सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स: जेट एयरवेज के पूर्व कर्मचारियों को मिलेगा पीएफ: फैमिली कोर्ट जजों की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जेट एयरवेज के पूर्व कर्मचारियों और कामगारों के प्रोविडेंट फंड (PF) और ग्रेच्युटी के बकाये का पूरा भुगतान करने के NCLAT के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की अपील खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि अपील में कानून से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण और विचारणीय मुद्दे हैं, लेकिन मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए वह NCLAT के 30 जून के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।
हालांकि, कानून से जुड़े प्रश्नों को भविष्य में उचित मामले में विचार के लिए खुला रखा गया है। NCLAT ने NCLT के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें जेट एयरवेज के लिक्विडेटर को कर्मचारियों के PF और ग्रेच्युटी बकाये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। SBI समेत आठ वित्तीय लेनदारों ने इसका विरोध किया था।
लेंडर्स का तर्क था कि PF, ग्रेच्युटी और पेंशन की देनदारियां लिक्विडेशन एस्टेट का हिस्सा होनी चाहिए और IBC के तहत अन्य लेनदारों के बीच वितरित की जानी चाहिए। NCLAT ने कहा कि कर्मचारियों की वैधानिक देनदारियां लिक्विडेशन एस्टेट से बाहर रहेंगी और उन्हें अन्य लेनदारों के दावों से सुरक्षा मिलेगी। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने जेट एयरवेज के लिक्विडेशन का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सदस्यों के कार्यकाल से जुड़े मामले की सुनवाई 8 सितंबर से पहले करने पर सोमवार को सहमति जताई। यह मामला पहले 15 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने NGT बार एसोसिएशन की ओर से जताई गई चिंता के बाद सुनवाई जल्द करने पर सहमति दी।
NGT बार एसोसिएशन की ओर से पेश वकील ने पीठ को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सदस्यों के कार्यकाल को केवल 8 सितंबर तक बढ़ाया है। इसके बाद दक्षिणी क्षेत्र और पश्चिमी क्षेत्र समेत तीन जोनल बेंच के कामकाज पर असर पड़ सकता है। वकील ने कहा कि NGT अधिनियम के तहत एक सदस्य वाली बेंच का प्रावधान नहीं है। ऐसे में अगर सदस्यों का कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया गया या नई नियुक्तियां नहीं हुईं तो संबंधित बेंच काम नहीं कर पाएंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के सात फैमिली कोर्ट जजों की उस याचिका पर विचार करने से सोमवार को इनकार कर दिया, जिसमें उन्हें हाईकोर्ट के जज के रूप में पदोन्नति के लिए विचार किए जाने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि समस्या फैमिली कोर्ट के लिए अलग कैडर बनाए जाने से जुड़ी है।
पीठ ने कहा कि पहले के फैसलों में इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है। अदालत ने कहा कि जब तक परिस्थितियों या कानूनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं होता, तब तक पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता संबंधित हाईकोर्ट और राज्य सरकार से फैमिली कोर्ट के पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति के नियमों में बदलाव की मांग कर सकते हैं। अदालत ने इसे मुख्य रूप से नीतिगत मामला बताया।
शीर्ष अदालत के पहले के फैसले के मुताबिक फैमिली कोर्ट के जज सामान्य अर्थ में जज हो सकते हैं, लेकिन वे राज्य की न्यायिक सेवा का हिस्सा नहीं हैं और संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत ‘न्यायिक पद’ धारण करने वाले नहीं माने जाते। इसलिए उन्हें हाईकोर्ट में पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे फैमिली कोर्ट में न्यायिक कार्य करते हैं और भारत के क्षेत्र में ‘न्यायिक पद’ पर हैं। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत उन्हें हाईकोर्ट के जज पद पर नियुक्ति के लिए विचार किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने कहा कि मामला संविधान के अनुच्छेद 217 की व्याख्या से जुड़ा है।
अदालतों के आधुनिकीकरण के लिए न्यायिक ढांचे की समिति ने सौंपी कार्ययोजना
सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की ओर से गठित उच्चस्तरीय न्यायिक ढांचा समिति ने देशभर की अदालतों के आधुनिकीकरण के लिए कार्ययोजना वाली अंतरिम रिपोर्ट सोमवार को उन्हें सौंप दी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली न्यायिक ढांचा सलाहकार समिति ने 12 मई को गठन के करीब चार महीने बाद यह रिपोर्ट सौंपी है। समिति में कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति देबांग्शु बसाक, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और बंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरसन शामिल हैं। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के महानिदेशक सतींदर पाल सिंह और सुप्रीम कोर्ट के महासचिव भारत पाराशर, जो समिति के सदस्य सचिव भी हैं, भी इसका हिस्सा थे। समिति का गठन विभिन्न हाईकोर्ट और जिला अदालतों की अलग-अलग ढांचागत जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया गया था।
आधुनिक अदालत परिसरों से लेकर ई-न्याय व्यवस्था तक पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि समिति ने अदालतों की ढांचागत कमियों को दूर करने के लिए सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहयोग हासिल करने पर आधारित खाका तैयार किया है। इसमें न्यायाधीशों, अदालत कर्मचारियों, वकीलों, वादकारियों और आगंतुकों के लिए जरूरी सुविधाओं की पहचान करना, अदालतों के कंप्यूटरीकरण के लिए ई-कोर्ट पहल के तहत उपाय सुझाना, नागरिक केंद्रित सेवाओं के जरिए न्याय व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाना और डिजिटल खाई पाटने के कदम शामिल हैं। समिति ने आधुनिक अदालत परिसरों की स्थापना और न्यायिक व प्रशासनिक कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों में सुधार के उपायों पर भी विचार किया। मई में समिति के गठन के समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इसका उद्देश्य देशभर में एकीकृत ढांचागत व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें हाईकोर्ट और जिला अदालतों की अलग-अलग जरूरतों का ध्यान रखा जाए। अंतरिम रिपोर्ट पर CJI आगे विचार करेंगे और इसके आधार पर केंद्र तथा राज्य सरकारों के साथ न्यायिक ढांचे के लिए धन आवंटन को लेकर चर्चा की जाएगी।