कृषि कानून बनाने से पहले प्रधानमंत्री ने किसानों को भरोसे में क्यों नहीं लिया - मेधा पाटकर
देश में 86 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम भूमि के मालिक हैं। जमीन की औसत मल्कियत दो एकड़ या उससे भी कम है। ऐसे में 86 फीसदी किसान अपनी उपज नजदीक के अनाज मंडी-सब्जी मंडी के अलावा कहीं दूसरी जगह पर ट्रांसपोर्ट के जरिए न तो ले जा सकता है और न ही बेच सकेगा...
देश में 86 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम भूमि के मालिक हैं। जमीन की औसत मल्कियत दो एकड़ या उससे भी कम है। ऐसे में 86 फीसदी किसान अपनी उपज नजदीक के अनाज मंडी-सब्जी मंडी के अलावा कहीं दूसरी जगह पर ट्रांसपोर्ट के जरिए न तो ले जा सकता है और न ही बेच सकेगा...
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देश में आज ऐसे हालात हो रहे हैं कि जिनमें न किसान बच सकता है और न ही मजदूर। मोदी सरकार कह रही है कि हमने किसानों के हित में कानून बनाए हैं तो दूसरी ओर किसान चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे हैं कि नहीं, ये हमारे हितों के खिलाफ हैं। ये कानून तो आपको फायदा पहुंचा सकते हैं और इनके जरिए कुछ मित्र उद्योगपतियों की तिजोरी भरेगी, ये भी तय है। किसान के घर कुछ नहीं जाएगा। जो पहले आता था, अब तो उसकी गारंटी भी नहीं रही।
सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की अध्यक्ष मेधा पाटकर का कहना है कि इसका जिम्मेदार कौन है। आपके सवाल का उत्तर ही मैं दे रही हूं। प्रधानमंत्री ने घोषणा की, लेकिन उनके और किसानों के बीच भरोसा तो बन ही नहीं पाया। बतौर पाटकर, पीएम मोदी ने देश के कौन से किसान से पूछकर ये कानून बनाए थे। किसी से नहीं पूछा गया। अब वही चूक उन्हें भारी पड़ रही है। किसान विरोधी कानून लाकर केंद्र सरकार ने अन्नदाता का जीवन छीनने का प्रयास किया है। दिल्ली पहुंच रहे किसानों पर बल प्रयोग हो रहा है।
किसान मार्च में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली आ रहीं सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के जत्थे को आगरा के निकट रोक लिया गया है। पाटकर का कहना है कि केंद्र सरकार को जब किसानों के हितों के लिए कानून बनाने थे तो उनसे पूछने में क्या गुरेज था। इस कानून को बनाने के लिए न ही राज्यों की सलाह ली गई। राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कोई बैठक नहीं बुलाई गई। केंद्र सरकार ने ऐसे 44 कानूनों को रद्द कर दिया है, जो किसानों के हितों के लिए लंबे समय से चले आ रहे थे। जब पीएम मोदी और उनकी सरकार खुद को किसानों का हितैषी कहती है तो ये कानून लाने से पहले किसानों से एक बार पूछ लेते। छिप छिपाकर कानून लाने की आवश्यकता क्यों पड़ गई। यहीं से भरोसा टूटता चल गया। सरकार अब भी खेती को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही। जब खेत नहीं रहेंगे तो किसान कहां जाएगा। अन्नदाता का हल या ट्रैक्टर खाली खड़ा होगा तो देश का पेट कहां से भरेगा, सरकार को ये सोचना चाहिए।
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के सदस्य अविक साहा ने बताया, केंद्र सरकार ने जो तीनों बिल संसद में पास कराए हैं, उनमें किसका लाभ छिपा है, ये बात किसान अच्छे से जानते हैं। किसान संगठन तो लंबे समय से यही मांग कर रहे थे कि एमएसपी ठीक से दे दो। जब ये बिल लोकसभा में पेश हो रहे थे, तब सरकार की तरफ से ही यह बताया गया था कि देश में एमएसपी का लाभ तो केवल छह फीसदी किसानों को ही मिल पाता है। किसानों को उनकी फसल का जायज दाम मिले, ये सरकार तय करती है। यहां फसल के दाम तय करने का अधिकार अब व्यापारियों को दे दिया गया है। मोदी सरकार, किसानों से जबरदस्ती यह कह रही है, तुम हां करो कि सरकार भले उन्हें फसल का उचित दाम नहीं दिला सकी, मगर उद्योगपति वह सब कर देंगे।
ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्यवान और एआईकेएससीसी के सदस्य रामपाल जाट के अनुसार, कृषि उपज व्यापार व कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) एक्ट, 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार एक्ट, 2020 एवं आवश्यक वस्तु (संशोधन) एक्ट 2020, ये तीनों कानून किसान विरोधी हैं। इनका सीधा सा मतलब है कि अब कृषि क्षेत्र सरकार के हाथों से निकलकर पूंजीपतियों के हाथों में चला जाएगा। मोदी दूसरी बार पीएम बने हैं। उन्होंने अपने दोनों लोकसभा चुनावों में किसानों से अनेक वादे किए थे।
एमएसपी के बारे में तो वे सार्वजनिक मंच पर न जाने कितनी बार बोल चुके हैं। किसानों ने दोनों लोकसभा चुनावों में उन्हें वोट भी दिया था। अब ऐसा अचानक क्या हो गया कि पीएम मोदी ने इतने अहम कानून लाते वक्त या उनमें बदलाव करने से पहले किसानों से पूछा तक नहीं। ड्राफ्ट तैयार हो गया और उसे संसद में पास भी करा लिया। जब किसानों के हितों के लिए वे कानून बना रहे थे तो कुछ किसानों से बात कर लेते। उस वक्त भरोसा बनता और किसानों के मुताबिक कानूनों में बदलाव होता तो आज दिल्ली में चारों तरफ किसानों को रोकने के लिए पुलिस नहीं लगानी पड़ती।
देश में 86 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम भूमि के मालिक हैं। जमीन की औसत मल्कियत दो एकड़ या उससे भी कम है। ऐसे में 86 फीसदी किसान अपनी उपज नजदीक के अनाज मंडी-सब्जी मंडी के अलावा कहीं दूसरी जगह पर ट्रांसपोर्ट के जरिए न तो ले जा सकता है और न ही बेच सकेगा। सरकार मंडी प्रणाली को नष्ट करने पर तुली है। इससे तो किसान खत्म हो जाएगा। मंडियां खत्म होने का असर केवल किसान पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि अनाज-सब्जी मंडी में काम करने वाले लाखों मजदूर, आढ़ती, ढुलाईदार, ट्रांसपोर्ट, शेलर व मुनीम का रोजगार भी खत्म होगा।