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SC: सुप्रीम कोर्ट ने दी युवक को जमानत, पुलिस हिरासत में भेजने पर गुजरात के जज और पुलिसकर्मी अवमानना के दोषी

Wed, 07 Aug 2024 09:55 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: बशु जैन Updated Wed, 07 Aug 2024 09:55 PM IST
सार

न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने आठ दिसंबर 2023 को तुषारभाई रजनीकांत भाई शाह को अग्रिम जमानत दी थी। कोर्ट ने हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी न्यायिक अधिकारी ने एक जांच अधिकारी की याचिका पर ध्यान दिया और युवक को पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत में भेजा। 

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SC holds Guj judge cop guilty of contempt for sending man to custody after it granted bail
Supreme Court - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने युवक को जमानत देने के बाद भी पुलिस हिरासत में भेजने पर गुजरात के एक न्यायाधीश और एक पुलिसकर्मी को अवमानना का दोषी माना है। कोर्ट ने गुजरात के न्यायाधीश पर पुलिस हिरासत देने में पक्षपात करने का आरोप लगाया है। साथ ही इस तथ्य की अनदेखी का आरोप लगाया कि युवक को सुप्रीम कोर्ट ने ही जमानत दी थी। 

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को पुलिस हिरासत देने से पहले तथ्यों पर न्यायिक दिमाग लगाना चाहिए। अदालतों को जांच एजेंसियों के दूत के रूप में काम नहीं करना चाहिए। साथ ही रिमांड आवेदनों की नियमित तरीके से अनुमति देनी चाहिए। न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने आठ दिसंबर 2023 को तुषारभाई रजनीकांत भाई शाह को अग्रिम जमानत दी थी। कोर्ट ने हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी न्यायिक अधिकारी ने एक जांच अधिकारी की याचिका पर ध्यान दिया और युवक को पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत में भेजा। 
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कोर्ट ने माना कि पुलिस हिरासत देकर अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सूरत और अवधि पूरी होने से पहले युवक को रिहा न करके पुलिस अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट के नियमों की अवमानना की है। न्यायिक अधिकारी ने पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया।  सूरत के वेसु पुलिस स्टेशन के पुलिस इंस्पेक्टर आरवाई रावल को लेकर कोर्ट ने कहा कि अंतरिम सुरक्षा के दौरान आरोपियों की पुलिस हिरासत की उनकी याचिका अदालत के आदेश की सरासर अवहेलना। पीठ ने उन्हें आठ दिसंबर 2023 के आदेश की अवमानना करने का दोषी ठहराया।
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73 पन्नों के फैसले में न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि जमानत आदेश स्पष्ट था। इसे लेकर कोई अवमानना करने वाले न्यायिक अधिकारी और पुलिस कर्मी को कोई संदेह नहीं रहा होगा। इसमें साफ था कि युवक को अंतरिम अवधि के दौरान पुलिस हिरासत में भेजा जा सकता है। कोर्ट ने जज की बिना शर्त माफी को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। 


पीठ ने पुलिस अधिकारी की दलील को खारिज कर दिया कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा असहयोग करना एक मामला है और आरोपी द्वारा अपराध कबूल करने से इनकार करना दूसरा मामला है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस कर्मी ने अदालत के सामने गलत तथ्य पेश किए और आरोपी की पुलिस हिरासत ले ली। अगर उसे हिरासत वास्तव में चाहिए थी तो उसे खुद सुप्रीम कोर्ट का रुख करना चाहिए था। रिमांड आवेदन को स्थानीय अदालत में ले जाना अवमानना है। पीठ ने न्यायिक अधिकारी के बचाव में भी बात की। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी गलत धारणा के कारण पुलिस हिरासत वास्तविक तरीके से दी गई थी, तो उसे पुलिस हिरासत के अंत में आरोपी को तुरंत रिहा कर देना चाहिए था।

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