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महीने के अंत में छोड़ा जाएगा भारतीय जीपीएस प्रणाली का सातवां उपग्रह
शशिधर पाठक/ अमर उजाला,नई दिल्ली
Updated Sun, 17 Apr 2016 02:27 AM IST
सार
- इसरो ने 28 अप्रैल को की प्रक्षेपण की तैयारी
- एक माह में सातों उपग्रह प्रणाली में बनेगा तालमेल
- लोगों को एक साल बाद मिल सकेगी इसकी सेवाएं
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फाइल फोटो
- फोटो : Youtube Grab
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विस्तार
भारतीय जीपीएस प्रणाली (आईआरएनएस) का सातवां उपग्रह आईआरएनएस-1जी 28 तारीख को छोड़ा जाएगा। इसरो ने श्रीहरिकोटा से उपग्रह प्रक्षेपण की तैयारी शुरू कर दी है। 1जी के सफलता पूर्वक कक्षा में स्थापित होने के बाद जीपीएस प्रणाली के सात उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
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इसरो के वैज्ञानिक और प्रवक्ता देवी प्रसाद कार्णिक ने बताया कि इस उपग्रह को मार्च में ही छोड़ा जाना था लेकिन फिर कुछ और सुधार के मद्देनजर प्रक्षेपण अप्रैल अंत के लिए टाल दिया गया। हालांकि समुद्र के वातावरण की स्थिति के आधार पर ही 28 अप्रैल को उपग्रह को प्रक्षेपित करने की स्थिति बनेगी।
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इसरो का दावा है कि उसने दुनिया की सबसे सस्ती (21.2 करोड़ अमेरिकी डालर) और कारगर जीपीएस उपग्रह प्रणाली को विकसित करने में सफलता पाई है। इसकी शुद्धता 10-20 मीटर की है और यह देश तथा हिंद महासागरीय क्षेत्र की जरूरत के लिहाज से अमेरिका की जीपीएस प्रणाली से काफी बेहतर है।
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क्या है उपयोग
फाइल फोटो
- फोटो : Youtube Grab
सूत्रों के अनुसार आईआरएनएस-1जी को प्रक्षेपित किए जाने के बाद इसे कक्षा में स्थापित करने, छह अन्य उपग्रह के साथ तालमेल बनाने तथा पूरी प्रणाली को व्यवस्थित करने और नेटवर्क की स्थिति में लाने में एक महीने का समय लग सकता है। इसके बाद देश में स्थापित 21 केन्द्रों से ट्रांसमिशन, कोडिंग-डिकोडिंग तथा फ्रीक्वेंसी व्यवस्थित करने में वक्त लगने की उम्मीद है।
डिलीवरी सिस्टम और ड्राईरन जैसे परीक्षणों को पूरा करने के बाद यह प्रणाली आम लोगों तथा सरकारी एजेंसियों को अपनी सेवा देने में सक्षम होगी। इसमें एक साल का वक्त लग सकता है।
यह नेवीगेशन आधारित कृत्रिम उपग्रह प्रणाली है। सड़क यातायात, इलेक्ट्रानिक सिग्नल के जरिए उपकरणों के संचालन, रेलवे नेटवर्क के प्रबंधन, दूरभाष, मार्ग संचालन आदि में इसका समुचित उपयोग किया जा सकता है। मालवाहक जहाजों से लेकर हवाई जहाजों के संचालन में इसकी सेवा ली जा सकती है। यह संचार उपकरणों के संचालन में उपयोगी होगा।
आईआरएनएस की सात उपग्रह प्रणाली का सैन्य उपयोग भी है। तीनों सेनाएं इसे आवश्यकतानुसार इस्तेमाल कर सकती हैं। सीमा पार और समुद्र के रास्ते से होने वाली घुसपैठ रोकने में भी यह अहम भूमिका निभा सकता है।
डिलीवरी सिस्टम और ड्राईरन जैसे परीक्षणों को पूरा करने के बाद यह प्रणाली आम लोगों तथा सरकारी एजेंसियों को अपनी सेवा देने में सक्षम होगी। इसमें एक साल का वक्त लग सकता है।
यह नेवीगेशन आधारित कृत्रिम उपग्रह प्रणाली है। सड़क यातायात, इलेक्ट्रानिक सिग्नल के जरिए उपकरणों के संचालन, रेलवे नेटवर्क के प्रबंधन, दूरभाष, मार्ग संचालन आदि में इसका समुचित उपयोग किया जा सकता है। मालवाहक जहाजों से लेकर हवाई जहाजों के संचालन में इसकी सेवा ली जा सकती है। यह संचार उपकरणों के संचालन में उपयोगी होगा।
आईआरएनएस की सात उपग्रह प्रणाली का सैन्य उपयोग भी है। तीनों सेनाएं इसे आवश्यकतानुसार इस्तेमाल कर सकती हैं। सीमा पार और समुद्र के रास्ते से होने वाली घुसपैठ रोकने में भी यह अहम भूमिका निभा सकता है।