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श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद: तीन अक्तूबर को सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती

Tue, 26 Sep 2023 01:25 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Tue, 26 Sep 2023 01:25 PM IST
सार

बीते दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जन्मभूमि विवाद से संबंधित सभी याचिकाओं को जिला अदालत, मथुरा से अपने पास स्थानांतरित करा लिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद संबंधी याचिका पर सुनवाई के लिए तीन अक्तूबर की तारीख तय की है। बता दें कि बीते दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जन्मभूमि विवाद से संबंधित सभी याचिकाओं को जिला अदालत, मथुरा से अपने पास स्थानांतरित करा लिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। 
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मई में जन्मभूमि विवाद से जुड़ी सभी याचिकाएं अपने पास स्थानांतरित कराईं थी। हाईकोर्ट ने एक याचिका पर यह फैसला दिया था, जिसमें मांग की गई थी कि यह मामला राष्ट्रीय महत्व का है, इसलिए हाईकोर्ट में इस मामले पर सुनवाई होनी चाहिए। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद 13.37 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक से जुड़ा है। जिसमें से 10.9 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मस्थान की है, वहीं ढाई एकड़ जमीन का मालिकाना हक शाही ईदगाह मस्जिद के पास है। हिंदू पक्ष का कहना है कि शाही ईदगाह मस्जिद को अवैध तरीके से कब्जा करके बनाया गया है। हिंदू पक्ष की मांग है कि शाही ईदगाह मस्जिद को हटाया जाए। 
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हरियाणा में जूनियर सिविल जजों की भर्ती जल्द करने का सुप्रीम कोर्ट  ने दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हरियाणा में जूनियर सिविल जज के पद के लिए 275 रिक्तियों को भरने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हुए राज्य को भर्ती सुनिश्चित करने के लिए दो सप्ताह के भीतर आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हरियाणा में जूनियर सिविल जजों की भर्ती एक समिति करेगी, जिसके सदस्य पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के तीन जज, राज्य के मुख्य सचिव, राज्य के एडवोकेट जनरल और हरियाणा लोक सेवा आयोग के चेयरमैन होंगे।

सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने हरियाणा सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने उसके जारी निर्देश के अनुरूप चयन प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति देने का आग्रह किया था। पीठ ने कहा कि समिति में हाईकोर्ट के तीन जजों पर फैसला चीफ जस्टिस करेंगे। पीठ ने यह भी कहा कि तीन जजों में चीफ जस्टिस भी शामिल हो सकते हैं। पीठ ने 2007 के बाद से जारी भर्ती प्रक्रिया का पालन करने के लिए कहा है। जजों की कमी पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जूनियर सिविल जज की रिक्तियों को जल्द भरने का आदेश दिया है। दरअसल, चयन परीक्षा आयोजित करने के अधिकार को लेकर हरियाणा सरकार और पंजाब एवम हरियाणा हाईकोर्ट में पिछले कुछ समय से विवाद चल रहा था। इस खींचतान के बाद हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि वह उसके जारी निर्देश के अनुरूप दो सप्ताह के भीतर चयन प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश पारित करे। हरियाणा राज्य ने गुहार लगाई थी कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कैडर में भर्ती हरियाणा लोक सेवा आयोग द्वारा पंजाब सिविल सेवा (न्यायिक शाखा) नियम, 1951 (हरियाणा राज्य पर लागू) के भाग सी में निर्धारित प्रावधानों के अनुसार की जा सकती है।

वकीलों और बार निकायों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत  
वकीलों और बार निकायों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले सप्ताह एक श्रवणबाधित वकील को सांकेतिक भाषा दुभाषिया के माध्यम से एक मामले पर बहस करने की अनुमति देने को एक स्वागत योग्य कदम बताया है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश सी अग्रवाल ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "यह एक बहुत अच्छा कदम है और बार एसोसिएशन शीर्ष अदालत के इस कदम का स्वागत करता है। इससे विशेष रूप से विकलांग वकीलों और वादियों का मनोबल बढ़ेगा, जो अब अदालत के समक्ष बहस करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।"

गौरतलब है कि 22 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने विकलांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) के अधिकारों से संबंधित एक मामले में सांकेतिक भाषा दुभाषिया सौरव रॉय चौधरी के माध्यम से श्रवण बाधित वकील सारा सनी की सुनवाई की थी।  

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शीर्ष कोर्ट ने बिना मुहर लगे मध्यस्थता समझौतों पर फैसले की शुद्धता पर पुनर्विचार करने के लिए सात-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिये गये फैसले की सत्यता पर पुनर्विचार करने का मुद्दा सात न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया। इसमें कहा गया था कि बिना मुहर लगे मध्यस्थता समझौते कानून में लागू नहीं किये जा सकते। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने एक सुधारात्मक याचिका पर विचार करते हुए यह आदेश पारित किया। इसमें इस साल 25 अप्रैल को दिए गए पांच न्यायाधीशों की पीठ के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता के बारे में मामला उठाया गया था। अब मामले को 11 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

पीएमएलए मामले को लेकर दायर समीक्षा याचिका पर सुनवाई के लिए विशेष पीठ का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखने वाले शीर्ष अदालत के जुलाई 2022 के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई के लिए जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ का गठन किया है। यह पीठ इस मामले की सुनवाई 18 अक्टूबर से करेगी।

जस्टिस संजय किशन कौल ने यह खुलासा भारत राष्ट्र समिति की नेता के कविता को प्रवर्तन निदेशालय की ओर से जारी समन से संबंधित मामले को स्थगित करते हुए किया। नवंबर 2017 में जस्टिस रोहिंटन नरीमन और जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने पीएमएलए की धारा 45(1) को इस हद तक रद्द कर दिया था कि इसमें मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपियों को जमानत देने के लिए दो अतिरिक्त शर्तें लगाई गई थीं।

शीर्ष अदालत ने तब यह समझाने के लिए विभिन्न उदाहरण पेश दिए थे कि कैसे दोनों स्थितियां स्पष्ट रूप से मनमानी और भेदभावपूर्ण थीं। हालांकि इस फैसले को जुलाई 2022 में जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ के मामले में खारिज कर दिया था। इस फैसले में पीठ ने पीएमएलए के प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखा था।

 अब्दुल्ला आजम खां के जुवेनाइल दावे की जांच करे जिला अदालत: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मुरादाबाद जिला कोर्ट से सपा नेता आजम खां के बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला आजम खां के 2008 के आपराधिक मामले के वक्त जुवेनाइल होने के दावे की जांच करने का निर्देश दिया है। इस मामले में सजा के बाद अब्दुल्ला आजम खां की विधायकी चली गई थी। जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने जिला जज को खां के दावों की जांच करने और जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) कानून में तय प्रक्रिया के आधार पर निष्कर्ष देने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट अब जिला जज की रिपोर्ट मिलने के बाद इस मामले में सुनवाई करेगा। 2008 में अब्दुल्ला आजम खां और उनके पिता आजम खां के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 341 (गलत तरीके से रोकना) और 353 (लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल) के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि पुलिस के जांच के लिए उनके वाहन को रोकने के बाद उन्होंने यातायात अवरुद्ध कर दिया था। फरवरी में, अब्दुल्ला आजम खां को इस मामले में मुरादाबाद की एक अदालत ने दो साल की जेल की सजा सुनाई थी, जिसके कारण उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। खां ने इस सजा को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

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