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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट से NCB को मिली आधी राहत, कलकत्ता हाईकोर्ट की तरफ से लगाई गई जुर्माने की राशि घटाई
Thu, 03 Jul 2025 05:09 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 03 Jul 2025 05:09 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीबी की लापरवाही को गंभीरता से लिया और जुर्माना तो बरकरार रखा, लेकिन राशि कम कर दी। साथ ही अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया, बल्कि सरकार को जुर्माना भरने का निर्देश दिया।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट की तरफ से लगाए गए एक लाख रुपये के जुर्माने को चुनौती दी गई थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह राशि घटाकर ₹50,000 कर दी। न्यायमूर्ति एम एम सुंद्रेश और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार की उस अपील पर यह आदेश दिया जिसमें हाईकोर्ट के 16 जून, 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी।
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने क्यों लगाया था जुर्माना?
हाईकोर्ट ने यह जुर्माना इसलिए लगाया था क्योंकि एनसीबी ने एक मामले में बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अपील करने में देरी की थी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि यह राशि एक सप्ताह के भीतर पश्चिम बंगाल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, कोलकाता को दी जाए। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने कहा था कि यह रकम एनसीबी के उन अधिकारियों से वसूली जाए जो अपील तैयार करने और दायर करने की प्रक्रिया में शामिल थे।
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'NCB या सरकार की तरफ से जमा की जाएगी'
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब यह राशि एनसीबी यानी सरकार की तरफ से जमा की जाएगी, न कि व्यक्तिगत अधिकारियों से। पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से कहा, 'या तो आपके वकील की गलती है या आपके अधिकारी की। इनमें से एक तो जरूर जिम्मेदार है।' इस सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि ऐसे मामलों में अपील दायर करने में देरी कई बार होती है और यह चिंताजनक है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस पर कुछ मार्गदर्शन देने का आग्रह किया।
यह भी पढ़ें - Justice Varma Cash Row: जस्टिस वर्मा पर गिर सकती है गाज, संसद में पेश होगा हटाने का प्रस्ताव
इस पर पीठ ने कहा, 'आपकी एक जिम्मेदारी होती है वकील के तौर पर। अगर अधिकारी आपके पास समय से नहीं आते, तो आपको यह तय करना चाहिए कि क्या करना है। आप सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो आपके काम को सही ठहराए।' यह मामला एनडीपीएस अधिनियम से जुड़ा है और विशेष अदालत, बारासात के फैसले के खिलाफ अपील से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने कहा था कि एनसीबी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378(3) के तहत अपील की अनुमति लेनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना अनुमति के ही सरकारी अपील दायर कर दी। यह नियम नए 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' की धारा 419(3) के समकक्ष है।
हाईकोर्ट ने पहले 19 मई और फिर जून में भी इस गलती की ओर एनसीबी के वकील का ध्यान दिलाया था, लेकिन जब इस गलती को सुधारा नहीं गया, तो एनसीबी के वकील ने 16 जून को अपील वापस लेने की अनुमति मांगी। हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह बिना शर्त अपील वापस लेने देना न्यायहित में नहीं होगा, इसलिए एनसीबी पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, लेकिन जुर्माने की राशि को घटाकर ₹50,000 कर दिया है।
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने क्यों लगाया था जुर्माना?
हाईकोर्ट ने यह जुर्माना इसलिए लगाया था क्योंकि एनसीबी ने एक मामले में बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अपील करने में देरी की थी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि यह राशि एक सप्ताह के भीतर पश्चिम बंगाल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, कोलकाता को दी जाए। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने कहा था कि यह रकम एनसीबी के उन अधिकारियों से वसूली जाए जो अपील तैयार करने और दायर करने की प्रक्रिया में शामिल थे।
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'NCB या सरकार की तरफ से जमा की जाएगी'
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब यह राशि एनसीबी यानी सरकार की तरफ से जमा की जाएगी, न कि व्यक्तिगत अधिकारियों से। पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से कहा, 'या तो आपके वकील की गलती है या आपके अधिकारी की। इनमें से एक तो जरूर जिम्मेदार है।' इस सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि ऐसे मामलों में अपील दायर करने में देरी कई बार होती है और यह चिंताजनक है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस पर कुछ मार्गदर्शन देने का आग्रह किया।
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इस पर पीठ ने कहा, 'आपकी एक जिम्मेदारी होती है वकील के तौर पर। अगर अधिकारी आपके पास समय से नहीं आते, तो आपको यह तय करना चाहिए कि क्या करना है। आप सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो आपके काम को सही ठहराए।' यह मामला एनडीपीएस अधिनियम से जुड़ा है और विशेष अदालत, बारासात के फैसले के खिलाफ अपील से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने कहा था कि एनसीबी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378(3) के तहत अपील की अनुमति लेनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना अनुमति के ही सरकारी अपील दायर कर दी। यह नियम नए 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' की धारा 419(3) के समकक्ष है।
हाईकोर्ट ने पहले 19 मई और फिर जून में भी इस गलती की ओर एनसीबी के वकील का ध्यान दिलाया था, लेकिन जब इस गलती को सुधारा नहीं गया, तो एनसीबी के वकील ने 16 जून को अपील वापस लेने की अनुमति मांगी। हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह बिना शर्त अपील वापस लेने देना न्यायहित में नहीं होगा, इसलिए एनसीबी पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, लेकिन जुर्माने की राशि को घटाकर ₹50,000 कर दिया है।