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शिवसेना सांसद राउत ने कहा- सेकुलरों पार्टियों ने मुस्लिमों को हमेशा डरा कर लिया वोट

Sat, 19 Jan 2019 06:51 PM IST
Nilesh Kumar रवि बुले, अमर उजाला, मुंबई
रवि बुले, अमर उजाला, मुंबई Published by: Nilesh Kumar Updated Sat, 19 Jan 2019 06:51 PM IST
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Shivsena MP Sanjay Raut said all secular parties of india take muslim vote to scared them
sanjay raut - फोटो : amar ujala
बीजेपी के सहयोगी दल शिवसेना के सांसद संजय राउत ने कहा है कि बाला साहब ठाकरे एक्सीडेंटल शिवसेना प्रमुख नहीं थे और न मैं संजय बारू हूं। बाला साहब की बायोपिक ठाकरे में उनके जीवन के विविध पक्षों को उभारा गया है। राउत फिल्म ‘ठाकरे’ के निर्माता भी हैं। 
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उन्होंने कहा कि सिनेमा के बड़े-बड़े कलाकार पॉलिटिक्स में आ सकते हैं तो राजनेता क्यों नहीं फिल्म बना कर इस माध्यम से अपनी बात रख सकते। राउत ने ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में कहा कि बाला साहब के बारे में हमेशा गलत समझा गया कि वह मुस्लिम विरोधी हैं। वह कभी मुसलमानों के खिलाफ नहीं रहे। 
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उन्होंने कहा कि बाला साहब ने सिर्फ उन मुसलमानों के विरुद्ध आवाज उठाई, जिनका दिल हिंदुस्तान में रहने के बावजूद पाकिस्तान के लिए दिल धड़कता है। इस सवाल पर कि मुस्लिमों के विषय में कहा जाता है, कुछ गलत लोगों की वजह से पूरी कौम को कठघरे में खड़ा किया जाता है, राउत ने कहा कि हमारा अनुभव है कि मुस्लिमों में जो अच्छे लोग हैं, वो गलत लोगों के खिलाफ आवाज नहीं उठाते। खुल कर नहीं बोलते।
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....तो सेकुलर पार्टियां आत्महत्या कर लेंगी

देश में हिंदुत्व की राजनीति के उभार पर उन्होंने कहा कि यह उभार क्यों नहीं होना चाहिए। सेकुलर पार्टियों ने मुस्लिमों को डरा-डरा कर वोट लिए हैं। उनसे कहा कि आपको हिंदुओं से डर है, शिवसेना से डर है। राउत के अनुसार बाला साहब ने तुष्टिकरण की राजनीति के विरुद्ध ही कहा था कि इसे खत्म करना है तो मुसलमानों के वोटों का अधिकार वापस ले लेना चाहिए। ऐसा होते ही सेकुलर पार्टियां आत्महत्या कर लेंगी।

इधर, लोकसभा चुनाव से पहले क्षेत्रीय पार्टियां मिलकर केंद्रीय ताकत को चुनौती देती दिख रही हैं। इस पर राउत ने कह कि पिछले चुनाव में लोगों ने नरेंद्र मोदी जी को 280 का जनादेश दिया था। 2019 में उन्हें इसे 380 करना चाहिए था, लेकिन वह 180 हो जाएगा। अब जनता और देश को दोष नहीं देना चाहिए। जनता ने तो पूर्ण बहुमत दिया था।

ठाकरेः हिंदी और मराठी में होगा फर्क

राउत ने कहा कि वह ‘ठाकरे’ को मराठी में बना रहे थे। फिर लगा बाला साहब पूरे देश में लोकप्रिय थे तो हिंदी में भी बनाया। दोनों भाषाओं की फिल्मों में थोड़ा फर्क होगा। हिंदी में हमने राष्ट्रीय और वैश्विक परिदृश्य का खयाल रखा। मराठी संस्करण में हमने उन मुद्दों को उभारा जिनका संबंध महाराष्ट्र या मुंबई से है। 


बाला साहेब के राजनीतिक करिअर की शुरुआत मराठी अस्मिता के लिए संघर्ष से हुई थी। हमने उनके 1961 से आगे के 20-25 साल दिखाए हैं, जब उन्होंने शिवसेना को संगठित किया। 
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