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Supreme Court: 'दोषी प्रतीत होने पर कार्यवाही कोर्ट का हक'; अदालत ने अधिकार के प्रयोग में सावधानी पर दिया जोर
Thu, 17 Jul 2025 02:47 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Thu, 17 Jul 2025 02:47 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को किसी मामले में दोषी प्रतीत हो रहे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करने का अधिकार है, भले ही उसका नाम एफआईआर या आरोपपत्र में शामिल न हो। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इस अधिकार का प्रयोग बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए, किसी को परेशान करने के हथियार के रूप में नहीं।
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जस्टिस संजय करोल और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बुधवार को पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 319 से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रही थी। धारा 319 किसी अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति से संबंधित है। पीठ ने कहा कि यह प्रावधान न्यायालय को उस व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करने का अधिकार देता है जिसकी संलिप्तता जांच या सुनवाई के दौरान एकत्रित साक्ष्य के आधार पर सामने आती हो, भले ही उसे मामले में आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया हो। पीठ ने यदि साक्ष्य उसे दोषी साबित करते हैं तो उसे भी अभियुक्त भी बनाया जा सकता है।
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अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए शक्ति का प्रयोग
पीठ ने आगे कहा, यह कहने की जरूरत नहीं है कि शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, न कि लापरवाही, निर्दयता या लापरवाही के साथ, क्योंकि इसका उद्देश्य केवल न्याय को आगे बढ़ाना है, न कि किसी व्यक्ति को परेशान करने या कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का साधन बनना है। शीर्ष अदालत ने यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के पिछले साल जुलाई के एक आदेश के खिलाफ दायर पर अपील पर सुनाया। हाईकोर्ट ने 2017 के एक हत्या के मामले में धारा 319 के तहत एक व्यक्ति के खिलाफ कौशांबी के एक ट्रॉयल कोर्ट की ओर से जारी समन को रद्द कर दिया था।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द
मौजूदा मामले पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि तीन कथित चश्मदीद गवाहों के साक्ष्य से प्रथम दृष्टया राजेंद्र प्रसाद की मिलीभगत का पता चलता है, जिसे सीआरपीसी की धारा 319 के तहत ट्रायल कोर्ट ने तलब किया था। मामले के शिकायतकर्ता शिव बरन (मृतक के भाई) की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को बहाल कर दिया। पीठ ने सभी पक्षों को 28 अगस्त को ट्रायल कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया और 18 महीने के भीतर मुकदमा पूरा करने का आदेश दिया।