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सुप्रीम कोर्ट: हिरासत में लिया तो 24 घंटे में पेश करना होगा मजिस्ट्रेट के सामने, नहीं चलेगी पुलिस की मनमानी
Fri, 06 Nov 2026 05:50 AM IST
प्रशांत तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Fri, 06 Nov 2026 05:50 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के वास्तविक समय से ही 24 घंटे की समयसीमा शुरू होगी। औपचारिक गिरफ्तारी में देरी करके पुलिस इस अवधि को नहीं बढ़ा सकती। पूछताछ, तलाशी और जांच में लगा समय भी इसमें शामिल होगा।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
पुलिस अब किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाकर उसे 24 घंटे से ज्यादा समय तक अपनी कस्टडी में नहीं रख सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा पुलिस की ओर से औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से नहीं, बल्कि हिरासत में लेने के वास्तविक समय से शुरू होगी। केवल हिरासत के स्थान से मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में लगने वाला उचित यात्रा समय ही 24 घंटे की गणना से बाहर रखा जा सकेगा।
हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर नहीं कर सकती पुलिस
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने बृहस्पतिवार को कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर नहीं किया जा सकता। औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत अवधि को 24 घंटे की समयसीमा से बाहर रखने की अनुमति देना संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत होगा। यह अनुच्छेद 22(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 56 के प्रावधानों के भी खिलाफ है।
मजिस्ट्रेट की जवाबदेही भी तय
पीठ ने मजिस्ट्रेटों की जिम्मेदारी भी तय की। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को हिरासत की वास्तविक तारीख और समय अपने रिकॉर्ड में दर्ज करना होगा। साथ ही यह जांचना होगा कि व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर पेश किया गया है या नहीं। उन्हें यह भी देखना होगा कि परिस्थितियों के लिहाज से हिरासत की अवधि उचित थी या नहीं। जरूरत से ज्यादा लंबी हिरासत होने पर मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इन्कार कर सकते हैं।
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पूछताछ, जांच और तलाशी में लगा समय भी 24 घंटे में शामिल
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत की अवधि में व्यक्ति से पूछताछ, जांच, तलाशी और जब्ती में लगा समय भी 24 घंटे की गणना में शामिल होगा। यानी पुलिस औपचारिक गिरफ्तारी में देरी करके पूछताछ या अन्य जांच प्रक्रियाओं के लिए अतिरिक्त समय नहीं ले सकेगी।
ओडिशा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के फैसले खारिज
यह फैसला सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले में आया। त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में नशीले पदार्थों की तस्करी से जुड़े इस मामले में शीर्ष अदालत ने 24 घंटे की अवधि बीतने के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए चारों आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के आर्यमान पटनायक, मद्रास हाईकोर्ट के कन्नन और केरल हाईकोर्ट के अरुण के. थॉमस मामलों में दिए गए फैसलों को भी अस्वीकार कर दिया। इन फैसलों में औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत अवधि को 24 घंटे की समयसीमा से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।
ये भी पढ़ें: यूपीआई पर एमडीआर शुल्क: सुप्रीम कोर्ट में बोली सरकार- हमेशा मुफ्त सेवा का नहीं दिया भरोसा; मामले में आगे क्या?
24 घंटे से अधिक हिरासत पर रिहाई का अधिकार
शीर्ष अदालत ने दोहराया कि हिरासत में लिए जाने के वास्तविक समय से लेकर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने तक का पूरा समय 24 घंटे की गणना में शामिल होगा। उचित यात्रा समय को छोड़कर यदि यह अवधि 24 घंटे से अधिक होती है, तो व्यक्ति को संवैधानिक प्रावधानों के तहत राहत मिलेगी। पुलिस उसे औपचारिक गिरफ्तारी का समय बदलकर अतिरिक्त समय तक हिरासत में नहीं रख सकती।
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हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर नहीं कर सकती पुलिस
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने बृहस्पतिवार को कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर नहीं किया जा सकता। औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत अवधि को 24 घंटे की समयसीमा से बाहर रखने की अनुमति देना संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत होगा। यह अनुच्छेद 22(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 56 के प्रावधानों के भी खिलाफ है।
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मजिस्ट्रेट की जवाबदेही भी तय
पीठ ने मजिस्ट्रेटों की जिम्मेदारी भी तय की। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को हिरासत की वास्तविक तारीख और समय अपने रिकॉर्ड में दर्ज करना होगा। साथ ही यह जांचना होगा कि व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर पेश किया गया है या नहीं। उन्हें यह भी देखना होगा कि परिस्थितियों के लिहाज से हिरासत की अवधि उचित थी या नहीं। जरूरत से ज्यादा लंबी हिरासत होने पर मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इन्कार कर सकते हैं।
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पूछताछ, जांच और तलाशी में लगा समय भी 24 घंटे में शामिल
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत की अवधि में व्यक्ति से पूछताछ, जांच, तलाशी और जब्ती में लगा समय भी 24 घंटे की गणना में शामिल होगा। यानी पुलिस औपचारिक गिरफ्तारी में देरी करके पूछताछ या अन्य जांच प्रक्रियाओं के लिए अतिरिक्त समय नहीं ले सकेगी।
ओडिशा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के फैसले खारिज
यह फैसला सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले में आया। त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में नशीले पदार्थों की तस्करी से जुड़े इस मामले में शीर्ष अदालत ने 24 घंटे की अवधि बीतने के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए चारों आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के आर्यमान पटनायक, मद्रास हाईकोर्ट के कन्नन और केरल हाईकोर्ट के अरुण के. थॉमस मामलों में दिए गए फैसलों को भी अस्वीकार कर दिया। इन फैसलों में औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत अवधि को 24 घंटे की समयसीमा से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।
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24 घंटे से अधिक हिरासत पर रिहाई का अधिकार
शीर्ष अदालत ने दोहराया कि हिरासत में लिए जाने के वास्तविक समय से लेकर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने तक का पूरा समय 24 घंटे की गणना में शामिल होगा। उचित यात्रा समय को छोड़कर यदि यह अवधि 24 घंटे से अधिक होती है, तो व्यक्ति को संवैधानिक प्रावधानों के तहत राहत मिलेगी। पुलिस उसे औपचारिक गिरफ्तारी का समय बदलकर अतिरिक्त समय तक हिरासत में नहीं रख सकती।