला
स्वराज अभियान ने याचिका में कहा कि वर्तमान में देश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के तहत काम करने वाले करोड़ों श्रमिकों के सामने गंभीर संकट है। उनकी बकाया मजदूरी बढ़ रही है और अधिकतर राज्यों में ऋण शेष भी बढ़ रहा है।
विस्तार
इसलिए अलग हुए न्यायाधीश
यह मामला शुक्रवार को न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। इस पर न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि वह इस मामले में बतौर वकील पेश हुए हैं और मामले को नई पीठ के गठन के लिए प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के समक्ष रखना होगा। बता दें, न्यायमूर्ति नरसिम्हा को कॉलेजियम की सिफारिश पर बार से सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया था। याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण पेश हुए।
याचिका में यह कहा गया
स्वराज अभियान ने याचिका में कहा कि वर्तमान में देश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (मनरेगा) के तहत काम करने वाले करोड़ों श्रमिकों के सामने गंभीर संकट है। उनकी बकाया मजदूरी बढ़ रही है और अधिकतर राज्यों में ऋण शेष भी बढ़ रहा है। 26 नवंबर, 2021 की स्थिति के अनुसार, राज्य सरकारें 9,682 करोड़ रुपये की कमी का सामना कर रही हैं और वर्ष के लिए आवंटित धन का 100 प्रतिशत वर्ष के समापन से पहले ही समाप्त हो गया है।
मनरेगा मजदूरी भुगतान पर शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए स्वराज अभियान ने कहा, ‘धन की कमी का यह बहाना कानून का घोर उल्लंघन है।' याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र स्थापित करने के लिए निर्देश जारी किए जाएं कि राज्यों के पास अगले महीने के लिए कार्यक्रम को लागू करने के वास्ते पर्याप्त धन हो। जिस महीने की मांग पिछले साल में सबसे अधिक थी, उसे आधार महीने के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिसके लिए राज्य सरकार को अग्रिम रूप से न्यूनतम धन प्रदान किया जाना चाहिए।
भुगतान सुनिश्चित करने के लिए...
इस याचिका में केंद्र और राज्यों को ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा 31 मई, 2013 को जारी निर्देश का पालन करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है कि श्रमिक प्रौद्योगिकियों के माध्यम से काम के लिए अपनी मांग दर्ज करने में सक्षम हों और इसके लिए दिनांकित पावती रसीद प्राप्त कर सकें। इसके अलवा, यह कहा गया कि केंद्र और राज्यों को ‘वार्षिक मास्टर परिपत्र’ के प्रावधानों का पालन करने और उन श्रमिकों को बेरोजगारी भत्ते का स्वचालित भुगतान सुनिश्चित करने के लिए एक निर्देश भी जारी किया जाए, जिन्हें काम प्रदान नहीं किया गया है।
इसमें कहा गया है, ‘केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया जाए कि आज की तारीख में लंबित सभी बकाया वेतन, सामग्री और प्रशासनिक भुगतान का अगले 30 दिनों के भीतर निपटान किया जाए।’
याचिका में अधिकारियों को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि वे मनरेगा में निर्धारित मजदूरी के भुगतान में देरी के लिए क्षतिपूर्ति का भुगतान सुनिश्चित करें और साथ ही बकाया मजदूरी के सभी लंबित भुगतानों को भी निपटाएं।
तत्कालीन गैर सरकारी संगठन स्वराज अभियान ने 2015 में शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका दायर कर ग्रामीण गरीबों और किसानों के लिए विभिन्न राहतों की मांग की थी और बाद में उस याचिका में अंतरिम आवेदन दिया था।
स्वामी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का अहम सवाल, अब 29 अप्रैल से सुनवाई
गौरतलब है कि 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने 42वां संविधान संशोधन किया था। इसके तहत संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द शामिल किए गए थे।
CJI की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा- हाईकोर्ट जज के खिलाफ कार्रवाई पर विचार नहीं
हाईकोर्ट में नहीं, सुप्रीम कोर्ट में होगी याचिकाओं पर सुनवाई
बता दें कि बीते 29 जनवरी को कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित सभी याचिकाएं, सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास स्थानांतरित कर ली थीं। मामला पश्चिम बंगाल में आरक्षित श्रेणी की एमबीबीएस सीटों पर जाति प्रमाण पत्र के कथित घोटाले का है। कथित घोटाले की सीबीआई जांच कराने पर हाईकोर्ट की खंडपीठ और एकल पीठ में मतभेद सामने आया था। जस्टिस अभिजीत की एकल पीठ ने खंडपीठ के आदेश को पलट दिया था। अब शीर्ष अदालत इस पहलू पर विचार कर रही है कि क्या दो जजों की पीठ के आदेश को एकल पीठ के आदेश से निरस्त किया जा सकता है।
आजीवन कारावास का मतलब व सजा माफी की स्थिति स्पष्ट करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करेगा शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है जिसमें यह जानने की मांग की गई है कि क्या उम्रकैद की सजा का मतलब पूरी जिंदगी होगी। यह याचिका 2006-07 में हत्या कर तिहाड़ जेल के बाहर सिर कटी लाशें रखने के दोषी चंद्रकांत झा ने दाखिल की है। झा ने याचिका में यह जानने की मांग की है कि क्या ‘आजीवन कारावास’ की विशिष्टता का मतलब पूरे जीवन के लिए होगा। या फिर क्या इसे आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432 की शक्तियों से कम या माफ किया जा सकता है। सीआरपीसी की धारा 432 सजा निलंबित करने या कम करने की शक्ति से जुड़ी है।
जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने झा की याचिका पर दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। झा को तीन हत्याओं का दोषी ठहाराया गया था। वकील ऋषि मल्होत्रा के जरिये दायर याचिका में झा ने कहा कि उसे धारा 302 (हत्या) और 201 (अपराध के सबूतों को गायब करना) के तहत दोषी ठहराया गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे निचली अदालत से मिली मौत की सजा को कम कर इसे आजीवन कारावास में बदल दिया था। लेकिन इसमें शर्त थी कि आजीवन कारावास की सजा का मतलब याचिकाकर्ता के जीवन की पूरी अवधि होगी। याचिका में कहा गया कि यहां यह उल्लेख जरूरी है कि आईपीसी की धारा 302 में स्पष्ट रूप से दो दंडों का उल्लेख है। एक है मौत की सजा और दूसरा है आजीवन कारावास। इन दोनों के अलावा इसमें किसी अन्य सजा का जिक्र नहीं है। इसमें कहा गया कि विधायिका ने जानबूझकर आईपीसी की धारा 302 में संशोधन करने और सिर्फ जीवन के बजाय प्राकृतिक जीवन को जोड़ने का इरादा नहीं किया है। इसलिए, कानून इस बात पर विचार नहीं करता है कि जीवन का मतलब सिर्फ प्राकृतिक है। पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इसे इसी तरह का मुद्दा उठाने वाली एक अलग याचिका के साथ टैग कर दिया।
केंद्र के पास राज्य के ऋण को नियंत्रित करने की शक्ति नहीं : केरल
केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि संविधान केंद्र सरकार को किसी भी राज्य के ऋण को नियंत्रित करने की कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है। केरल सरकार का यह जवाब भारत के अटॉर्नी जनरल (एजी) के लिखित नोट पर आया है। केरल सरकार ने याचिका दायर कर राज्य की उधार लेने की शक्तियों पर केंद्र सरकार की ओर से लगाई गई सीमाओं को चुनौती दी गई है। अटॉर्नी जनरल ने अपने नोट में राष्ट्र की व्यापक आर्थिक स्थिरता की रक्षा के लिए राज्य के ऋण को नियंत्रित करने की शक्ति का बचाव किया था। केंद्र के रुख पर पलटवार करते हुए केरल राज्य ने कहा, एजी के नोट में उठाए गए गंभीर सांविधानिक मुद्दों को छुआ नहीं गया है। उनके नोट में अधिकतर बयानबाजी है। केरल राज्य का कहना है कि नोट में राज्य के वित्तीय प्रबंधन के बारे में अदूरदर्शी और भ्रामक तरीके से अपमानजनक बयान दिए गए हैं, जबकि वे याचिका में शामिल मुद्दा नहीं हैं।
एजी ने दिये थे ये तर्क
एजी के नोट में कहा गया था कि राज्यों के ऋण देश की ‘क्रेडिट रेटिंग’ को प्रभावित करती है। इसके अलावा अगर कोई राज्य कर्ज चुकाने में विफल रहता है तो प्रतिष्ठा संबंधी समस्याएं पैदी होगी। इससे पूरे भारत की वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ेगी। अनियंत्रित ऋण से निजी उद्योगों की ऋण लागत बढ़ जाएगी। बाजार में वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन व आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।