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फर्जी बीमा दावों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: सभी राज्यों में एसआईटी बनाने का आदेश; आखिर कैसे हो रहा था फर्जीवाड़ा?
Wed, 26 Aug 2026 07:12 AM IST
निर्मल कांत
ब्यूरो, नई दिल्ली।
ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 26 Aug 2026 07:12 AM IST
सार
बड़े पैमाने पर फर्जी बीमा दावों के सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों में विशेष जांच दल बनाने का आदेश दिया है। एक ही वाहन को कई हादसों में दिखाने जैसे मामलों पर भी जांच होगी, शीर्ष कोर्ट ने क्या कहा? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
शीर्ष कोर्ट ने फर्जी बीमा दावों की जांच के लिए सभी राज्यों को विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि फर्जी बीमा दावे दाखिल किए जा रहे हैं और उन्हें मंजूर भी किया जा रहा है। एक ही वाहन को कई दुर्घटनाओं में दिखाया जाता है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी जो प्रारंभ में दुर्घटना में शामिल एक गाड़ी की पहचान से जुड़ा था।
पीठ ने कहा कि कार्यवाही के दौरान बहुत बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के संकेत मिले हैं और उसने देश भर में धोखाधड़ी वाले दावों की जांच करने के लिए मामले का दायरा बढ़ा दिया।
पीठ ने आदेश दिया, अदालत का मानना है कि यह बताना जरूरी है कि बीमा कंपनियों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे धोखाधड़ी वाले सभी दावे एसआईटी को भेजें। अगर यह पाया जाता है कि संबंधित राज्य की एसआईटी को मामले भेजने में भेदभाव किया गया है तो अदालत संबंधित बीमा कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएगी। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी वाले ऐसे दावों से न सिर्फ बीमा कंपनियों पर आर्थिक बोझ पड़ता है बल्कि अंत में असली ग्राहकों को भी अधिक किस्त देना पड़ सकता है।
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ये भी पढ़ें: 35 रुपये प्रति किलो मिलेगा प्याज: कांदा एक्सप्रेस के जरिये रियायती दरों पर आपूर्ति करने की कोशिश, योजना क्या?
'अधिकारियों की मिलीभगत पर विभागीय कार्रवाई करें'
पीठ ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि वे एसआईटी को पर्याप्त कर्मचारी दें और ऐसे मामलों की जांच के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी उपलब्ध कराएं। बीमा कंपनियों को यह भी निर्देश दिया कि अगर एसआईटी की सिफारिश या एफआईआर से उनके अधिकारियों की धोखाधड़ी वाले दावों में मदद करने की बात का पता चलता है तो वे बिना देरी किए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई करें। आदेश में बीमा कंपनियों से हलफनामा दाखिल करने को भी कहा गया जिसमें एसआईटी को भेजे गए मामलों और कंपनी के हितों के खिलाफ काम करने या धोखाधड़ी में मदद करने के संदेह वाले अधिकारियों के खिलाफ की गई आंतरिक कार्रवाई का विवरण हो।
उत्तर प्रदेश में गठित हो चुकी है एसआईटी
पीठ ने गौर किया कि उत्तर प्रदेश ने सुप्रीम कोर्ट के पहले आदेश के बाद ही एसआईटी का गठन कर लिया था। राज्य ने पीठ को बताया कि एसआईटी को 2,188 शिकायतें मिली थीं जिनमें 1,029 से ज्यादा की जांच हो चुकी है। 533 आरोपियों के खिलाफ 231 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।
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पीठ ने कहा कि कार्यवाही के दौरान बहुत बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के संकेत मिले हैं और उसने देश भर में धोखाधड़ी वाले दावों की जांच करने के लिए मामले का दायरा बढ़ा दिया।
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पीठ ने आदेश दिया, अदालत का मानना है कि यह बताना जरूरी है कि बीमा कंपनियों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे धोखाधड़ी वाले सभी दावे एसआईटी को भेजें। अगर यह पाया जाता है कि संबंधित राज्य की एसआईटी को मामले भेजने में भेदभाव किया गया है तो अदालत संबंधित बीमा कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएगी। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी वाले ऐसे दावों से न सिर्फ बीमा कंपनियों पर आर्थिक बोझ पड़ता है बल्कि अंत में असली ग्राहकों को भी अधिक किस्त देना पड़ सकता है।
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'अधिकारियों की मिलीभगत पर विभागीय कार्रवाई करें'
पीठ ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि वे एसआईटी को पर्याप्त कर्मचारी दें और ऐसे मामलों की जांच के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी उपलब्ध कराएं। बीमा कंपनियों को यह भी निर्देश दिया कि अगर एसआईटी की सिफारिश या एफआईआर से उनके अधिकारियों की धोखाधड़ी वाले दावों में मदद करने की बात का पता चलता है तो वे बिना देरी किए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई करें। आदेश में बीमा कंपनियों से हलफनामा दाखिल करने को भी कहा गया जिसमें एसआईटी को भेजे गए मामलों और कंपनी के हितों के खिलाफ काम करने या धोखाधड़ी में मदद करने के संदेह वाले अधिकारियों के खिलाफ की गई आंतरिक कार्रवाई का विवरण हो।
उत्तर प्रदेश में गठित हो चुकी है एसआईटी
पीठ ने गौर किया कि उत्तर प्रदेश ने सुप्रीम कोर्ट के पहले आदेश के बाद ही एसआईटी का गठन कर लिया था। राज्य ने पीठ को बताया कि एसआईटी को 2,188 शिकायतें मिली थीं जिनमें 1,029 से ज्यादा की जांच हो चुकी है। 533 आरोपियों के खिलाफ 231 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।