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पीके के सुझाव, आजाद की सिफारिश पर तय हुअा शीला का नाम

Fri, 15 Jul 2016 05:54 AM IST
शादाब रिजवी/ अमर उजाला, दिल्ली
शादाब रिजवी/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Fri, 15 Jul 2016 05:54 AM IST
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Sonia agrees on sheela after PK recommended her name
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शीला दीक्षित को यूपी में बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने का फैसला पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर के सुझाव और प्रभारी गुलाम नबी आजाद की सिफारिश के बाद अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की हां के बाद लिया गया।  

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शीला के नाम को हरिझंडी हालांकि दो दिन पहले राजबब्बर के अध्यक्ष के लिए नाम फाइनल होने के बाद मिली। कांग्रेस 27 साल पुराने अपने राजनीतिक गौरव को यूपी में हासिल करने को बेताब है। इसके लिए वह हर दांव खेलना चाहती है। जातपात की राजनाति से इनकार करने वाली पार्टी इसको भी अपनाने से गुरेज नहीं कर रही है। कांग्रेस अब जातिगत समीकरण के तहत ही सारी जिम्मेदरी सौंप रही है।
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कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक हाईकमान इस बात को लेकर परेशान था कि कही जिस तरह कमनलनाथ के पंजाब प्रभारी बनाने के बाद विवाद होने पर उन्हें जिम्मेदारी छोड़नी पड़ी थी, वहीं दिल्ली के टैंकर घोटाले में चार्जशीट होने और अब एसीबी की तरफ से इस मामले में समन कर 26 अगस्त को बयान देने के लिए बुलाने को विरोधी मुद्दा न बना दें। इससे पार्टी  की फजीहत हो जाएगी। 

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आक्रामक रुख अपनाकर ही यूपी में आगे बढ़ा जा सकता है

Sonia agrees on sheela after PK recommended her name
प्रशांत किशोर - फोटो : फाइल फोटो

बताया जा रहा है कि गुलाम नबी आजाद ने हाईकमान को सुझाव दिया कि आक्रामक रुख अपनाकर ही यूपी में आगे बढ़ा जा सकता है। आजाद की सिफारिश और प्रशांत किशोर के सुझाव पर प्रियंका गांधी ने सहमति जताई। दरअसल शीला दीक्षित को प्रियंका गांधी बेहद पसंद करती हैं।

इसके बाद राहुल और सोनिया गांधी ने सोमवार को शीला के नाम को हरिझंडी दिखा दी। सोमवार को जैसे ही राजबब्बर के नाम को अध्यक्ष के लिए तय किया गया तभी साफ हो गया था कि शीला को बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी। पहले अध्यक्ष ब्राह्मण बनाए जाने की बात चल रही थी, लेकिन बाद में संशोधन होते ही शीला को मुख्य चेहरा बनाने की बात कांग्रेस कार्यकर्ता करने लगे थे।

यूपी में  कांग्रेस का ढांचा बेहद कमजोर है। गांव तक संगठन नहीं है। कार्यकर्ता कम सिर्फ चंद नेता जिला स्तर पर रह गए है। कई जगह को ब्लाक स्तर की कमेटी तक पूरी नहीं हैं। जिला, ब्लाक आदि की बैठकों में गिनती के लोग शिरकत करते हैं।

उसमें भी गुटबाजी हावी है। आमजन यानि वोटर से कांग्रेस का जुड़ाव बिल्कुल नहीं हैं। इस सब को नए सिरे से खड़ा करने के लिए आजाद, बब्बर और शीला की तिगड़ी को जुटना होगा, यह काम बेहद आसान नहीं होगा। 

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