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राजनीति के निचले पायदान से सत्ता के शिखर तक ऐसे पहुंचे सोनोवाल
रीता तिवारी/ अमर उजाला, गुवाहाटी
Updated Sat, 21 May 2016 04:11 AM IST
सार
- राजनीतिक जीत साल 2005 में उस समय हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने अवैध आप्रवासी (आईएमडीटी) अधिनियम-1983 को खारिज कर दिया
- राजनीतिक कैरियर का ग्राफ किसी भी राजनेता के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है
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सोनोवाल
- फोटो : PTI
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विस्तार
असम में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्बानंद सोनोवाल ऐसे शख्स हैं, जो राजनीति के निचले पायदान से सत्ता के शिखर तक पहुंचे हैं। उनके राजनीतिक कैरियर का ग्राफ किसी भी राजनेता के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। सोनोवाल ने महज 30 साल की उम्र में असम गण परिषद (अगप) की छात्र शाखा अखिल असम छात्र संघ (आसू) के अध्यक्ष पद की कुर्सी संभाली थी और महज 23 साल के भीतर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। पार्टी ने चुनाव से पहले ही सोनोवाल को अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था।
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जोरहाट जिले की माजुली सीट से मैदान में उतरे सोनोवाल जोगेंद्र नाथ हजारिका के बाद राज्य के दूसरे आदिवासी मुख्यमंत्री होंगे। हजारिका साल 1979 में महज 94 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे थे। उसके बाद उनकी सरकार को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। राजनीति में सोनोवाल का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा है। गुवाहाटी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में ग्रेजुएट की डिग्री लेने वाले सर्बानंद ने डिब्रूगढ़ विवि. से एलएलबी की डिग्री भी ली है। सात साल (1992-99) तक आसू के अध्यक्ष रहने के दौरान उनको जातीय नायक यानी क्षेत्रीय हीरो का दर्जा दिया गया था। सोनोवाल साल 1999 में अगप के सदस्य बने और मोरान सीट से जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। साल 2004 के लोकसभा चुनावों में वह अपने पैतृक स्थान डिब्रूगढ़ संसदीय सीट से जीतकर संसद में पहुंचे। तब उन्होंने केंद्रीय मंत्री रानी नराह को हराया था। वह 2009 तक इसी सीट से सांसद रहे।
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वह अपने राजनीतिक कैरियर के शुरुआती दौर से ही बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर मुखर रहे। सोनोवाल की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत साल 2005 में उस समय हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने अवैध आप्रवासी (आईएमडीटी) अधिनियम-1983 को खारिज कर दिया। सोनोवाल की याचिका पर ही यह फैसला सुनाया गया था। तब तरुण गोगोई सरकार इस अधिनियम के समर्थन में थी। साल 2011 में वैचारिक मतभेदों के चलते सोनोवाल ने अगप से नाता तोड़ लिया। भाजपा में शामिल होने के फैसले से राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पारी की शुरूआत हुई। तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने सोनोवाल को पार्टी का महासचिव और राज्य भाजपा का प्रवक्ता बना दिया।
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एक साल के भीतर ही उनको प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के चुनाव अभियान की कमान सोनोवाल के हाथों में ही रही। सोनोवाल तब लखीमपुर सीट से चुने गए। उनको केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल कर लिया गया। बाद में जब असम विधानसभा चुनाव नजदीक आए, तो उनको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के भाजपा के फैसले पर किसी को हैरानी नहीं हुई। अपनी पार्टी की भारी जीत के बाद उनका कहना था कि नई सरकार राज्य के स्थानीय लोगों के अस्तित्व को बचाने की दिशा में काम करेगी, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के क्यों न हों। उन्होंने वृहत्तर असमिया समाज के गठन की भी अपील की है।